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PM CARES Fund: राहत नहीं, रहस्य — सत्ता, पैसा और जवाबदेही से भागने की पूरी कहानी — चाल, चरित्र और चेहरा

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एबीसी डेस्क | 31 दिसंबर 2025

महामारी में भरोसा मांगा गया, लेकिन ज़मीन पर जनता अकेली छोड़ दी गई

कारवां मैगज़ीन की स्पेशल रिपोर्ट पीएम केयर्स फंड को लेकर सत्ता की उस सबसे बड़ी नैतिक विफलता को बेनकाब करती है, जिसे सरकार आज तक ढकने की कोशिश कर रही है। कोरोना महामारी के दौरान जब देश श्मशानों की आग, अस्पतालों की चीख़ और ऑक्सीजन सिलेंडरों की कतारों में दम तोड़ते लोगों का गवाह था, तब सरकार ने जनता से “राष्ट्र के नाम पर” दान मांगा। कहा गया—यह फंड जान बचाएगा, सिस्टम को संभालेगा, संकट में काम आएगा। लेकिन सच्चाई यह रही कि दूसरी लहर में जब लोग सड़कों पर गिरते-पड़ते मदद मांग रहे थे, तब पीएम केयर्स फंड एक खामोश तमाशबीन बना रहा। यही नहीं, सरकार आज तक यह बताने की स्थिति में नहीं है कि उस भयावह दौर में इस फंड ने ठीक-ठीक क्या किया।

प्रधानमंत्री अध्यक्ष, मंत्री ट्रस्टी—फिर भी निजी? यह कैसा मज़ाक

सरकार कहती है कि PM CARES Fund सरकारी नहीं, बल्कि एक “पब्लिक चैरिटेबल ट्रस्ट” है। यह दलील सुनते ही पहला सवाल उठता है—दुनिया में ऐसा कौन-सा निजी ट्रस्ट है, जिसका अध्यक्ष प्रधानमंत्री और ट्रस्टी देश के सबसे ताकतवर मंत्री हों? सरकारी प्रतीक, सरकारी वेबसाइट, सरकारी अपीलें, सरकारी कर्मचारी—सब कुछ सरकारी, लेकिन जवाबदेही आते ही यह अचानक “निजी” हो जाता है। यह कोई प्रशासनिक भ्रम नहीं, बल्कि साफ़-साफ़ जवाबदेही से बचने की रणनीति है। जनता से पैसा लेते समय राष्ट्रवाद, और हिसाब मांगने पर कानूनी तकनीकी बहाने—यही PM CARES का असली चेहरा है।

RTI से बाहर, संसद से बाहर—लोकतंत्र से बाहर क्यों?

PM CARES Fund को जानबूझकर सूचना के अधिकार (RTI) कानून से बाहर रखा गया। संसद में इस पर चर्चा नहीं, CAG ऑडिट नहीं, सार्वजनिक रिपोर्टिंग नहीं। सवाल उठता है—आखिर क्यों? अगर फंड साफ़ है, खर्च जायज़ है और मंशा ईमानदार है, तो सरकार को किस बात का डर है? लोकतंत्र में पारदर्शिता डर से नहीं, आत्मविश्वास से आती है। PM CARES का RTI से भागना इस बात का सबूत है कि सरकार जनता को साझेदार नहीं, सिर्फ दाता मानती है—बिना सवाल पूछे पैसा देने वाला दाता।

NDRF को किनारे कर समानांतर फंड: सत्ता का निजी खजाना?

देश में पहले से राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष (NDRF) मौजूद था—संवैधानिक, पारदर्शी और CAG ऑडिट के दायरे में। फिर भी सरकार ने एक समानांतर फंड खड़ा किया, जो न संसद को जवाबदेह है, न जनता को। यह सवाल अब मासूम नहीं रहा—क्या PM CARES को इसलिए बनाया गया ताकि अरबों रुपए पर किसी संवैधानिक संस्था की निगरानी न हो? अगर ऐसा नहीं है, तो सरकार को साफ़-साफ़ जवाब देना होगा कि NDRF को दरकिनार करने की ज़रूरत क्यों पड़ी।

CAG से डर, निजी ऑडिटर से संतोष?

हजारों करोड़ रुपए, लाखों जिंदगियां और राष्ट्रीय आपदा—लेकिन CAG ऑडिट नहीं। सरकार कहती है कि निजी चार्टर्ड अकाउंटेंट पर्याप्त हैं। यह तर्क उतना ही खोखला है जितना यह कहना कि चुनाव निजी एजेंसी करवा ले। CAG से दूरी यह साफ़ दिखाती है कि सरकार संवैधानिक जांच से बचना चाहती है। सवाल अब सिर्फ ऑडिट का नहीं, बल्कि नीयत का है।

सरकारी कंपनियों और सैनिकों का पैसा, लेकिन हिसाब निजी?

PM CARES में आए पैसे का बड़ा हिस्सा सरकारी कंपनियों और सरकारी कर्मचारियों से आया। ONGC जैसी PSUs, दर्जनों सरकारी कंपनियां, CSR फंड, और यहां तक कि सेना, वायुसेना, नौसेना के जवानों की सैलरी से कटौती। यह पैसा निजी उद्योगपतियों का दान नहीं, बल्कि सार्वजनिक संसाधनों और सरकारी कर्मचारियों की मेहनत का पैसा है। फिर यह कैसे मान लिया जाए कि यह “निजी ट्रस्ट” का मामला है? सरकार को यह बताना होगा कि सैनिकों की सैलरी से लिया गया पैसा किस खाते में गया और किसके आदेश से खर्च हुआ।

चीनी कंपनियों का पैसा और राष्ट्रवाद की खोखली बातें

एक ओर सरकार चीनी ऐप्स के बहिष्कार का शोर मचाती रही, दूसरी ओर TikTok, Xiaomi, Huawei, Oppo, OnePlus जैसी चीनी कंपनियों से PM CARES में करोड़ों रुपये लिए गए—वह भी गलवान संघर्ष के समय। यह कैसा राष्ट्रवाद है, जहां मंच पर चीन का विरोध और पर्दे के पीछे उसका पैसा स्वीकार? और उससे भी बड़ा सवाल—विदेशी दानदाताओं की पूरी सूची आज तक क्यों नहीं जारी की गई? जब फंड को FCRA से छूट दी गई, तो पारदर्शिता की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है, घटती नहीं।

सूची नहीं, रिपोर्ट नहीं—तो भरोसा क्यों करें?

आज तक न दानदाताओं की पूरी सूची सार्वजनिक हुई, न खर्च का विस्तृत ब्यौरा। सरकार बार-बार कहती है—यह निजी ट्रस्ट है। लेकिन जनता पूछ रही है—जब पैसा जनता का है, तो हिसाब निजी कैसे हो गया? लोकतंत्र में भरोसा अंधा नहीं होता। भरोसा तथ्यों से बनता है, और PM CARES ने आज तक तथ्य देने से इनकार किया है।

यह फंड नहीं, लोकतंत्र की अग्निपरीक्षा

PM CARES Fund अब राहत कोष नहीं रहा। यह भारत के लोकतंत्र की अग्निपरीक्षा बन चुका है—जहां यह तय होगा कि सत्ता जनता से सवाल झेल सकती है या नहीं।
जब सवाल पूछने वालों को “राष्ट्रविरोधी” कहकर चुप कराने की कोशिश होती है, तो साफ़ हो जाता है कि समस्या सवाल में नहीं, जवाब में है।

जांच अब मांग नहीं, मजबूरी

PM CARES Fund काग़ज़ों में चाहे पब्लिक चैरिटेबल ट्रस्ट हो, लेकिन व्यवहार में यह सत्ता के संरक्षण में पला-बढ़ा, जवाबदेही से भागता हुआ कोष है। कारवां मैगज़ीन की रिपोर्ट एक स्पष्ट चेतावनी है—अगर PM CARES की स्वतंत्र, निष्पक्ष और सार्वजनिक जांच नहीं हुई, तो यह देश के इतिहास में भरोसे की सबसे बड़ी संस्थागत धोखाधड़ी के रूप में दर्ज होगा। सवाल बहुत सीधा है और जवाब टालने का वक्त खत्म हो चुका है— पैसा जनता का था, तो हिसाब भी जनता को ही देना होगा।

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