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पराली जलाने में रिकॉर्ड कमी: सकारात्मक संकेत लेकिन अपूर्ण समाधान

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एबीसी डेस्क 27 नवंबर 

दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र में इस वर्ष पराली जलाने की घटनाओं में नाटकीय गिरावट दर्ज की गई है, जिसने पहली नजर में वायु प्रदूषण संकट के समाधान की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि का संकेत दिया है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईएआरआई) के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, पंजाब में पराली जलाने के मामले 2024 के 1,510 से घटकर केवल 415 रह गए हैं, यानी लगभग 73% की कमी, जबकि हरियाणा में यह संख्या 387 से घटकर 70 रह गई, जो 82% की गिरावट दर्शाती है। कुल मिलाकर 77.5% की कमी एक बड़ी सफलता मानी जा रही है, और रविवार को पंजाब में केवल तीन तथा हरियाणा में एक ही मामला सामने आया। इसके बावजूद दिल्ली का एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) 24 नवंबर 2025 को 397 से 559 के बीच दर्ज किया गया, जो ‘गंभीर’ से ‘खतरनाक’ श्रेणी में आता है। इसका मतलब स्पष्ट है कि पराली अब प्रदूषण का प्राथमिक स्रोत नहीं रही, बल्कि स्थानीय और स्थायी स्रोतों का योगदान हवा को जहरीला बनाए हुए है।

स्थानीय प्रदूषण स्रोतों का बढ़ता प्रभाव: वाहनों की भूमिका सबसे प्रमुख

विशेषज्ञों के अनुसार, मौजूदा परिस्थिति में पराली का पीएम2.5 स्तरों में योगदान 2.6% से 3.8% तक सीमित हो चुका है, जबकि वाहन प्रदूषण तेजी से मुख्य कारण के रूप में उभर रहा है। दिल्ली के पीएम2.5 स्तर में वाहनों का योगदान 18% से 38% तक पहुंच गया है, जो शहर में रोजाना लाखों वाहनों की आवाजाही और बढ़ती ईंधन खपत के कारण है। इसके साथ ही निर्माण स्थलों से उड़ने वाली धूल, खुले में कचरा जलाना, घरेलू बायोमास जैसे लकड़ी और गोबर के उपलों का उपयोग, औद्योगिक इकाइयों व बिजली संयंत्रों से निकलने वाला धुंआ वर्षभर प्रदूषण का सबसे बड़ा आधार बन चुके हैं। सर्दियों में ठंडी हवा और कम हवा की गति के कारण यह प्रदूषण जमीन के करीब फंस जाता है, जिससे स्थिति और अधिक भयावह हो जाती है।

मौसम की मार और त्योहारों का प्रभाव: प्रदूषण का बहुस्तरीय विस्तार

दिल्ली में मौसम की प्रतिकूल परिस्थितियां जैसे कम हवा की गति, तापमान उलटाव (टेम्परेचर इन्वर्शन) और पश्चिमी हवाओं से आने वाले प्रदूषक भी प्रदूषण को बढ़ा रहे हैं। दीवाली के बाद प्रदूषण का स्तर पांच वर्षों में सबसे अधिक दर्ज हुआ, जब ग्रीन पटाखों की अनुमति के बावजूद उल्लंघनों के चलते पीएम2.5 स्तर 156 माइक्रोग्राम/घन मीटर से उछलकर 488 तक पहुंच गया। विशेषज्ञ बताते हैं कि इस बार पराली का शीर्ष योगदान 22% तक सीमित रहा, जो पिछले वर्ष के 38% से कम है, लेकिन स्थानीय स्रोतों पर नियंत्रण की कमी ने स्थिति को विकराल बनाए रखा। इस वजह से दिल्ली में सांस लेना लगभग 11.8 सिगरेट पीने के बराबर हो गया है, जो स्वास्थ्य जोखिमों की गंभीरता को दर्शाता है।

नीतियों और प्रवर्तन की कमजोरी: जीआरएपी का सीमित असर

एनसीआर क्षेत्र में लागू ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान (जीआरएपी) के तहत वाहनों पर प्रतिबंध, धूल नियंत्रण, और कचरा जलाने पर रोक जैसी व्यवस्थाएं लागू की गई हैं। हालांकि कागजों पर ये कदम प्रभावी दिखते हैं, मगर जमीन पर इनके कमजोर प्रवर्तन के कारण प्रदूषण स्तर में कोई महत्वपूर्ण सुधार देखने को नहीं मिला। अवैध उद्योगों का संचालन, निर्माण स्थलों पर धूल नियंत्रण उपायों की अनदेखी, और कचरा जलाना निरंतर जारी है। इसके अलावा पड़ोसी राज्यों से आने वाला ट्रांसबाउंड्री प्रदूषण भी दिल्ली-एनसीआर की हवा को और अधिक दूषित कर रहा है, जिससे क्षेत्रीय सहयोग और संयुक्त रणनीति की आवश्यकता पहले से अधिक बढ़ गई है।

संरचनात्मक प्रदूषण समस्या: भविष्य के लिए भयावह संकेत

विश्लेषण स्पष्ट करता है कि दिल्ली-एनसीआर का प्रदूषण अब मौसमी समस्या नहीं, बल्कि संरचनात्मक संकट बन चुका है। पराली जलाने में कमी एक महत्वपूर्ण उपलब्धि अवश्य है, लेकिन वाहनों की संख्या में बढ़ोतरी, निर्माण कार्यों का विस्तार, ऊर्जा स्रोतों पर निर्भरता, और औद्योगिक उत्सर्जन की अनियंत्रित स्थिति ने समाधान की राह कठिन बना दी है। सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (सीआरईए) के विशेषज्ञ डॉ. मनोज कुमार का कहना है कि मौजूदा धुंध मुख्य रूप से वाहनों, उद्योगों, बिजली संयंत्रों, कचरा जलाने और धूल के कारण है, और भविष्य में सुधार तभी संभव है जब स्थानीय उत्सर्जन पर सख्त नियंत्रण किया जाए। दिल्ली का वर्तमान AQI 310 से 471 के बीच ‘खतरनाक’ स्तर पर बना हुआ है, जिससे स्वास्थ्य संकट लगातार गहराता जा रहा है।

स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था पर भारी बोझ: चेतावनी की अंतिम घंटी

प्रदूषण का प्रभाव केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आर्थिक और सामाजिक भार भी बढ़ा रहा है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का अनुमान है कि प्रदूषण से होने वाली स्वास्थ्य हानि सालाना अरबों रुपये के आर्थिक नुकसान में बदल सकती है, जबकि अस्थमा, हृदय रोग, फेफड़ों के संक्रमण और स्ट्रोक जैसे मामलों में तेजी से बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है। विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि यदि तत्काल और कठोर कदम नहीं उठाए गए, तो दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र ‘जहर की घाटी’ में बदल सकता है, जहां हवा में मौजूद कण जीवन के लिए स्थायी खतरा बन जाएंगे। यह स्थिति सरकारों, प्रशासन, उद्योगों और नागरिकों सभी के लिए एक गंभीर चेतावनी है कि अब सतही समाधान नहीं, बल्कि संरचनात्मक बदलाव आवश्यक हैं।

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