प्रो. शिवाजी सरकार, अर्थशास्त्री | नई दिल्ली 29 दिसंबर 2025
हर सर्दी एक ही सवाल, हर साल वही जवाब
दिल्ली में सर्दी आते ही हवा भारी हो जाती है। धूप धुंध में बदल जाती है, आंखों में जलन, गले में खराश और सांस में घुटन आम हो जाती है। स्कूलों के बाहर मास्क लगाए बच्चे दिखते हैं, बुज़ुर्ग सुबह की सैर छोड़ देते हैं और अस्पतालों की OPD में भीड़ बढ़ जाती है। हर साल सरकार नए आदेश लाती है—GRAP लागू होता है, निर्माण रुकता है, ट्रकों की एंट्री बंद होती है और फिर अचानक कारों पर गाज गिरती है। संदेश साफ़ होता है—दिल्ली की हवा खराब है, और इसकी सबसे बड़ी वजह आपकी कार है। लेकिन आम आदमी के मन में एक सवाल लगातार उठता है—अगर कारें ही इतनी बड़ी समस्या हैं, तो सालों से पाबंदियां लगने के बावजूद हवा हर साल और ज़हरीली क्यों होती जा रही है?
आसान दुश्मन की तलाश: कार मालिक क्यों बन गया अपराधी
प्रदूषण एक जटिल समस्या है, जिसके पीछे कई कारण हैं। लेकिन जटिल समस्याओं के लिए आसान दुश्मन ढूंढना नीति निर्माताओं के लिए सुविधाजनक होता है। कारें दिखती हैं, उनके मालिक पकड़े जा सकते हैं, चालान काटा जा सकता है। इसके उलट कोयले से चलने वाले बिजलीघर दूर होते हैं, बड़े उद्योग राजनीतिक रूप से ताक़तवर होते हैं और उन पर हाथ डालना आसान नहीं। नतीजा यह होता है कि कार मालिक—जो पहले ही टैक्स, टोल और ईंधन की मार झेल रहा है—एक झटके में ‘प्रदूषण फैलाने वाला’ घोषित कर दिया जाता है। शहर की हवा की पूरी जिम्मेदारी उसी के कंधों पर डाल दी जाती है।
GRAP और रोज़मर्रा की ज़िंदगी का ठहराव
GRAP लागू होते ही दिल्ली की रफ्तार थम जाती है। किसी दिन ऑड-ईवन, किसी दिन पुराने वाहनों की एंट्री बंद, तो किसी दिन निर्माण गतिविधियों पर रोक। ऑफिस जाने वाला आदमी असमंजस में रहता है—आज गाड़ी चलेगी या नहीं? टैक्सी मिलेगी या नहीं? स्कूल खुलेंगे या बंद रहेंगे?
यह सब अस्थायी राहत जैसा दिखता है, लेकिन स्थायी समाधान नहीं बन पाता। क्योंकि असली स्रोतों पर ठोस कार्रवाई नहीं होती।
स्क्रैपेज नीति: पर्यावरण का सपना या उद्योग का अवसर?
सरकार ने वाहन स्क्रैपेज नीति को पर्यावरण सुधार की बड़ी पहल के रूप में पेश किया। कहा गया कि पुरानी गाड़ियां हटेंगी, नई और साफ़ गाड़ियां आएंगी, हवा बेहतर होगी। सुनने में यह सब बहुत अच्छा लगता है। लेकिन ज़मीनी हकीकत कुछ और है। एक अच्छी हालत की कार, जिसे मालिक सालों तक संभालकर रखता है, अचानक सिर्फ़ उम्र के आधार पर ‘अनफिट’ घोषित कर दी जाती है। उसकी असली उपयोगिता लाखों में होती है, लेकिन स्क्रैप में उसकी कीमत 15–20 हज़ार रुपये लगा दी जाती है। मालिक के लिए यह सिर्फ़ गाड़ी का नुकसान नहीं, उसके भरोसे, उसकी योजना और उसकी आर्थिक स्थिरता पर चोट होती है।
मध्यम वर्ग पर दोहरी मार
भारत का मध्यम वर्ग कार को शौक़ से नहीं, ज़रूरत से खरीदता है। सालों की बचत, लोन और EMIs के बाद गाड़ी घर आती है। परिवार सोचता है कि इसे कम से कम 12–15 साल चलाया जाएगा। लेकिन स्क्रैपेज नीति इस पूरे गणित को पलट देती है। 7–8 साल की EMI अभी चल ही रही होती है कि नई कार लेने का दबाव बन जाता है। स्क्रैप सर्टिफिकेट, टैक्स छूट और थोड़ी-सी डीलर छूट को ‘फायदा’ बताकर पेश किया जाता है, जबकि असल में यह मजबूरी होती है।
उत्सर्जन का तर्क और अधूरा विज्ञान
सरकार का मुख्य तर्क यह है कि नई BS-VI कारें पुरानी कारों की तुलना में कहीं ज़्यादा साफ़ हैं। लेकिन वैज्ञानिक अध्ययन बताते हैं कि शहर की कुल प्रदूषित हवा में कारों का योगदान सीमित है। असल समस्या PM2.5 जैसे महीन कण हैं, जो कोयला आधारित बिजलीघरों से निकलने वाली गैसों के रासायनिक मिश्रण से बनते हैं। सर्दियों में मौसम की स्थितियां इस ज़हर को ज़मीन के पास रोक लेती हैं, जिससे हालात और बिगड़ जाते हैं। यानी जिस समय दिल्ली सबसे ज़्यादा दम घुटती है, उस समय कारें नहीं, बल्कि दूर बैठे प्रदूषक ज़्यादा ज़िम्मेदार होते हैं।
कोयला: कमरे में खड़ा हाथी
कोयला भारत की ऊर्जा व्यवस्था की रीढ़ है। बिजली, उद्योग और रोज़गार—सब इससे जुड़े हैं। इसलिए कोयले पर सख़्ती करना राजनीतिक रूप से जोखिम भरा है।
इसके उलट कारों पर सख़्ती करना आसान है। न बड़े विरोध की चिंता, न उद्योगों के ठप होने का डर। यही वजह है कि नीति कारों पर केंद्रित रहती है और कोयला लगभग अछूता रहता है।
नई कारों का जबरन बाज़ार
स्क्रैपेज नीति का एक बड़ा असर यह है कि यह नए वाहनों के लिए जबरन बाज़ार तैयार करती है। लोग अपनी मर्जी से नहीं, मजबूरी में नई कार खरीदते हैं। इससे ऑटो कंपनियों की बिक्री बढ़ती है, डीलरों का कारोबार चमकता है और बैंक नए लोन बांटते हैं। अर्थव्यवस्था के कुछ हिस्सों को इससे फ़ायदा होता है, लेकिन आम आदमी पर बोझ बढ़ता है।
कबाड़ भी सोना है
स्क्रैप की गई कारें उद्योग के लिए कच्चे माल का सस्ता स्रोत बन जाती हैं। स्टील, एल्युमिनियम, तांबा—सब कुछ दोबारा इस्तेमाल होता है। इससे कंपनियों की लागत घटती है और मुनाफ़ा बढ़ता है। यानी पुरानी कार बेचकर भी फायदा, नई कार बेचकर भी फायदा—पूरा सिस्टम उद्योग के पक्ष में काम करता है।
EV का आकर्षक भविष्य और अनदेखे सवाल
इलेक्ट्रिक वाहनों को भविष्य का समाधान बताया जा रहा है। शहरों में चार्जिंग स्टेशन, सब्सिडी और प्रचार अभियान चल रहे हैं। लेकिन सवाल यह है कि EV बैटरियों का क्या होगा जब वे बेकार होंगी? लिथियम खनन से होने वाला पर्यावरण नुकसान कौन झेलेगा? इन सवालों पर गंभीर चर्चा कम होती है।
स्पेयर पार्ट्स और सर्विस का असली खेल
ऑटो उद्योग का असली मुनाफ़ा नई कार बेचने में नहीं, बल्कि उसके बाद शुरू होता है—स्पेयर पार्ट्स, सर्विस और वारंटी में। पुरानी कारें लोकल मैकेनिक से सस्ते में चल जाती हैं। स्क्रैपेज नीति इस विकल्प को खत्म कर देती है और उपभोक्ता को महंगे सर्विस नेटवर्क में बांध देती है।
डर, जांच और भ्रष्टाचार की आशंका
सड़कों पर जांच, जब्ती और चालान का डर आम आदमी की ज़िंदगी में तनाव घोल देता है। जहां नियम सख़्त और विवेकाधिकार ज़्यादा होता है, वहां भ्रष्टाचार की गुंजाइश भी बढ़ जाती है। सफ़र अब सुविधा नहीं, चिंता बन जाता है।
क्या सच में हवा साफ़ हो रही है?
सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या इन सब उपायों से दिल्ली की हवा वाकई साफ़ हो रही है? आंकड़े बताते हैं कि जवाब ‘नहीं’ है। हर साल वही हालात, वही चेतावनियां और वही पाबंदियां। फर्क सिर्फ़ इतना है कि आम आदमी की जेब हल्की होती जा रही है।
समाधान कहां है?
दिल्ली की हवा को साफ़ करने के लिए ईमानदार विज्ञान और साहसिक नीति की ज़रूरत है। कोयले, उद्योग, निर्माण धूल और क्षेत्रीय प्रदूषण पर गंभीर कार्रवाई के बिना हालात नहीं बदलेंगे। कारों को दोषी ठहराकर असली समस्या से ध्यान हटाना आसान है, लेकिन टिकाऊ नहीं।
सांस और सच दोनों बचाने की ज़रूरत
दिल्ली को साफ़ हवा चाहिए, लेकिन उससे पहले साफ़ सोच। जब तक नीतियां मुनाफ़े और सुविधा के हिसाब से बनती रहेंगी, तब तक आम आदमी की सांस भी घुटेगी और उसका भरोसा भी। समय आ गया है कि हवा के नाम पर दिखावे की नहीं, सच और न्याय की राजनीति हो—ताकि शहर भी बचे और उसका आदमी भी।




