नई दिल्ली 20 सितंबर 2025
पाकिस्तान और सऊदी अरब का हालिया रक्षा समझौता केवल दो देशों के बीच का रणनीतिक करार नहीं है, बल्कि यह पूरे मध्य-पूर्व और दक्षिण एशिया की सुरक्षा राजनीति को झकझोर देने वाला कदम है। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री खवाज़ा आसिफ का यह बयान कि “पाकिस्तान का न्यूक्लियर प्रोग्राम सऊदी अरब के लिए उपलब्ध होगा” महज़ शब्दों का खेल नहीं, बल्कि आने वाले समय के भू-राजनीतिक संकट का संकेत है।
परमाणु हथियार: सुरक्षा गारंटी या भू-राजनीतिक सौदा?
आसिफ ने भले ही यह सफाई दी हो कि “परमाणु हथियार रडार पर नहीं हैं”, लेकिन यह तथ्य किसी से छिपा नहीं कि पाकिस्तान की परमाणु क्षमता हमेशा से “इस्लामी बम” के रूप में देखी जाती रही है। अगर सऊदी अरब को परमाणु छत्र (nuclear umbrella) मिलता है, तो यह केवल रक्षात्मक व्यवस्था नहीं रहेगी, बल्कि परमाणु प्रसार (nuclear proliferation) की दिशा में खतरनाक उदाहरण बनेगा।
सऊदी की मंशा और अमेरिकी असफलता
सऊदी अरब लंबे समय से अमेरिकी सुरक्षा गारंटी पर निर्भर रहा है। लेकिन अफगानिस्तान से अमेरिका की वापसी और ईरान परमाणु डील पर अमेरिकी हिचकिचाहट ने रियाध का भरोसा तोड़ा है। ऐसे में पाकिस्तान को साथ लेकर सऊदी अरब ने यह संकेत दिया है कि वह अब अपनी सुरक्षा अमेरिकी छत्र के बजाय इस्लामी सैन्य गठबंधन और पाकिस्तान की परमाणु शक्ति पर आधारित करेगा। यह कदम वाशिंगटन के लिए एक बड़ा झटका है।
भारत और इज़राइल की चिंता
भारत और इज़राइल दोनों ही पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम से सीधे प्रभावित होते हैं। भारत के लिए यह समझौता कश्मीर और सीमा पार आतंकवाद की पृष्ठभूमि में और अधिक संवेदनशील हो जाता है। अगर पाकिस्तान अपनी परमाणु क्षमता को साझा करने या छत्र देने की मानसिकता अपनाता है, तो भारत को अपनी रणनीतिक आत्मनिर्भरता और सुरक्षा साझेदारियों (जैसे क्वाड, अमेरिका, फ्रांस के साथ रक्षा सहयोग) को और मज़बूत करना होगा। इज़राइल के लिए यह खतरा सीधे ईरान-सऊदी प्रतिद्वंद्विता में परमाणु आयाम जोड़ देगा।
ईरान-सऊदी समीकरण में नई आग
ईरान और सऊदी अरब के रिश्ते दशकों से कटु रहे हैं। अगर रियाद को पाकिस्तान की परमाणु गारंटी मिलती है, तो ईरान इसे सीधी चुनौती मानेगा। ईरान पहले से ही परमाणु तकनीक को लेकर संदेह के घेरे में है। ऐसे में मध्य-पूर्व में दो विरोधी ध्रुवों पर परमाणु साए का मंडराना क्षेत्रीय युद्ध की संभावना को और बढ़ा सकता है।
अंतरराष्ट्रीय अप्रसार व्यवस्था पर चोट
परमाणु अप्रसार संधि (NPT) का मकसद ही यही था कि नए देश परमाणु क्लब में न जुड़ें। लेकिन पाकिस्तान-सऊदी समझौता इस व्यवस्था की धज्जियाँ उड़ाता हुआ दिख रहा है। भले ही अभी हथियार सीधे देने की बात न हो, लेकिन “न्यूक्लियर अंब्रेला” जैसी अवधारणा ही अप्रसार के लिए खतरे की घंटी है।
अस्थिरता का नया दौर
यह समझौता पाकिस्तान और सऊदी अरब के लिए तत्कालिक सुरक्षा का एहसास ज़रूर ला सकता है, लेकिन इससे क्षेत्रीय और वैश्विक अस्थिरता कई गुना बढ़ जाएगी। मध्य-पूर्व में पहले से चल रहे संघर्ष, शिया-सुन्नी विभाजन और आतंकवाद की आग में अगर परमाणु छाया जुड़ती है, तो नतीजे पूरी दुनिया के लिए विनाशकारी हो सकते हैं।
यानी पाकिस्तान-सऊदी रक्षा सौदा महज़ एक द्विपक्षीय रक्षा करार नहीं है, बल्कि परमाणु राजनीति का खतरनाक प्रयोग है, जिसका दुष्परिणाम एशिया से लेकर यूरोप और अमेरिका तक महसूस होगा।
भारत की सुरक्षा पर सीधा खतरा
पाकिस्तान-सऊदी रक्षा समझौते के तहत परमाणु सुरक्षा कवच की पेशकश भारत के लिए बेहद चिंताजनक है। पाकिस्तान पहले ही सीमा पार आतंकवाद और अस्थिरता को बढ़ावा देता है, अब अगर उसे सऊदी अरब का खुला समर्थन और आर्थिक सहारा मिलता है, तो भारत पर दोहरी रणनीतिक चुनौती खड़ी हो जाएगी। इससे पाकिस्तान को अपने परमाणु कार्यक्रम को और मज़बूत करने का आधार मिल सकता है, जिसका सीधा असर भारत की सुरक्षा रणनीति और सैन्य तैयारी पर पड़ेगा।
भारत की कूटनीति और रणनीतिक विकल्प
इस स्थिति में भारत को अपनी विदेश नीति को और सक्रिय बनाना होगा। सबसे पहले, सऊदी अरब के साथ ऊर्जा और व्यापारिक संबंधों को इस तरह संतुलित करना होगा कि रियाध पाकिस्तान के दबाव में पूरी तरह न जाए। दूसरी ओर, भारत को अमेरिका, फ्रांस, जापान और इज़राइल जैसे देशों के साथ रणनीतिक साझेदारी को और गहरा करना पड़ेगा ताकि किसी भी परमाणु दबाव का जवाब सामरिक और कूटनीतिक स्तर पर दिया जा सके। यह समझौता भारत के लिए एक चेतावनी है कि उसे अब “रणनीतिक स्वायत्तता” को बनाए रखते हुए “रणनीतिक गठजोड़” की ताकत को और तेज़ी से बढ़ाना होगा।




