एबीसी नेशनल न्यूज | नई दिल्ली | 16 मार्च 2026
अमेरिकी आयोग United States Commission on International Religious Freedom (USCIRF) की 2026 वार्षिक रिपोर्ट सामने आने के बाद भारत की राजनीति में नया विवाद खड़ा हो गया है। रिपोर्ट में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ Rashtriya Swayamsevak Sangh (RSS) को लेकर की गई सिफारिशों का हवाला देते हुए कांग्रेस ने संगठन पर प्रतिबंध लगाने की मांग उठाई है।
कांग्रेस से जुड़े कई नेताओं और संगठनों ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट करते हुए कहा कि USCIRF ने अपनी रिपोर्ट में RSS पर टार्गेटेड प्रतिबंध लगाने की सिफारिश की है। इसमें संगठन से जुड़े लोगों की अमेरिका में एंट्री पर रोक, संपत्तियों को फ्रीज करने और अन्य कार्रवाई की बात कही गई है। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि यदि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऐसे आरोप सामने आ रहे हैं तो भारत में भी इस पर गंभीर चर्चा होनी चाहिए।
कांग्रेस से जुड़े संगठनों जैसे ऑल इंडिया कांग्रेस सेवादल और अन्य नेताओं ने अपने पोस्ट में यह भी याद दिलाया कि महात्मा गांधी की हत्या के बाद देश के पहले गृह मंत्री Sardar Vallabhbhai Patel ने 1948 में RSS पर प्रतिबंध लगाया था। उनका कहना है कि यदि किसी संगठन की विचारधारा संविधान और सामाजिक सौहार्द के खिलाफ मानी जाती है, तो उस पर कार्रवाई पर विचार होना चाहिए।
कांग्रेस की राष्ट्रीय प्रवक्ता Supriya Shrinate सहित कई नेताओं ने भी इस रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि RSS को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं और इस पर देश में खुली बहस होनी चाहिए। विपक्ष का तर्क है कि धार्मिक स्वतंत्रता और अल्पसंख्यक अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर सरकार को स्पष्ट रुख अपनाना चाहिए।
हालांकि भाजपा और सरकार की ओर से अभी तक इस रिपोर्ट पर औपचारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। पिछले वर्षों में भारत सरकार USCIRF की रिपोर्टों को पक्षपाती और राजनीतिक रूप से प्रेरित बताकर खारिज करती रही है। सरकार का कहना रहा है कि भारत एक मजबूत लोकतंत्र है और धार्मिक स्वतंत्रता के मुद्दों को लेकर बाहरी संस्थाओं की टिप्पणियां वास्तविक स्थिति को सही ढंग से नहीं दर्शातीं।
गौरतलब है कि USCIRF एक स्वतंत्र अमेरिकी आयोग है जो दुनिया भर में धार्मिक स्वतंत्रता की स्थिति पर रिपोर्ट जारी करता है और अमेरिकी सरकार को नीति संबंधी सिफारिशें देता है। हालांकि उसकी सिफारिशें बाध्यकारी नहीं होतीं और अंतिम फैसला अमेरिकी प्रशासन और विदेश विभाग के स्तर पर लिया जाता है। इस रिपोर्ट के बाद भारत में राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। आने वाले दिनों में यह मुद्दा संसद, राजनीतिक मंचों और अंतरराष्ट्रीय संबंधों की चर्चा में भी प्रमुख विषय बन सकता है।




