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भगवान के सोने पर डाका: सबरीमाला कांड का मास्टरमाइंड पोट्टी गिरफ़्तार

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तिरुवनंतपुरम 17 अक्टूबर 2025

आस्था के मंदिर से विश्वास की चोरी

केरल के सबरीमाला मंदिर में भगवान अयप्पा की मूर्ति और द्वारपालकों पर चढ़ी स्वर्ण परतों से जुड़ा यह मामला अब एक धार्मिक विवाद से आगे बढ़कर भ्रष्टाचार और साज़िश की कहानी बन गया है। सोने से मढ़े हुए इस मंदिर की पवित्रता को जब “स्वर्ण चोरी” ने कलंकित किया, तब राज्य भर में आस्था और अविश्वास का माहौल बन गया। इस मामले में केरल पुलिस की विशेष जांच टीम (SIT) ने अब उस व्यक्ति को गिरफ्तार किया है, जिसे इस समूचे घोटाले का मुख्य सूत्रधार बताया जा रहा है — उन्नीकृष्णन पोट्टी। वह वही ठेकेदार है, जिसे 2019 में मंदिर की सोने की परतों की मरम्मत और पुनः चढ़ाने (replating) का जिम्मा सौंपा गया था। यह काम Travancore Devaswom Board (TDB) के अधीन हुआ था, जो सबरीमाला मंदिर के प्रशासन की देखरेख करता है। परंतु समय बीतने के साथ ही यह रहस्य खुला कि मंदिर से भेजा गया लगभग 475.9 ग्राम सोना वापसी पर रहस्यमय ढंग से “गायब” था, और उसकी जगह तांबे की प्लेटें लौटीं।

जांच की उलझनें और साजिश की परतें

शुरुआती जांच में कई बार यह कोशिश की गई कि मामला ‘तकनीकी गड़बड़ी’ बताकर दबा दिया जाए, लेकिन जब कुछ अधिकारियों ने उच्च न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाया, तब यह रहस्य और गहराया। अदालत ने मामले को गंभीर मानते हुए विशेष जांच टीम गठित की। SIT ने महीनों की पड़ताल के बाद कई गवाहों, दस्तावेज़ों और वित्तीय रिकॉर्ड्स को खंगाला। इसमें यह स्पष्ट हुआ कि उन्नीकृष्णन पोट्टी ने न केवल सोने की असल परतों को बदला बल्कि TDB के कुछ वरिष्ठ अधिकारियों से मिलीभगत भी की। SIT की रिपोर्ट में इस बात का जिक्र है कि काम की निगरानी करने वाले इंजीनियरों ने भी समय पर रिपोर्ट दाखिल नहीं की और जांच से बचने के लिए दस्तावेज़ों में हेराफेरी की गई।

अदालत ने SIT को यह भी आदेश दिया कि वह सीधे न्यायालय को रिपोर्ट सौंपे, ताकि सरकार की ओर से किसी तरह का दबाव या हस्तक्षेप न हो। यह कदम न्यायपालिका के उस सख्त रवैये को दर्शाता है जो आस्था से जुड़े मामलों में पारदर्शिता और जवाबदेही को सर्वोपरि मानता है।

 सोने की परत के पीछे का “काला बाज़ार”

जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ी, यह स्पष्ट होता गया कि मामला केवल चोरी का नहीं बल्कि एक व्यवस्थित वित्तीय घोटाले का है। Enforcement Directorate (ED) ने इसमें वित्तीय गड़बड़ी के पहलू को लेकर अपनी जांच शुरू की। ईडी को संदेह है कि चोरी हुआ सोना स्थानीय ज्वैलर्स के ज़रिए बाज़ार में बेचा गया और उससे प्राप्त धन का हिस्सा कई हाथों में बांटा गया। SIT को बैंक ट्रांजेक्शन में कुछ ऐसे लेनदेन मिले हैं जिनमें ठेकेदार की कंपनी और मंदिर प्रशासन से जुड़े कुछ कर्मचारियों के खातों में समान तिथियों पर धनराशि जमा हुई। यह संकेत साफ़ करते हैं कि “पवित्र कार्य” के नाम पर “मुनाफे का खेल” खेला गया।

सूत्र बताते हैं कि पोट्टी ने अपनी सफाई में कहा कि उसे मंदिर प्रशासन की ओर से ‘कॉपर प्लेट्स’ ही दी गई थीं और उसे यह पता नहीं था कि वे सोने की परतें थीं। लेकिन SIT को मिले साक्ष्य इस दावे को झुठलाते हैं। पोट्टी की गिरफ्तारी के बाद अब यह जांच उस दिशा में आगे बढ़ेगी जहाँ यह तय किया जा सकेगा कि इस “स्वर्ण तंत्र” में कितने बड़े चेहरे शामिल थे।

राजनीति और धर्म के बीच की खाई

सबरीमाला का मामला हमेशा से राजनीति का केंद्र रहा है — चाहे वह महिलाओं के प्रवेश को लेकर हुआ विवाद हो या अब यह सोना चोरी घोटाला। विपक्ष ने आरोप लगाया है कि राज्य सरकार ने शुरुआत में इस पूरे मामले को दबाने का प्रयास किया था। कांग्रेस नेता वी.डी. सतीसन ने कहा कि “हाईकोर्ट का आदेश हमारे उस रुख को सही ठहराता है कि सरकार और देवास्वम बोर्ड दोनों ने चोरी की जांच को कमजोर करने की कोशिश की।” वहीं सरकार ने जवाब में कहा कि “SIT स्वतंत्र रूप से काम कर रही है और किसी भी दोषी को बख्शा नहीं जाएगा।”

मामले का राजनीतिक रंग तब और गहरा गया जब कुछ हिंदू संगठनों ने इसे “आस्था पर हमला” बताया। उनका कहना था कि यह सिर्फ सोने की चोरी नहीं बल्कि भगवान अयप्पा की प्रतिष्ठा पर चोट है। उधर सामाजिक कार्यकर्ताओं ने सवाल उठाया कि धार्मिक ट्रस्ट और मंदिर बोर्ड्स में करोड़ों की संपत्ति होने के बावजूद उन पर वित्तीय पारदर्शिता और थर्ड पार्टी ऑडिट क्यों नहीं होती?

जवाबदेही की नई परिभाषा

यह मामला एक बार फिर यह सवाल उठा रहा है कि धार्मिक संस्थाओं के भीतर पारदर्शिता कैसे सुनिश्चित की जाए। कई विशेषज्ञों का मानना है कि सबरीमाला जैसे बड़े मंदिरों में अब डिजिटल एसेट मैनेजमेंट सिस्टम और नियमित ऑडिट अनिवार्य होना चाहिए। जैसे श्री माता वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड ने अपनी सम्पत्तियों का डिजिटल रिकॉर्ड और ऑनलाइन लेखा जोखा बनाया है, वैसे ही Travancore Devaswom Board को भी यह कदम उठाना चाहिए। यदि यह सुधार पहले लागू किए गए होते, तो शायद सबरीमाला सोना चोरी जैसी घटना कभी नहीं होती।

 विश्वास की लौ को फिर जलाना होगा

सबरीमाला मंदिर सिर्फ एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि दक्षिण भारत की सांस्कृतिक आत्मा का प्रतीक है। इस मंदिर के स्वर्ण मंडप से सोने की चोरी कोई साधारण अपराध नहीं, बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था पर धब्बा है। उन्नीकृष्णन पोट्टी की गिरफ्तारी से भले ही न्यायिक प्रक्रिया ने एक दिशा पाई हो, लेकिन यह केवल शुरुआत है। जांच अब उस मुकाम की ओर बढ़ रही है जहाँ यह तय होगा कि धर्म के नाम पर चल रहे इन आर्थिक तंत्रों में जवाबदेही की जगह कब और कैसे बनेगी।

इस मामले ने यह सिखाया है कि अगर धार्मिक संस्थाएँ पारदर्शिता और ईमानदारी के रास्ते से भटक जाएँ, तो ईश्वर की मूर्ति पर चढ़ा सोना भी विश्वास की राख में बदल जाता है।

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