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पालम की आग: हादसा नहीं, सिस्टम की नाकामी—कितने सवाल, किससे जवाब?

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ओपिनियन | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 20 मार्च 2026

दिल्ली के पालम में चार मंजिला इमारत में लगी आग ने सिर्फ एक परिवार के 9 लोगों की जान नहीं ली, बल्कि इस शहर के सिस्टम, प्रशासन और हमारी सामूहिक लापरवाही की परतें भी खोल दी हैं। यह सिर्फ एक हादसा नहीं है—यह एक चेतावनी है, एक आईना है, जिसमें हम सबकी जिम्मेदारी साफ दिखाई देती है। लेकिन सवाल यह है कि क्या हम इस आईने में झांकने को तैयार हैं, या फिर हर बार की तरह इस त्रासदी को भी “दुर्भाग्यपूर्ण घटना” कहकर आगे बढ़ जाएंगे?

सबसे पहला और सीधा सवाल—क्या यह आग सच में अचानक लगी एक दुर्घटना थी, या फिर यह पहले से तय एक त्रासदी थी जो सिर्फ समय का इंतजार कर रही थी? जब ग्राउंड फ्लोर पर कपड़ों और कॉस्मेटिक्स जैसे ज्वलनशील सामान का भंडार था, तो क्या फायर सेफ्टी के नियमों का पालन किया गया था? क्या उस इमारत को कमर्शियल इस्तेमाल की अनुमति थी? क्या फायर NOC ली गई थी? अगर नहीं, तो इतने समय तक यह सब कैसे चलता रहा? और अगर ली गई थी, तो क्या उसकी जांच कभी हुई?

दूसरा बड़ा सवाल—दिल्ली जैसे महानगर में, जहां हर गली में अवैध स्टोरेज और तारों का जाल है, क्या प्रशासन को इन खतरों का अंदाजा नहीं था? या फिर सब कुछ जानते हुए भी आंखें बंद रखी गईं? पालम की यह घटना कोई पहली नहीं है। हर साल दिल्ली में आग की दर्जनों घटनाएं होती हैं, लेकिन हर बार वही बयान, वही जांच, वही वादे—और फिर सब कुछ पहले जैसा। आखिर कब तक?

तीसरा और सबसे दर्दनाक सवाल—क्या इन 9 लोगों की जान बचाई जा सकती थी? प्रत्यक्षदर्शियों के आरोप हैं कि बचाव कार्य में देरी हुई, हाइड्रोलिक लैडर समय पर काम नहीं कर पाया, ऊंचाई तक नहीं पहुंच सका। अगर यह सच है, तो यह सिर्फ तकनीकी कमी नहीं, बल्कि सीधे-सीधे सिस्टम की विफलता है। अगर दमकल समय पर पूरी तैयारी के साथ पहुंचती, अगर उपकरण पर्याप्त होते, अगर गलियां साफ होतीं—तो क्या आज यह परिवार जिंदा होता?

फायर विभाग अपनी मजबूरी गिनाता है—संकरी गलियां, भीड़, तारों का जाल। लेकिन सवाल यह है कि यह सब एक दिन में तो नहीं हुआ। यह सालों की अनदेखी का नतीजा है। क्या इन गलियों को चौड़ा करने की कोई योजना थी? क्या बिजली के तारों को व्यवस्थित करने की कोई कार्रवाई हुई? या फिर हर विभाग अपनी जिम्मेदारी दूसरे पर डालकर बचता रहा?

अब बात राजनीति की। हादसे के बाद आरोप-प्रत्यारोप शुरू हो गए हैं। विपक्ष सरकार को दोष दे रहा है, सरकार खुद को बचाने में लगी है। लेकिन क्या यह समय राजनीति का है या जवाबदेही का? क्या उन 9 मौतों के बीच भी हमें सिर्फ बयानबाजी ही दिखेगी? क्या किसी अधिकारी, किसी विभाग, किसी जिम्मेदार व्यक्ति पर ठोस कार्रवाई होगी—या फिर यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा?

मुआवजे की घोषणा कर दी गई है—10 लाख, 5 लाख, 2 लाख। लेकिन क्या किसी परिवार की जिंदगी की कीमत इतनी होती है? क्या यह मुआवजा उस दर्द को भर सकता है, जो एक ही परिवार के 9 लोगों को खोने के बाद बचा है? असली सवाल यह है कि क्या हम ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए सिस्टम बदलने को तैयार हैं, या फिर हर बार मौत के बाद सिर्फ मुआवजा बांटकर जिम्मेदारी खत्म मान लेते हैं?

सबसे बड़ा सवाल—क्या इस बार कुछ बदलेगा? क्या फायर सेफ्टी ऑडिट सिर्फ कागजों तक सीमित रहेगा, या सच में जमीन पर बदलाव होगा? क्या अवैध स्टोरेज पर कार्रवाई होगी? क्या इमारतों की जांच होगी? क्या दमकल विभाग को आधुनिक उपकरण मिलेंगे? या फिर कुछ दिनों बाद यह खबर भी पुरानी हो जाएगी और हम अगली त्रासदी का इंतजार करेंगे?

पालम की आग ने हमें एक बार फिर झकझोर दिया है। लेकिन असली परीक्षा अब शुरू होती है—क्या हम इस हादसे से सीखेंगे, या फिर इसे भी भूल जाएंगे? क्योंकि अगर इस बार भी कुछ नहीं बदला, तो अगली आग सिर्फ एक खबर नहीं होगी—वह हमारी चुप्पी और लापरवाही की कीमत होगी।

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