एबीसी नेशनल न्यूज 11 जनवरी 2026
देश के लोकतांत्रिक ढांचे और संस्थागत समझ पर गंभीर सवाल खड़े करने वाला एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है। भारत के पूर्व नौसेना प्रमुख एडमिरल अरुण प्रकाश को चुनाव आयोग की ओर से SIR (Special Intensive Revision) प्रक्रिया के तहत नोटिस जारी किया गया है। इस नोटिस में उनसे और उनकी पत्नी से यह कहा गया है कि वे स्थानीय अधिकारी के सामने हाज़िर होकर यह साबित करें कि वे भारतीय नागरिक हैं। यह आदेश सिर्फ एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि देश की संवेदनशीलता, सम्मान और विवेक को झकझोर देने वाला है।
एडमिरल अरुण प्रकाश कोई सामान्य नागरिक नहीं हैं। वे 1968 से पणजी, गोवा में रह रहे हैं और उन्होंने भारत की नौसेना में दशकों तक सेवा दी है। 1971 के बांग्लादेश युद्ध, उसके बाद के कई सैन्य अभियानों और करगिल युद्ध जैसे अहम दौर में उनकी भूमिका रही है। अपने करियर की शुरुआत उन्होंने देश के पहले विमानवाहक पोत INS विक्रांत से की थी। जिस आदमी ने समुद्र में खड़े होकर देश की सीमाओं की रक्षा की, आज उसी से ज़मीन पर खड़े होकर यह पूछा जा रहा है कि वह किस देश का नागरिक है—यह विरोधाभास अपने आप में बेहद असहज करने वाला है।
एडमिरल अरुण प्रकाश को उनके असाधारण सैन्य योगदान के लिए देश के सर्वोच्च सम्मानों में गिने जाने वाले परम विशिष्ट सेवा मेडल (PVSM), अति विशिष्ट सेवा मेडल (AVSM), वीर चक्र (VrC) और विशिष्ट सेवा मेडल (VSM) से नवाज़ा जा चुका है। ये सम्मान किसी राजनीतिक कृपा से नहीं, बल्कि युद्ध, रणनीति और राष्ट्र सेवा में दिए गए वास्तविक योगदान के प्रमाण हैं। इसके बावजूद, चुनाव आयोग की प्रक्रिया में यह तथ्य कहीं पीछे छूटता दिख रहा है और काग़ज़ी औपचारिकताएं इंसान और उसके जीवन भर के कर्मों से बड़ी बना दी गई हैं।
यह मामला सिर्फ एक व्यक्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस व्यवस्था पर सवाल उठाता है जहां नागरिकता को सेवा, बलिदान और पहचान से अलग कर सिर्फ दस्तावेज़ों तक सीमित कर दिया गया है। अगर देश का पूर्व नौसेना प्रमुख भी संदेह के दायरे में आ सकता है, तो आम नागरिक की स्थिति का अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं है। क्या अब यह मान लिया जाए कि जिन लोगों ने वर्दी पहनकर देश की रक्षा की, उन्हें रिटायरमेंट के बाद सबसे पहले अपनी नागरिकता साबित करनी होगी?
चुनाव आयोग की SIR प्रक्रिया का उद्देश्य मतदाता सूची को दुरुस्त करना हो सकता है, लेकिन इस प्रक्रिया में संवेदनशीलता और विवेक की कमी साफ दिखती है। किसी भी लोकतांत्रिक संस्था से यह अपेक्षा की जाती है कि वह नियमों के साथ-साथ संदर्भ और व्यक्ति की पृष्ठभूमि को भी समझे। यहां सवाल यह नहीं है कि प्रक्रिया हो या न हो, सवाल यह है कि क्या हर प्रक्रिया अंधी होनी चाहिए? क्या देश की संस्थाएं अब इतना भी फर्क नहीं कर पा रही हैं कि कौन फर्जी है और कौन वह आदमी है जिसने अपना पूरा जीवन इसी देश के नाम कर दिया?
इस पूरे घटनाक्रम ने यह चिंता भी पैदा कर दी है कि कहीं प्रशासनिक सख्ती मानवीय समझ और राष्ट्रीय सम्मान पर भारी तो नहीं पड़ रही। आज अगर एक एडमिरल से नागरिकता का प्रमाण मांगा जा सकता है, तो कल यह सवाल किसी और पूर्व सैनिक, अधिकारी या आम नागरिक से भी पूछा जा सकता है। लोकतंत्र में संस्थाएं तभी मजबूत होती हैं, जब वे नियमों के साथ-साथ न्याय, सम्मान और सामान्य समझ को भी साथ लेकर चलें।
अंत में यह सवाल बेहद सीधा और गंभीर है— अगर एडमिरल अरुण प्रकाश को यह साबित करना पड़ रहा है कि वे भारतीय हैं, तो फिर इस देश में भारतीय होने का प्रमाण आखिर क्या है? यह खबर सिर्फ एक नोटिस की नहीं, उस सोच की है, जहां काग़ज़ इंसान से बड़ा और प्रक्रिया देशभक्ति से ऊपर रखी जा रही है।




