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पाकिस्तान की चुनिंदा नाराज़गी: उइगर मुसलमानों पर चुप्पी, कश्मीर पर आवाज़ बुलंद

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लेखक: शुजात अली कादरी, (अध्यक्ष मुस्लिम स्टूडेंट ऑर्गेनाइजेशन)

नई दिल्ली 11 अगस्त 2025

कूटनीति बनाम मानवाधिकार

पाकिस्तान लंबे समय से खुद को वैश्विक मुस्लिम मुद्दों का पैरोकार बताता आया है। कश्मीर और फिलिस्तीन के मुद्दों पर उसका रुख बेहद आक्रामक और मुखर रहा है। लेकिन जब बात चीन के उइगर मुसलमानों के मानवाधिकार हनन की आती है, तो वही पाकिस्तान चुप्पी साध लेता है। यह चुप्पी महज संयोग नहीं, बल्कि एक सोच-समझी कूटनीतिक रणनीति है, जिसमें आर्थिक और राजनीतिक हित मानवाधिकारों और धार्मिक एकजुटता पर भारी पड़ते हैं।

उइगर संकट पर मौन सहमति

चीन के शिनजियांग प्रांत में उइगर मुसलमानों को ‘पुन:शिक्षण शिविरों’ में रखा जा रहा है, उनकी धार्मिक पहचान और सांस्कृतिक परंपराओं को मिटाने की कोशिशें हो रही हैं। संयुक्त राष्ट्र और मानवाधिकार संगठनों की रिपोर्टें इन शिविरों में यातना, जबरन श्रम और धार्मिक स्वतंत्रता पर रोक के मामलों को उजागर कर चुकी हैं। इसके बावजूद पाकिस्तान ने कभी चीन की खुली आलोचना नहीं की। यह मौन एक प्रकार की सहमति का संकेत देता है, जो यह दर्शाता है कि मुस्लिम मुद्दों पर पाकिस्तान की संवेदनशीलता राजनीतिक लाभ-हानि के हिसाब से तय होती है।

चीन-पाकिस्तान आर्थिक समीकरण

इस मौन के पीछे एक बड़ा कारण चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (CPEC) और उससे जुड़ी अरबों डॉलर की परियोजनाएं हैं। पाकिस्तान जानता है कि चीन के खिलाफ बयानबाज़ी करना उसके आर्थिक हितों और रणनीतिक साझेदारी के लिए नुकसानदेह होगा। नतीजा यह है कि पाकिस्तान के लिए मानवाधिकारों का मुद्दा गौण हो जाता है और आर्थिक रिश्ते सर्वोपरि हो जाते हैं। यह दृष्टिकोण अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान की नैतिक स्थिति को कमजोर करता है, क्योंकि वह अपने सिद्धांतों में स्थिरता नहीं दिखा पाता।

कश्मीर नीति और दोहरे मानदंड

कश्मीर पर पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय आवाज़ बेहद बुलंद है। वह हर मंच पर भारत पर मानवाधिकार उल्लंघन के आरोप लगाता है और इसे वैश्विक मुस्लिम मुद्दे के रूप में प्रस्तुत करता है। लेकिन यही जुनून उइगर मुसलमानों के मामले में क्यों नहीं दिखता? यह दोहरा मानदंड दर्शाता है कि पाकिस्तान के लिए धार्मिक और मानवीय मुद्दों की अहमियत से ज्यादा उनकी राजनीतिक उपयोगिता मायने रखती है। इससे उसकी नैतिक विश्वसनीयता पर गहरा असर पड़ता है।

नैतिक नेतृत्व की चुनौती

जब कोई देश धार्मिक एकजुटता और मानवाधिकारों के पक्षधर होने का दावा करता है, तो उससे उम्मीद की जाती है कि वह हर परिस्थिति में समान रूप से खड़ा होगा, चाहे वह मामला उसके सहयोगी देश से जुड़ा हो या प्रतिद्वंद्वी से। पाकिस्तान की मौजूदा नीति यह संदेश देती है कि उसका समर्थन सिर्फ उन्हीं मुद्दों पर मिलेगा जो उसके भू-राजनीतिक और आर्थिक हितों के अनुकूल हों। यह रवैया न केवल उसकी अंतरराष्ट्रीय साख को प्रभावित करता है, बल्कि मुस्लिम जगत में भी उसके नेतृत्व की स्थिति को चुनौती देता है।

 

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