आलोक रंजन | नई दिल्ली 13 नवंबर 2025
अमेरिका के आधिकारिक लॉबिंग डिस्क्लोजर रजिस्टर में सामने आए एक नए खुलासे ने भारतीय राजनीति को फिर से तीखे विवादों में झोंक दिया है। दस्तावेज़ों से पता चलता है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) ने अमेरिकी लॉ फर्म Squire Patton Boggs (SPG) को अपने हितों की वकालत के लिए हायर किया है। उल्लेखनीय है कि SPG वही लॉबिंग फर्म है जो इस समय पाकिस्तान सरकार के लिए भी सक्रिय लॉबिंग कर रही है। यह तथ्य सामने आते ही न केवल सोशल मीडिया में हलचल मच गई, बल्कि राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोपों की लहरें भी बढ़ गईं। आलोचकों का कहना है कि यह स्थिति न केवल हितों के संघर्ष (conflict of interest) का संवेदनशील मामला है, बल्कि RSS की “घोषित राष्ट्रवादी छवि” पर गहरी चोट भी है।
अमेरिकी सीनेट के ‘लॉबिंग डिस्क्लोजर एक्ट’ पोर्टल पर दर्ज रिकॉर्ड दिखाते हैं कि RSS ने अपने अमेरिकी परिचालन के लिए State Street Strategies नामक इकाई के तहत SPG को 2025 में ही लगभग 3,30,000 डॉलर का भुगतान किया है। इससे संबंधित चार अलग-अलग एंट्रियाँ सूचीबद्ध हैं, जो बताती हैं कि SPG ने RSS की ओर से अमेरिकी नीति-निर्माताओं, कांग्रेस सदस्यों और संस्थानों से संपर्क करने का काम किया—यानी यह कार्य मनोवैज्ञानिक, राजनीतिक और रणनीतिक प्रभाव-प्रबंधन का हिस्सा है। लेकिन असली राजनीतिक विस्फोट तब हुआ जब पत्रकार शशांक मट्टू द्वारा साझा किए गए दस्तावेज़ों में यह उजागर हुआ कि SPG लगातार पाकिस्तान के लिए भी लॉबिंग कर रही है, जिसके साथ भारत के संबंध दशकों से जटिल, शत्रुतापूर्ण और सुरक्षा-संवेदनशील हैं।
इसी संदर्भ में कांग्रेस सांसद जयराम रमेश ने RSS को तीखे शब्दों में घेरा। उन्होंने याद दिलाया कि कुछ दिन पहले ही RSS प्रमुख मोहन भागवत ने सार्वजनिक तौर पर कहा कि RSS “न तो पंजीकृत संगठन है और न ही टैक्स देता है।” जयराम रमेश ने इस बयान को आधार बनाते हुए आरोप लगाया कि जिस संगठन की कानूनी स्थिति स्वयं अस्पष्ट है और जो कर देनदारी से मुक्त है, वह अचानक लाखों डॉलर खर्च करके विदेशी धरती पर लॉबिंग क्यों कर रहा है? उन्होंने कहा, पर “RSS ने पाकिस्तान के आधिकारिक लॉबिंग पार्टनर को अपने लिए अमेरिका में लॉबिंग करने के लिए भारी रकम दी है। यह पहली बार नहीं है जब RSS ने देशहित के साथ विश्वासघात किया हो। स्वतंत्रता आंदोलन से दूरी, गांधी और अंबेडकर का विरोध, संविधान और राष्ट्रीय ध्वज पर हमले—RSS की यही विरासत रही है।”
रमेश का यह बयान इस विवाद को महज़ एक लॉबिंग अनुबंध की घटना से उठाकर ऐतिहासिक और वैचारिक बहस में बदल देता है। कांग्रेस और विपक्ष लंबे समय से RSS पर यह आरोप लगाते रहे हैं कि वह खुद को “राष्ट्रवादी संगठन” के रूप में प्रस्तुत करता है पर उसके कई कदम उस छवि के विपरीत होते हैं। पाकिस्तान के लिए भी काम करने वाली लॉ फर्म को हायर करना अब उसी बहस का नया अध्याय बन गया है। इसके साथ ही बड़ा सवाल यह भी है कि RSS—जो स्वयं को एक सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन कहता है और राजनीतिक भूमिका से इनकार करता है—अमेरिका में लॉबिंग क्यों कर रहा है? और वह भी इतने ऊँचे शुल्क के साथ?
इस मामले ने विदेश नीति और घरेलू राजनीति, दोनों पर बहस छेड़ दी है। क्या भारत का सबसे प्रभावशाली वैचारिक संगठन अमेरिका में अपनी छवि सुधारने या अपनी नीतियों के पक्ष में दबाव बनाने की कोशिश कर रहा है? और क्या यह विदेशी प्रभाव—Foreign Influence Operations—की श्रेणी में आता है? विशेषज्ञों का कहना है कि जब एक लॉबिंग फर्म एक साथ दो देशों के लिए—जो आपसी तनाव के लिए जाने जाते हैं—काम करती है, तो यह नैतिक, राजनीतिक और रणनीतिक हर स्तर पर प्रश्न खड़े करता है। विशेष रूप से तब, जब भारत ने वर्षों से पाकिस्तान को आतंकवाद के मसले पर कठघरे में खड़ा रखा है और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर लगातार पाकिस्तानी नेटवर्क को अलग-थलग करने की कोशिश की है।
इस पूरे विवाद में RSS या BJP ने अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है। लेकिन राजनीतिक हलकों में अनुमान लगाया जा रहा है कि आने वाले दिनों में यह मुद्दा संसद से लेकर चुनावी सभाओं तक प्रमुख बहस बन सकता है। विदेशी एजेंसियों, लॉबिंग फर्मों और गुप्त फंडिंग पर भारत की राजनीतिक पार्टियाँ पहले भी एक-दूसरे पर आरोप लगाती रही हैं, लेकिन इस मामले ने पहली बार RSS को सीधे अंतरराष्ट्रीय लॉबिंग विवाद के केंद्र में ला दिया है।
समग्र रूप से देखा जाए तो यह घटना सिर्फ़ एक लॉबिंग अनुबंध का मामला नहीं है—यह प्रश्न है राष्ट्रीय हितों की प्राथमिकता का, राजनीतिक नैतिकता का, और उन दावों का, जिन पर RSS दशकों से अपनी वैचारिक इमारत खड़ी करता आया है। आगे आने वाले हफ्तों में इस विवाद का राजनीतिक आयाम और भी गहरा हो सकता है, और शायद भारत की विदेश नीति से लेकर घरेलू सत्ता-संतुलन तक पर नए प्रश्न खड़े कर सकता है।




