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वंदे मातरम् पर सदन में बवाल: खरगे का शाह पर वार—आपका भी समय आएगा

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आलोक कुमार । नई दिल्ली 9 दिसंबर 2025

राज्यसभा में वंदे मातरम् पर छिड़ी बहस अचानक उस समय विस्फोटक मोड़ ले गई, जब कांग्रेस अध्यक्ष और विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खरगे ने गृह मंत्री अमित शाह के राष्ट्रवाद संबंधी बयान पर तीखी आपत्ति जताते हुए ऐसा पलटवार किया जिसने पूरे सदन का माहौल बदल दिया। वंदे मातरम् पर चर्चा भले एक सांस्कृतिक विषय के रूप में शुरू हुई थी, लेकिन कुछ क्षणों में ही यह सत्ता बनाम विपक्ष की वैचारिक लड़ाई में बदल गई, जहाँ खरगे और शाह के बीच जुझारू टकराव ने यह साफ कर दिया कि आने वाले दिनों में इस मुद्दे का राजनीतिक तापमान और बढ़ने वाला है।

बहस तब गरम हुई जब अमित शाह ने विपक्ष पर यह आरोप लगाया कि कांग्रेस वंदे मातरम् जैसे राष्ट्रीय प्रतीकों और भावनाओं पर हमेशा दुविधा में रहती है और राष्ट्रभक्ति के सवाल पर स्पष्ट रुख नहीं अपनाती। शाह ने कहा कि देशभक्ति किसी दल की बपौती नहीं है, लेकिन राष्ट्रगौरव के प्रश्न पर विपक्ष का झिझक भरा रवैया जनता देख रही है। शाह के इन बयानों ने कांग्रेस बेंचों में बेचैनी बढ़ा दी, और इसी बीच मल्लिकार्जुन खरगे अपनी सीट से खड़े हुए—और फिर सदन में शुरू हुई वह भिड़ंत जिसकी गूंज पूरे दिन राजनीतिक गलियारों में सुनी गई।

खरगे ने अमित शाह को सीधी चुनौती देते हुए कहा कि भाजपा बार-बार राष्ट्रवाद का हथियार इस्तेमाल कर विपक्ष को नीचा दिखाने की कोशिश करती है, जबकि स्वतंत्रता संग्राम का पूरा इतिहास कांग्रेस की कुर्बानियों से भरा पड़ा है। उन्होंने तंज कसते हुए कहा—“जो लोग उस समय थे भी नहीं, वे आज देशभक्ति का प्रमाणपत्र बाँट रहे हैं। राष्ट्रवाद किसी एक पार्टी की जागीर नहीं है। सत्ता स्थायी नहीं होती—आपका भी समय आएगा।” खरगे के इस बयान से सदन में हलचल तेज हो गई। उनकी आवाज़ में यह साफ दिख रहा था कि कांग्रेस अब भाजपा के “राष्ट्रवाद नैरेटिव” को बिना जवाब के छोड़ने को तैयार नहीं है।

खरगे ने इस बात पर भी जोर दिया कि वंदे मातरम् देश का सम्मान है, लेकिन उसके नाम पर राजनीतिक विभाजन पैदा करना अनुचित और संविधान की भावना के विपरीत है। उनका कहना था कि सरकार राष्ट्रवाद को जितना चाहे हवा दे, लेकिन इससे यह तथ्य नहीं मिट जाता कि लोकतंत्र में असहमति को “राष्ट्रविरोध” बताना खतरनाक प्रवृत्ति है। उन्होंने यह भी कहा कि भाजपा कभी भी मतभेद को स्वीकार करने को तैयार नहीं होती और हर मुद्दे को वैचारिक युद्ध में बदल देती है, जिससे जनता के असली प्रश्न—महंगाई, बेरोज़गारी, और आर्थिक स्थिति—पीछे छूट जाते हैं।

अमित शाह ने भी खरगे के हमले का जवाब उसी आक्रामकता के साथ देते हुए कहा कि भाजपा किसी प्रमाणपत्र की मोहताज नहीं है और उसका राष्ट्रवाद जनता की भावनाओं से उपजा है। शाह ने तंज किया कि “कुछ लोग वंदे मातरम् में भी राजनीति खोज लेते हैं,” और दावा किया कि भाजपा देश को एकजुट रखने की अपनी प्रतिबद्धता पर कायम है। शाह के जवाब से माहौल और गरमा उठा, विपक्ष ने कई बार बीच में टोकाटाकी की और हंगामा भी हुआ, जिससे सभापति को कई बार हस्तक्षेप करना पड़ा।

यह टकराव स्पष्ट रूप से दिखाता है कि वंदे मातरम् का मुद्दा अब केवल एक गीत या राष्ट्रसम्मान का मामला नहीं रहा—यह भारतीय राजनीति में विचारधाराओं की भिड़ंत का नया मोर्चा बन चुका है। राज्यसभा में खरगे और शाह के बीच हुई यह तीखी बहस एक संकेत है कि आने वाला राजनीतिक दौर और भी अधिक ध्रुवीकृत, विवादित और आक्रामक होने वाला है। यहाँ मुद्दा सिर्फ राष्ट्रवाद का नहीं—बल्कि यह है कि राष्ट्रवाद को परिभाषित करने का अधिकार किसके पास होगा और संसद उस बहस को किस दिशा में ले जाएगी।

राज्यसभा की यह गरम बहस केवल एक दिन की घटना नहीं, बल्कि आने वाली राजनीतिक लड़ाइयों का ट्रेलर है—जहाँ हरेक शब्द, हरेक नारा और हरेक बहस चुनावी रणनीति का हिस्सा बन चुके हैं।

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