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छत्तीसगढ़ की राजनीति: आदिवासी आस्था बनाम राजनीतिक आकांक्षा की टक्कर

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1 जुलाई 2025
छत्तीसगढ़ की राजनीति की आत्मा उसकी ज़मीन में है — वह ज़मीन जो खनिजों से भरपूर है, लेकिन उससे कहीं अधिक आदिवासी अस्मिता, सांस्कृतिक विविधता और जनसंघर्षों से सींची गई है। राज्य गठन के दो दशक बाद, अब यह राजनीति एक नए चौराहे पर खड़ी है, जहां सत्ता की रेखाएं सिर्फ दलों के घोषणापत्रों से नहीं, बल्कि आदिवासी जनभावनाओं, शहरी आकांक्षाओं और विकास के बदलते विमर्श से खिंच रही हैं।
2018 में जब कांग्रेस ने छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल के नेतृत्व में प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता संभाली, तब उन्होंने इसे किसान हितैषी और जनजातीय उन्नयन वाली सरकार का रूप देने की कोशिश की। राजीव गांधी किसान न्याय योजना, गोधन न्याय योजना, और भूमिहीन कृषि श्रमिक न्याय योजना जैसी योजनाओं ने ग्रामीण और आदिवासी समाज में कांग्रेस की जड़ें मज़बूत कीं। लेकिन 2023 के चुनावी परिणामों ने यह दिखा दिया कि जनहित योजनाओं के बावजूद सत्ता के समीकरण कब बदल जाएं, इसकी गारंटी कोई नहीं दे सकता। भाजपा ने आदिवासी क्षेत्रों में एक संगठित और रणनीतिक अभियान चलाकर सत्ता वापसी कर ली। विशेष रूप से बस्तर, सरगुजा, और कोरबा जैसे क्षेत्रों में पार्टी ने समाज के भीतर गहराई तक संवाद कायम किया।
भारतीय जनता पार्टी ने जिस चुपचाप दृढ़ता से आदिवासी रणनीति को जमीन पर उतारा, वह एक बड़े राजनीतिक बदलाव का संकेतक बना। उन्होंने स्थानीय नेतृत्व को आगे बढ़ाया, और केंद्र की योजनाओं जैसे कि जल जीवन मिशन, उज्ज्वला योजना और आयुष्मान भारत को गांव-गांव तक पहुंचाकर एक ऐसी जमीनी पकड़ बनाई जिसे नकारा नहीं जा सकता। इसके साथ-साथ आरएसएस की बैकग्राउंड में सक्रिय इकाइयों ने आदिवासी समाज में शिक्षा, सेवा और संस्कृति के नाम पर स्थायी प्रभाव छोड़ा।
आज छत्तीसगढ़ की राजनीति केवल कांग्रेस बनाम भाजपा नहीं रही, यह “राज्य की पहचान बनाम नए भारत का विज़न” के बीच की बहस बन चुकी है। आदिवासी समुदाय अब सिर्फ वोट बैंक नहीं रह गया है, बल्कि वह अपनी राजनीतिक चेतना, संस्कृति की रक्षा और संसाधनों पर अधिकार को लेकर मुखर हो चुका है। यहीं से राजनीति की असली परीक्षा शुरू होती है — क्या पार्टियाँ इन जनजातीय आकांक्षाओं के साथ न्याय कर सकेंगी, या उन्हें सिर्फ चुनावी कार्ड की तरह इस्तेमाल करेंगी?
भविष्य की राजनीति में “संघीय बनाम स्थानीय” और “समाज कल्याण बनाम पूंजी निवेश” जैसे प्रश्न भी निर्णायक होंगे। बस्तर में बुलेट ट्रेन की नहीं, बल्कि स्कूल, अस्पताल और स्थानीय भाषा में शिक्षा की ज़रूरत है। रायपुर के कॉरपोरेट सम्मेलनों में ग्लोबल इनवेस्टर्स की तस्वीरें चमकती हैं, वहीं सुकमा और बीजापुर के जंगलों में आज भी कई गांव ऐसे हैं जहां सरकारी योजनाएं अब भी पोस्टरों से आगे नहीं पहुंचीं।
नवाचार, स्थानीय नेतृत्व, और संवेदनशील प्रशासन — यही छत्तीसगढ़ की राजनीति का अगला एजेंडा होना चाहिए। वरना सत्ता बदलती रहेगी, लेकिन ज़मीन पर कुछ नहीं बदलेगा। आदिवासी इलाकों में राजनीतिक विश्वास तभी गहरा होगा जब सत्ता उनके द्वार पर सिर झुकाकर पहुंचेगी, केवल नारा देकर नहीं।
छत्तीसगढ़ की राजनीतिक यात्रा अब अपनी किशोरावस्था से निकल कर परिपक्वता की ओर बढ़ रही है। लेकिन यह परिपक्वता तब ही सार्थक होगी जब विकास के नाम पर सिर्फ रायपुर को नहीं, बस्तर और सरगुजा को भी बराबर का दर्जा मिले। अगली लड़ाई जातीय समीकरणों की नहीं, सामाजिक न्याय की होगी — और यही तय करेगा कि कौन बनेगा छत्तीसगढ़ का असली प्रतिनिधि।
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