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पहलगाम आतंकी हमला: बाइसरन घाटी की शांति को छलनी करता नरसंहार

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जम्मू-कश्मीर के अनंतनाग ज़िले की खूबसूरत पहाड़ियों के बीच बसी बाइसरन घाटी, जो अब तक सैलानियों और श्रद्धालुओं के लिए प्रकृति की गोद में एक शांत स्थल मानी जाती थी, 22 अप्रैल 2025 को आतंक की भयावहता का साक्षी बन गई। इस दिन पांच अत्याधुनिक हथियारों से लैस आतंकियों ने एक तीर्थ एवं पर्यटन दल पर हमला कर दिया, जिसमें 26 निर्दोष नागरिकों की निर्मम हत्या कर दी गई और 30 से अधिक लोग गंभीर रूप से घायल हो गए।

हमले की प्रकृति केवल एक आम आतंकी घटना नहीं थी — यह एक सुनियोजित नरसंहार था, जिसमें खासतौर से धार्मिक पहचान के आधार पर लोगों को निशाना बनाया गया। चश्मदीदों के मुताबिक, आतंकियों ने पहले लोगों को एकत्र किया, फिर उनमें से कुछ को उनके धर्म के अनुसार धार्मिक मंत्र बोलने के लिए मजबूर किया। जो ऐसा नहीं कर पाए, या जिनकी धार्मिक पहचान हमलावरों को “विरोधी” लगी, उन्हें सीधे गोली मार दी गई।

यह आतंकी वारदात न केवल कश्मीर में सांप्रदायिक आतंकवाद की वापसी की स्पष्ट चेतावनी थी, बल्कि यह भी दर्शाती है कि कैसे आतंकवादी संगठन अब एक बार फिर धार्मिक उन्माद को हिंसा के हथियार के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं। इस घटनाक्रम ने लोगों के मन में पुलवामा 2019 जैसे हमलों की यादें ताजा कर दीं, जब आतंक ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था।

गुरिल्ला युद्ध शैली में हुआ यह हमला असामान्य रूप से हिंसक था — आतंकियों ने पहले सड़कों की निगरानी की, फिर बाइसरन की ओर बढ़ते तीर्थयात्रियों के वाहनों को रोककर चेकिंग और पहचान के बहाने निशाना बनाया। इससे यह संकेत मिलता है कि हमले की पूर्व-योजना काफी महीनों से की जा रही थी और संभवतः स्थानीय सहयोगियों की मदद से आतंकियों ने भौगोलिक जानकारी, रास्तों और टारगेट समूहों की पहचान पहले से ही कर ली थी।

घटना के बाद इलाके में खुफिया तंत्र की विफलता, पर्यटन सुरक्षा में चूक, और आतंकियों की आवाजाही पर सवाल खड़े हो गए। स्थानीय सुरक्षा एजेंसियों और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) की टीम ने तुरंत आपात बैठक की और हमलावरों की पहचान, उनकी पृष्ठभूमि और संभावित नेटवर्क की तलाश शुरू कर दी।

यह हमला उस वक्त हुआ, जब केंद्र सरकार जम्मू-कश्मीर में अमन और निवेश की नई बहाली की बात कर रही थी, और घाटी में पर्यटन को फिर से प्रोत्साहित करने की कोशिश हो रही थी। लेकिन इस घटना ने साफ कर दिया कि आतंक का चेहरा भले ही बदल जाए, लेकिन उसकी नफरत की बुनियाद वही है — डर फैलाना, समाज को बाँटना और कश्मीर की शांति को छिन्न-भिन्न करना।

 

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