मुंबई 8 नवंबर 2025
राष्ट्रीय राजनीति के वरिष्ठ और अनुभवी चेहरे शरद पवार ने बिहार की चुनावी हवा पर जो टिप्पणी की है, वह सिर्फ एक भविष्यवाणी नहीं, बल्कि एक राजनीतिक चेतावनी जैसी लगती है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा — “अगर बिहार में एनडीए की हार होती है, तो मुझे इसमें कोई आश्चर्य नहीं होगा।” पवार का यह बयान उस समय आया है जब पहले चरण की वोटिंग के बाद बिहार का राजनीतिक तापमान तेजी से बढ़ गया है और एनडीए की साख पर जनता के मूड का असर खुलकर दिखने लगा है।
शरद पवार ने कहा कि बिहार की जनता अब सिर्फ जाति और गठबंधन की राजनीति से नहीं चलने वाली। उन्होंने कहा — “बिहार के लोग जागरूक हैं। वे अब नेताओं के वादों पर नहीं, उनके काम पर वोट देते हैं।” पवार के मुताबिक, पिछले कुछ वर्षों में बिहार के लोगों में राजनीतिक समझदारी बढ़ी है और यह वह दौर है जब जनता खुद तय करती है कि सत्ता में कौन रहे और कौन बाहर जाए। उन्होंने यह भी जोड़ा कि बिहार में एनडीए के भीतर आंतरिक मतभेद, नेतृत्व की थकान और कार्यकर्ता-स्तर पर असंतोष स्पष्ट दिखाई दे रहा है।
पवार ने अपने बयान में यह भी इशारा किया कि भाजपा और जेडीयू के बीच जो तालमेल दिखाई देता है, वह सिर्फ दिखावटी है। अंदर से यह गठबंधन थका हुआ और बिखरा हुआ है। उन्होंने कहा — “नीतीश कुमार अब पहले जैसे नहीं रहे। उनकी सरकार पर प्रशासनिक बोझ है, जनसंपर्क कमजोर पड़ा है और भाजपा अपने एजेंडे में व्यस्त है।” पवार का यह बयान साफ दिखाता है कि वे बिहार के राजनीतिक समीकरण को बदलते जन-मूड की दृष्टि से देख रहे हैं।
शरद पवार ने यह भी कहा कि जो दल आज सत्ता में है, वह यह भूल गया है कि बिहार की राजनीति सिर्फ घोषणाओं से नहीं, बल्कि जनसंपर्क और भरोसे से चलती है। उन्होंने कहा कि बेरोज़गारी, शिक्षा और पलायन जैसे मुद्दे अब भी जस के तस हैं, लेकिन सरकार का ध्यान इन पर नहीं है। उन्होंने व्यंग्य में कहा — “जब जनता हर दिन रोज़गार और शिक्षा के लिए संघर्ष कर रही हो और सत्ता सिर्फ विज्ञापन में व्यस्त हो, तब चुनाव के नतीजे आश्चर्यजनक नहीं बल्कि स्वाभाविक होते हैं।”
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि शरद पवार का यह बयान एक बड़े सियासी संकेत की ओर इशारा करता है — बिहार का चुनाव सिर्फ राज्य की राजनीति नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर सत्ता-संतुलन को प्रभावित करने वाला चुनाव बन गया है। पवार ने अपने अनुभव के आधार पर कहा कि यदि इस बार जनता ने सत्ता पलट दी, तो यह बदलाव सिर्फ बिहार तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि देशभर में एक नया संदेश जाएगा कि “जनादेश खरीदा नहीं जा सकता, अर्जित करना पड़ता है।”
दरअसल, पवार का यह बयान उस दौर में आया है जब बिहार की सियासत में कई मोर्चे खुल चुके हैं। एक तरफ नीतीश कुमार अपनी विश्वसनीयता बचाने में लगे हैं, दूसरी तरफ भाजपा अपने संगठन को संभालने में। वहीं लालू प्रसाद यादव और तेजस्वी यादव जनता से सीधा संवाद कर रहे हैं और नई उम्मीदों की राजनीति गढ़ रहे हैं। पवार के इस बयान को विपक्ष के आत्मविश्वास के रूप में भी देखा जा रहा है, जो अब यह मान रहा है कि बिहार में जनता का मूड बदल चुका है।
पवार के शब्दों में, “बिहार के लोग धोखा नहीं खाते। वे एक बार माफ कर सकते हैं, बार-बार नहीं।” उन्होंने कहा कि यह चुनाव सत्ता की ललक और जनता की नीयत के बीच सीधी टक्कर है। जनता यह तय कर चुकी है कि वह सिर्फ वादे सुनने नहीं, बल्कि नतीजे देखने के लिए वोट देगी।
राजनीतिक पर्यवेक्षक मानते हैं कि शरद पवार का यह बयान विपक्ष के मनोबल को मजबूत करेगा। उन्होंने अपने अनुभव के आधार पर बिहार की नब्ज़ पकड़ी है — जहाँ जाति-समीकरण अब भी महत्वपूर्ण है, लेकिन इस बार जनता की मनोवैज्ञानिक थकान और परिवर्तन की चाह उससे कहीं अधिक प्रभावशाली है।
पवार की यह टिप्पणी बिहार की राजनीति के लिए किसी भविष्यवाणी से कम नहीं। उन्होंने कहा — “लोकतंत्र में कोई भी सत्ता स्थायी नहीं होती। जो जनता से कटता है, वो गिरता है।” और शायद यही वह लाइन है जो आने वाले नतीजों की दिशा तय करेगी।
अगर शरद पवार की भविष्यवाणी सच साबित हुई, तो यह केवल एनडीए की हार नहीं होगी — यह बिहार की जनता की नयी राजनीतिक परिपक्वता का उत्सव होगी।




