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प्रकृति के प्रति समर्पण का संकल्प : छत्तीसगढ़ बना हरियाली, जल और जीवन का प्रहरी

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रायपुर, छत्तीसगढ़ 

25 जुलाई 2025

छत्तीसगढ़ — जिसे हम ‘धान का कटोरा’ कहते हैं, वह वास्तव में वनों, नदियों और खनिजों की धनसंपदा से भरपूर भूमि है। इस राज्य की पहचान केवल खदानों और खेतों से नहीं, बल्कि जंगलों की सांस, नदियों की लय और पहाड़ों की छाया से जुड़ी हुई है। लेकिन दशकों तक यह संवेदनशील भूभाग विकास और दोहन के बीच झूलता रहा। भाजपा शासन, विशेषकर मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की नेतृत्वकारी सोच ने इस संतुलन को संवेदनशीलता, विज्ञान और सततता के आधार पर फिर से परिभाषित किया।

भाजपा ने छत्तीसगढ़ की विकास नीति को प्रकृति विरोधी नहीं, प्रकृति सहयोगी बनाया। “हरित भारत, सतत छत्तीसगढ़” के मंत्र के साथ राज्य सरकार ने पर्यावरणीय नीतियों में तीन स्पष्ट प्राथमिकताएं तय की —

(1) संसाधनों का संरक्षण,

(2) जलवायु संतुलन के प्रति तैयारी,

(3) और जैव विविधता के सम्मान के साथ आर्थिक विकास।

वन क्षेत्रों में सबसे बड़ा सुधार हुआ है। भाजपा शासन में वनाधिकार कानून को न केवल ईमानदारी से लागू किया गया, बल्कि जनजातीय समाज को वनों का संरक्षक बनाकर संरक्षण और संवर्धन दोनों कार्यों में उनकी भूमिका सुनिश्चित की गई। वनोपजों के संग्रह, मूल्यवर्धन और विपणन के लिए जो मूल्य श्रृंखला मॉडल बना, उसने आदिवासी युवाओं को सिर्फ वन पर आश्रित नहीं, बल्कि वन आधारित उद्यमी बना दिया।

हरियाली अभियान, वन महोत्सव, और स्कूलों में वृक्ष मित्र कार्यक्रम के माध्यम से लाखों पेड़ लगाए गए, जिनमें जल-संवेदनशील, फलदार, और छाया देने वाले वृक्षों को प्राथमिकता दी गई। जैविक कृषि, गोबर से कम्पोस्ट, और पर्यावरण-अनुकूल सिंचाई तकनीकों को बढ़ावा देकर कृषि को भी हरित सोच से जोड़ा गया।

जल संरक्षण के मोर्चे पर भाजपा शासन ने छत्तीसगढ़ को ‘जल समृद्ध राज्य’ बनाने की दृष्टि से कई योजनाएं चलाईं। नरवा-गरवा-घुरवा-बाड़ी योजना, जो अब राष्ट्रीय मॉडल बन चुकी है, ने नालों का पुनर्जीवन, पशुधन की देखभाल, जैविक खाद और ग्रामीण आजीविका का ऐसा संयोजन रचा है, जिसकी सराहना नीति आयोग से लेकर स्वयंसेवी संगठनों तक कर चुके हैं।

जलाशयों का पुनर्भरण, गांव-गांव में चेक डैम, बारिश के जल का संग्रहण, और नदी पुनर्जीवन अभियान से अब जल संकटग्रस्त क्षेत्र भी साल भर सिंचाई और पीने के पानी में आत्मनिर्भर हो रहे हैं। यह कार्य केवल परियोजना नहीं, जन चेतना में बदल चुका है।

खनिज दोहन जैसे संवेदनशील विषय पर भाजपा शासन की नीति स्पष्ट रही — “खनन हो, लेकिन जन जीवन और पर्यावरण को नुक़सान न हो।” इसके लिए ईको फ्रेंडली माइनिंग, डिजिटल माइनिंग ट्रैकिंग सिस्टम, माइनिंग रिहैबिलिटेशन फंड, और स्थानीय समुदायों को रॉयल्टी का हिस्सा देने की व्यवस्था बनाई गई। अब खनिज राज्य के लिए बोझ नहीं, समृद्धि और सुरक्षा का साधन बन रहा है।

नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में वन और जल संरक्षण के कार्यों को भाजपा शासन ने “शांति और पुनर्वास नीति” से जोड़ा। इन क्षेत्रों में ईको-टूरिज्म, मिनी जल विद्युत परियोजनाएं, और स्थानीय जनसंख्या की भागीदारी से हरियाली संरक्षण जैसे मॉडल ने न केवल प्रकृति को बचाया, बल्कि भरोसे और विश्वास का माहौल भी तैयार किया।

मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने साफ कहा है, “प्रकृति के साथ चलकर ही विकास संभव है। छत्तीसगढ़ का सौंदर्य, संपन्नता और संतुलन — हमारे जंगल, जल और जमीन से ही है।” यही सोच अब शासन की प्रत्येक नीति में झलकती है — चाहे वह बायोमेडिकल वेस्ट मैनेजमेंट हो, प्लास्टिक मुक्त ग्राम पंचायतें, या हरित ऊर्जा परियोजनाएं।

भाजपा शासन में छत्तीसगढ़ का पर्यावरण अब केवल विभाग का विषय नहीं, बल्कि राज्य की चेतना, चरित्र और प्राथमिकता बन चुका है। यह वही विकास है, जो प्रकृति के साथ संवाद करता है — संघर्ष नहीं करता। यह वही सरकार है, जो पेड़ को परियोजना से ऊपर और नदी को राष्ट्र की धड़कन मानती है। और यही है नवछत्तीसगढ़ का हरित भविष्य, जिसे भाजपा ने सेवा, संवेदना और विज्ञान से सींचा है।

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