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प्रचार बनाम सच्चाई: ‘धुरंधर’ फ़िल्म, कंधार कांड और जवाबदेही से भागती विचारधारा

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एबीसी डेस्क 20 दिसंबर 2025

आज के The Hindu में प्रकाशित लेख ‘How Dhurandhar is a prime example of government-embedded filmmaking’ कोई साधारण फ़िल्म रिव्यू नहीं है, बल्कि यह एक वैचारिक आलोचना है—जो यह सवाल उठाती है कि सिनेमा कब राष्ट्रवाद के नाम पर सत्ता-समर्थित प्रचार में बदल जाता है। लेख यह साफ़ करता है कि फ़िल्म धुरंधर केवल एक जासूसी थ्रिलर नहीं, बल्कि एक ऐसी कहानी है जो इतिहास, राजनीति और पड़ोसी देश को देखने के हमारे नज़रिये को एकतरफ़ा ढंग से गढ़ती है। पाकिस्तान को केवल “आतंक का स्रोत” और भारत को “नैतिक रूप से निर्विवाद नायक” के रूप में दिखाना—यह वही सरलीकरण है, जिसे लेख “government-embedded filmmaking” कहता है।

लेकिन इस बहस में एक बेहद ज़रूरी तथ्य बार-बार या तो छुपा दिया जाता है या जानबूझकर उलट दिया जाता है। धुरंधर और उससे जुड़ा नैरेटिव यह संकेत देता है कि कंधार IC-814 अपहरण के दौरान “हिंदुओं को कायर” कहने वाली भाषा आतंकियों की थी। सच्चाई यह है कि ऐसा नहीं था। यह शब्दावली कंधार के आतंकियों की नहीं, बल्कि RSS नेतृत्व की थी। यह तथ्य दस्तावेज़ों और सार्वजनिक बयानों में दर्ज है—और इसे याद रखना आज इसलिए भी ज़रूरी है, क्योंकि प्रचार सिनेमा अक्सर असुविधाजनक सच्चाइयों को मिटा देता है।

24 दिसंबर 1999 को IC-814 विमान के अपहरण के बाद भारत सरकार को 155 यात्रियों और 11 क्रू सदस्यों की जान बचाने के लिए तीन आतंकियों को रिहा करना पड़ा। इस निर्णय की आलोचना हुई और इसे “राष्ट्रीय अपमान” कहा गया। लेकिन इस संकट के बीच, तत्कालीन RSS प्रमुख राजू भैय्या (राजेंद्र सिंह) ने पाञ्चजन्य में एक कॉलम लिखकर यह दावा किया कि यह घटना ‘हिंदू समाज में गहराई से जमी कायरता’ को उजागर करती है। उन्होंने लिखा कि अगर विमान में 8–10 युवा खड़े होकर आतंकियों का सामना करते, तो हालात बदल सकते थे। यात्रियों के परिजनों की चिंता को उन्होंने “असभ्य” और “गरिमा के विरुद्ध” करार दिया और ‘वीरता’ के नाम पर RSS की विचारधारा को आगे बढ़ाया। साफ़ संदेश था—जवाबदेही सरकार की नहीं, आम नागरिकों की है; और समाधान—RSS से जुड़ना।

यहीं से जवाबदेही को सत्ता से हटाकर जनता पर डालने की रणनीति साफ़ दिखती है। लेकिन बात यहीं नहीं रुकी। VHP के तत्कालीन कार्यकारी अध्यक्ष अशोक सिंघल ने एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस में यह तक कह दिया कि सरकार नहीं, बल्कि पायलट को साहस दिखाना चाहिए था—अगर पायलट में हिम्मत होती तो वह विमान उड़ाने से मना कर देता। इस बयान ने न केवल पीड़ितों की पीड़ा को नज़रअंदाज़ किया, बल्कि विमानन सुरक्षा और मानवीय जीवन की कीमत को भी अपमानित किया।

जब Hindustan Times के रिपोर्टर कैप्टन देवी शरण तक पहुँचे और उनसे प्रतिक्रिया मांगी, तो उन्होंने बेहद सधे और मानवीय शब्दों में जवाब दिया। उन्होंने कहा, “मैं नहीं जानता कि अशोक सिंघल कौन हैं, लेकिन उन्हें विमानन या निर्दोष ज़िंदगियों की कीमत की कोई समझ नहीं है।” कैप्टन शरण ने यह भी कहा, “अगर ‘हिंदू’ होने की बात है, तो सबसे पहले मैं एक इंसान हूँ। महाभारत में श्रीकृष्ण ने भी युद्ध से पहले हर संभव प्रयास किया था कि रक्तपात न हो।” उन्होंने यह सवाल भी उठाया कि क्या सिंघल ने संकट के दौरान यात्रियों या क्रू के परिवारों से कभी मुलाक़ात की?

इसके बाद कई यात्री सामने आए और अशोक सिंघल के बयान की तीखी निंदा की। कुछ यात्रियों ने पत्र लिखकर बताया कि 30 दिसंबर को जब बातचीत विफल हो गई और आतंकी विमान को हवा में उड़ाने की धमकी देने लगे, तब कैप्टन देवी शरण ने यात्रियों को आपातकालीन दरवाज़ा खोलने का तरीका समझाया। योजना यह थी कि वह विमान को उड़ने नहीं देंगे, बल्कि रनवे के अंत तक दौड़ाकर दीवार से टकरा देंगे, ताकि यात्री कूदकर बच सकें। इसका अर्थ साफ़ था—कैप्टन शरण अपनी जान कुर्बान करने को तैयार थे। यात्रियों ने पूछा, “अगर सिंघल इतने ही साहसी हैं, तो वे कंधार क्यों नहीं आए? उन्होंने हमें बचाने की कोशिश क्यों नहीं की?” इसके बाद संघ परिवार में इस विषय पर अचानक खामोशी छा गई।

यह पूरा प्रसंग इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि आज जब धुरंधर जैसी फ़िल्में इतिहास को सुविधाजनक कोण से दिखाती हैं, तब यह सच्चाइयाँ दब जाती हैं। फ़िल्में राष्ट्रवाद की आड़ में यह संदेश देती हैं कि संकट में जनता ही दोषी थी—सरकार नहीं; और वीरता का प्रमाण हथियार उठाना है—जीवन बचाना नहीं। यही वह विचारधारा है, जो वास्तविक बहादुरी—जैसे कैप्टन देवी शरण का साहस—को हाशिये पर डाल देती है।

यह भी उल्लेखनीय है कि 1925 में दशहरा के दिन बनी RSS के पास स्वतंत्रता से पहले 22 वर्ष थे, लेकिन स्वतंत्रता आंदोलन में उसकी भूमिका पर गंभीर सवाल हैं। इसके बावजूद आज वही विचारधारा राष्ट्रवाद का प्रमाणपत्र बाँटती है और इतिहास को अपने पक्ष में ढालने के लिए सिनेमा जैसे प्रभावशाली माध्यम का सहारा लेती है। धुरंधर पर उठी आलोचना इसी संदर्भ में महत्वपूर्ण है—क्योंकि यह याद दिलाती है कि सिनेमा जब सत्ता की भाषा बोलने लगे, तो नागरिकों का काम और भी ज़रूरी हो जाता है कि वे सवाल पूछें।

यह बहस किसी एक फ़िल्म तक सीमित नहीं है। यह सवाल है कि क्या हम प्रचार को इतिहास मान लेंगे, या सच्चाई को—भले ही वह असहज क्यों न हो—सामने रखेंगे? कंधार कांड हमें यह सिखाता है कि सच्ची वीरता शोर में नहीं, बल्कि जिम्मेदारी, करुणा और मानव जीवन की रक्षा में होती है। और जब सिनेमा इस सच्चाई को ढकने लगे, तब तथ्य और स्मृति ही सबसे बड़ा प्रतिरोध बनते हैं।

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