महेंद्र सिंह। नई दिल्ली 8 दिसंबर 2025
लोकसभा में इतिहास और राष्ट्रवाद पर चली बहस रविवार को उस समय और तीखी हो गई जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा की गई टिप्पणी को विपक्ष ने “बेमिसाल विकृति और सच्चाई से खिलवाड़” बताते हुए कड़ा प्रतिवाद दर्ज कराया। पीएम द्वारा यह कहे जाने के बाद कि नेहरू और कांग्रेस के नेताओं ने ‘वंदे मातरम्’ को लेकर तुष्टीकरण किया, विपक्ष ने सीधे-सीधे गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर का हवाला देते हुए पीएम को “Master Distorian”— भूगोल और इतिहास दोनों का विकृतिकर्ता—कहा और कहा कि प्रधानमंत्री ने न केवल भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पर असत्य आरोप लगाए, बल्कि गुरुदेव टैगोर के विचारों का भी अपमान किया।
विपक्ष के नेताओं ने प्रधानमंत्री के दावे को गलत साबित करने के लिए Rabindra-Jeebanee (Vol. 4) के पृष्ठ 110 से 112 तक के मूल दस्तावेज़ सदन में पेश किए—यह जीवनी विश्वभारती द्वारा प्रकाशित, प्रभात कुमार मुखोपाध्याय की वह आधिकारिक श्रृंखला है जिसे टैगोर के जीवन और विचारों का सबसे विश्वसनीय संदर्भ माना जाता है। इन पन्नों में टैगोर स्वयं कहते हैं कि वंदे मातरम् के प्रथम दो पदों में कोई ऐसा तत्व नहीं है जिससे किसी को आपत्ति होनी चाहिए, और उन्होंने स्वयं इसे कलकत्ता कांग्रेस के मंच से गाया था। गुरुदेव ने साफ कहा कि गीत के पहले दो हिस्से इतने स्वाभाविक, मधुर और सार्वभौमिक हैं कि किसी समुदाय के लिए उन्हें आपत्तिजनक कहना आधारहीन है—“अच्छा भाव न रखने वाला ही इसमें दोष ढूंढ सकता है।” विपक्ष का आरोप था कि मोदी ने जानबूझकर गुरुदेव के विचारों को तोड़ा-मरोड़ा और नेहरू पर ऐसी बातें थोपीं जिनका कोई ऐतिहासिक आधार ही नहीं है।
इतिहास को लेकर यह टकराव तब और गहराया जब विपक्ष ने तीन महत्वपूर्ण प्रश्न सामने रखे—ऐसे प्रश्न जिनका जवाब प्रधानमंत्री या भाजपा कभी नहीं देते। पहला, 1940 के दशक की शुरुआत में बंगाल में किस भारतीय नेता ने उस व्यक्ति के साथ सरकार बनाई जिसने मार्च 1940 में पाकिस्तान प्रस्ताव पेश किया था? विपक्ष ने रिकॉर्ड प्रस्तुत करते हुए कहा—वह थे श्यामा प्रसाद मुखर्जी, जिन्हें भाजपा अपना वैचारिक पुरोधा मानती है। दूसरा प्रश्न—2005 में कराची जाकर जिन्ना की खुलकर प्रशंसा किस भारतीय नेता ने की? विपक्ष ने उत्तर दिया—L.K. Advani। तीसरा—2009 में जिन्ना की सराहना किस नेता ने अपनी पुस्तक में की? जवाब—जसवंत सिंह, भाजपा के वरिष्ठ नेता। विपक्ष का तर्क साफ था कि इतिहास का बोझ उठाना हो तो भाजपा अपने ही घर से शुरुआत करे, कांग्रेस या नेहरू पर मिथ्या आरोप न लगाए।
दूसरी ओर, गुरुदेव टैगोर के उद्धरणों और उनके लेखन से यह साबित किया गया कि उन्होंने स्पष्ट रूप से ‘वंदे मातरम्’ के पहले दो पदों को भारत के राष्ट्रीय स्वरूप के अनुरूप माना था। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि पूरा गीत, अपने धार्मिक संदर्भों के कारण, कुछ समुदायों में आपत्ति पैदा कर सकता है, लेकिन प्रथम भाग की राष्ट्रीय स्वीकृति और प्रतीकात्मकता निर्विवाद थी। टैगोर ने लिखा था कि इसे लेकर गलत व्याख्या करने या सांप्रदायिक विवाद खड़ा करने का प्रयास राष्ट्रहित के विरुद्ध होगा, क्योंकि यह गीत उन युवाओं के बलिदानों से जुड़ा है जिन्होंने स्वतंत्रता संघर्ष में अपना जीवन न्योछावर किया।
विपक्ष का कहना है कि प्रधानमंत्री ने एक बार नहीं बल्कि कई बार बजट, सदन और चुनावी भाषणों में टैगोर को गलत रूप में उद्धृत किया है और आज फिर उसी गलती को दोहराया है। “जब आधिकारिक जीवनी मौजूद है, जब गुरुदेव के मूल लेख मौजूद हैं, जब विश्वभारती स्वयं इस बात की पुष्टि करती है, तब भी यदि प्रधानमंत्री गलत तथ्य पेश करते हैं, तो यह अज्ञानता नहीं—जानबूझकर किया गया विकृतिकरण है,” विपक्ष ने आरोप लगाया।
सदन में विपक्षी सांसदों ने मांग की कि प्रधानमंत्री गुरुदेव टैगोर और नेहरू के प्रति अपने बयान के लिए देश से माफी मांगें। उनका कहना है कि इतिहास को तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत करने की यह प्रवृत्ति न केवल लोकतंत्र को कमजोर करती है, बल्कि राष्ट्रीय प्रतीकों—वंदे मातरम्, जन-गण-मन—और उनके रचनाकारों का भी अनादर करती है। “गुरुदेव कलाकार थे, दार्शनिक थे, राष्ट्रात्मा थे। उनकी रचनाओं को राजनीति की तंग खिड़की से देखना, राष्ट्र की सांस्कृतिक चेतना पर प्रहार है,” विपक्ष का यह concluding remark था, जिसने सदन को एक बार फिर असहज खामोशी में डुबो दिया।
इतिहास Tampered करने के आरोपों के बीच यह बहस अब केवल संसद की नहीं रही; यह सवाल राष्ट्रीय विमर्श में बदल चुकी है—क्या भारत को भविष्य बचाने के लिए अपने अतीत से फिर से परिचय कराने की जरूरत है?




