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Starlink मीटिंग पर सियासत तेज: ‘मस्क कनेक्शन’ पर सरकार घिरी, स्पेक्ट्रम से लेकर इंटरनेट स्पीड तक उठे तीखे सवाल

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राष्ट्रीय/ टेक्नोलॉजी | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 2 अप्रैल 2026

टेलीकॉम सेक्टर में सैटेलाइट इंटरनेट सेवा Starlink को लेकर राजनीतिक माहौल अचानक गरमा गया है और केंद्र सरकार विपक्ष के सीधे निशाने पर आ गई है। केंद्रीय मंत्री Jyotiraditya Scindia की SpaceX की प्रेसिडेंट Gwynne Shotwell और Starlink की वाइस प्रेसिडेंट Lauren Dreyer के साथ हुई मुलाकात ने इस पूरे विवाद को हवा दे दी है। इस बैठक में भारत में सैटेलाइट इंटरनेट सेवाओं के विस्तार और मेघालय जैसे दूरदराज इलाकों में पायलट प्रोजेक्ट शुरू करने पर चर्चा हुई, लेकिन इस मुलाकात के तुरंत बाद राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया।

कांग्रेस ने इस घटनाक्रम को महज एक सामान्य सरकारी प्रक्रिया मानने से इनकार कर दिया है और इसे एक बड़े “पॉलिटिकल-कारपोरेट कनेक्शन” के रूप में पेश किया है। पार्टी की प्रवक्ता Supriya Shrinate ने आरोप लगाया कि फरवरी 2025 में Elon Musk और प्रधानमंत्री Narendra Modi की मुलाकात के बाद से ही Starlink के लिए रास्ते तेजी से साफ किए गए। कांग्रेस के मुताबिक, जून 2025 में लंबित GMPCS लाइसेंस का अचानक मंजूर होना और अब उच्च स्तर की बैठकों का सिलसिला इस पूरे मामले को संदेह के घेरे में खड़ा करता है।

सबसे बड़ा और संवेदनशील मुद्दा स्पेक्ट्रम आवंटन को लेकर उठाया जा रहा है। कांग्रेस का आरोप है कि सरकार नीलामी की पारदर्शी प्रक्रिया को दरकिनार कर सीधे आवंटन का रास्ता अपना रही है, जो न केवल नीतिगत सवाल खड़े करता है बल्कि सरकार के पुराने रुख से भी टकराता है। 2जी स्पेक्ट्रम विवाद के समय बीजेपी द्वारा “पहले आओ, पहले पाओ” नीति का कड़ा विरोध और नीलामी की मांग आज विपक्ष के तर्क का आधार बन गई है। कांग्रेस ने Supreme Court of India के 2012 के फैसले की याद दिलाते हुए कहा कि पारदर्शिता और अधिकतम राजस्व के लिए नीलामी जरूरी बताई गई थी, लेकिन अब वही सिद्धांत पीछे छोड़ दिए गए हैं।

इस पूरे विवाद के बीच एक और बड़ा सवाल तेजी से उभर रहा है—क्या भारत में इंटरनेट की मौजूदा गति और गुणवत्ता को जानबूझकर नजरअंदाज किया जा रहा है ताकि सैटेलाइट इंटरनेट सेवाओं के लिए जमीन तैयार की जा सके? विपक्षी हलकों में यह चर्चा तेज है कि क्या पारंपरिक ब्रॉडबैंड और मोबाइल इंटरनेट की समस्याओं को सुधारने के बजाय सरकार एक विदेशी कंपनी के मॉडल को बढ़ावा देने में ज्यादा दिलचस्पी दिखा रही है। हालांकि इस दावे का कोई आधिकारिक प्रमाण सामने नहीं आया है, लेकिन राजनीतिक बयानबाजी में यह सवाल अब प्रमुखता से उठने लगा है।

कांग्रेस ने सरकार पर “दोहरा मापदंड” अपनाने का आरोप लगाते हुए कहा है कि जब विपक्ष सत्ता में था, तब नीतिगत फैसलों को भ्रष्टाचार करार दिया गया, लेकिन अब वही तरीके अलग नाम और तर्कों के साथ अपनाए जा रहे हैं। पार्टी का कहना है कि “राजस्व अधिकतम करने” की बात सिर्फ एक राजनीतिक नारा बनकर रह गई है और असल में नीतियां चुनिंदा कंपनियों को फायदा पहुंचाने के लिए बदली जा रही हैं।

वहीं सरकार की तरफ से अभी तक इन आरोपों पर कोई सीधा जवाब नहीं आया है, जिससे राजनीतिक तापमान और बढ़ गया है। टेलीकॉम सेक्टर, जो देश की डिजिटल अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता है, अब एक बड़े राजनीतिक विवाद के केंद्र में आ चुका है। आने वाले दिनों में यह मुद्दा सिर्फ तकनीकी या नीतिगत बहस तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह सीधे तौर पर पारदर्शिता, नीति-निर्माण और सरकार की मंशा पर सवाल खड़ा करता रहेगा।

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