बिहार की राजनीति में बड़ा धमाका उस समय हुआ जब बीजेपी के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय बिजली मंत्री आर.के. सिंह ने खुलकर अपनी ही पार्टी की नीतीश-मोदी सरकार पर 62 हजार करोड़ रुपये के महाघोटाले का गंभीर आरोप लगा दिया। उनका दावा है कि अदानी पावर लिमिटेड को जमीन देने और बिजली खरीद की तय शर्तों में ऐसी लूट हुई है, जिससे जनता को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ेगा। यह बयान उन्होंने ठीक चुनावी मतदान से पहले सामने रखा, जिससे राजनीतिक हलकों में जबरदस्त हलचल मच गई है। आर.के. सिंह ने इस मामले की CBI जांच की मांग की है, ताकि सच सामने आए और जिम्मेदारों पर कार्रवाई हो सके।
आर.के. सिंह का कहना है कि जनता को जिस महंगे रेट पर बिजली उपलब्ध कराई जाएगी, वह किसी भी रूप में न्यायसंगत नहीं है। उन्होंने आरोप लगाया कि इस सौदे में सत्ता से जुड़े मंत्री और शीर्ष अधिकारी शामिल हैं, जिनकी मिलीभगत से यह “बड़ी डील” कराई गई है। उनका कहना है कि बिजली जैसी बुनियादी सुविधा को मुनाफाखोरी का साधन बनाकर आम लोगों की जेब काटना लोकतंत्र और जनहित के खिलाफ है। अपने आरोपों को उन्होंने सिर्फ राजनीतिक मतभेद नहीं, बल्कि एक नैतिक लड़ाई करार दिया है, ताकि जनता के पैसे का हिसाब हो सके।
इस बड़े खुलासे ने बीजेपी और एनडीए गठबंधन को असहज स्थिति में खड़ा कर दिया है। चुनाव के समय जहां पार्टी सुशासन और विकास की उपलब्धियों के दम पर वोट मांग रही है, वहीं अपने ही वरिष्ठ नेता का इस तरह भ्रष्टाचार का आरोप लगाना सत्ता पक्ष की छवि के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है। विपक्ष—खासकर राजद और कांग्रेस—ने इसे तुरंत लपकते हुए कहा कि मोदी-अडानी की साठगांठ की पोल अब बीजेपी नेता ही खोल रहे हैं। विपक्ष का आरोप है कि यह तो केवल हिमशिला का शीर्ष है और बिहार की व्यवस्था में नीचे तक गहरी भ्रष्टाचार की जड़ें फैली हुई हैं।
चुनाव विश्लेषकों का मानना है कि मतदान से ठीक पहले आया यह “भ्रष्टाचार बम” मतदाताओं के बीच अविश्वास को बढ़ा सकता है, खासकर तब जब मामला बिजली बिल, महंगाई और पब्लिक फंड से सीधे जुड़ा हो। आर.के. सिंह की साख, उनकी ईमानदार छवि और मंत्री पद पर उनके कार्यकाल की प्रतिष्ठा इस आरोप को और वजनदार बनाती है। इसलिए इसे सिर्फ एक नाराज़ नेता का बयान मानकर नजरअंदाज करना सत्ता पक्ष के लिए मुश्किल हो सकता है।
फिलहाल बीजेपी और एनडीए की तरफ से इस मामले पर किसी वरिष्ठ नेता ने सार्वजनिक सफाई नहीं दी है। लेकिन अंदरखाने बेचैनी साफ महसूस की जा सकती है। यह देखने वाली बात होगी कि पार्टी इसे व्यक्तिगत मत कहकर किनारे लगाने की कोशिश करती है या फिर विस्तृत जवाब देकर स्थिति संभालने की रणनीति अपनाती है।
कुल मिलाकर, बिहार चुनाव के निर्णायक चरण में आया यह खुला आरोप सियासी समीकरणों को हिलाने की पूरी क्षमता रखता है। अब सबकी निगाहें इस बात पर हैं कि क्या यह मामला जांच की दिशा में आगे बढ़ता है और क्या बीजेपी इस असंतोष की आग को काबू कर पाएगी — या फिर यह मुद्दा चुनावी नतीजों में भी विस्फोट लेकर आएगा।



