जस्टिस जी.आर. स्वामीनाथन के खिलाफ प्रस्तावित महाभियोग (इम्पीचमेंट) की चर्चा के बीच एक नया राजनीतिक-कानूनी विवाद खड़ा हो गया है। 56 पूर्व न्यायाधीशों द्वारा जस्टिस स्वामीनाथन के समर्थन में लिखा गया पत्र अब सिर्फ एक कानूनी राय नहीं रह गया है, बल्कि इसे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और उससे जुड़े संगठनों के नेटवर्क से जोड़कर देखा जा रहा है। आलोचकों का कहना है कि इस पत्र के जरिए एक संगठित नेटवर्क सक्रिय होता दिख रहा है, जिससे न्यायपालिका की स्वतंत्रता और निष्पक्षता पर नए सवाल खड़े हो रहे हैं।
इस पत्र के पहले हस्ताक्षरकर्ता आदर्श गोयल हैं, जिनका नाम सामने आते ही बहस और तेज हो गई। आदर्श गोयल अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद (ABAP) के संस्थापक सदस्य और पहले महासचिव बताए जाते हैं। ABAP को RSS की कानूनी शाखा के रूप में जाना जाता है। बताया जा रहा है कि इस संगठन की स्थापना बाबरी मस्जिद विध्वंस से करीब तीन महीने पहले की गई थी। इसी ऐतिहासिक संदर्भ को जोड़कर आलोचक यह सवाल उठा रहे हैं कि क्या न्यायिक मामलों में वैचारिक नजदीकियां अब खुलकर सामने आ रही हैं।
बाबरी मस्जिद विध्वंस के समय का एक पुराना किस्सा भी फिर से चर्चा में है। आरोप है कि जब हिंदुत्व संगठनों के नेतृत्व में बाबरी मस्जिद गिराए जाने के बाद कई वकील भारतीय विधि संस्थान की ओर विरोध जताने और सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन से हस्तक्षेप की मांग करने जा रहे थे, उसी दौरान आदर्श गोयल कथित रूप से मिठाइयां बांटते और इस घटना का जश्न मनाते देखे गए थे। यह दावा उस दौर से जुड़ा है और आज फिर इसे याद दिलाकर सवाल उठाए जा रहे हैं कि ऐसे व्यक्तियों की भूमिका न्यायिक मामलों में कितनी निष्पक्ष मानी जा सकती है।
जस्टिस जी.आर. स्वामीनाथन और ABAP के रिश्तों को लेकर भी कई तथ्य गिनाए जा रहे हैं। बताया जाता है कि 1991 में वकालत शुरू करने के बाद, जस्टिस स्वामीनाथन ने 1994 में ABAP की राष्ट्रीय बैठक में तमिलनाडु से प्रतिनिधि के रूप में हिस्सा लिया था। इतना ही नहीं, 2023 में जज बनने के बाद भी उन्होंने ABAP के एक राष्ट्रीय सम्मेलन में भाग लिया और सार्वजनिक रूप से यह कहा कि “मैं ABAP का कार्यकर्ता हूं।” आलोचकों के अनुसार, किसी कार्यरत जज द्वारा इस तरह का बयान देना न्यायिक मर्यादाओं के लिहाज से गंभीर सवाल खड़े करता है।
अब जब जस्टिस स्वामीनाथन के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव की बात सामने आई है और उसी समय 56 पूर्व जजों का समर्थन पत्र भी आया है, तो कई लोग इसे संयोग नहीं मान रहे। उनका कहना है कि इस पूरे घटनाक्रम से RSS और उससे जुड़े संगठनों का एक पूरा नेटवर्क उजागर होता दिख रहा है, जो न्यायपालिका के भीतर और बाहर प्रभाव बनाने की कोशिश कर रहा है। हालांकि समर्थकों का तर्क है कि यह केवल एक व्यक्ति के न्यायिक कार्य और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का बचाव है।
फिलहाल यह मुद्दा सिर्फ जस्टिस स्वामीनाथन तक सीमित नहीं रह गया है। यह बहस अब इस बड़े सवाल तक पहुंच चुकी है कि क्या न्यायपालिका को किसी भी तरह के वैचारिक या संगठनात्मक प्रभाव से पूरी तरह अलग और स्वतंत्र रखा जा पा रहा है या नहीं। आने वाले दिनों में इस मामले पर संसद, न्यायपालिका और जनता—तीनों की नजरें टिकी रहेंगी।





