ओपिनियन | एबीसी नेशनल न्यूज | नई दिल्ली
जागो, नहीं तो देर हो जाएगी
संसद में आज Rahul Gandhi का भाषण सामान्य विपक्षी आलोचना नहीं था, बल्कि एक बेचैन चेतावनी की तरह था। वह स्वर, जिसमें आक्रोश था, पर साथ ही रणनीतिक स्पष्टता भी। जैसे घर का बड़ा भाई खड़ा होकर कह रहा हो—“भाइयो, तूफान आ रहा है, जागो!” उनके शब्दों में सिर्फ राजनीतिक विरोध नहीं, बल्कि एक गहरी आशंका थी कि दुनिया जिस तेजी से बदल रही है, भारत कहीं रणनीतिक चूक न कर बैठे। जूजित्सू की ‘चोक’ ग्रिप का उनका उदाहरण सीधा सत्ता की ओर इशारा था—क्या हमारी नीति-निर्माण प्रक्रिया किसी बाहरी दबाव में जकड़ी हुई है? क्या हम अपनी सांस खुद ले रहे हैं, या कोई और तय कर रहा है कि कितनी हवा मिलेगी?
बदलती विश्व व्यवस्था: डॉलर की दरारें और युद्ध का धुआं
राहुल गांधी ने अपने भाषण में वैश्विक अस्थिरता का ऐसा चित्र खींचा, जिसमें यूक्रेन से लेकर गाज़ा तक युद्ध की लपटें हैं, ईरान पर मंडराता खतरा है, और ऊर्जा व वित्त को हथियार बना दिया गया है। उन्होंने संकेत दिया कि अमेरिकी वर्चस्व को चीन और रूस खुली चुनौती दे रहे हैं, और दुनिया बहुध्रुवीय ताकतों के दौर में प्रवेश कर रही है। ऐसे में भारत को स्पष्ट रणनीति चाहिए। उन्होंने प्रधानमंत्री Narendra Modi के उस बयान की ओर इशारा किया, जिसमें कहा गया था कि “यह युद्ध का युग नहीं है।” राहुल का सवाल था—क्या जमीन पर हालात उस दावे की पुष्टि करते हैं? या हम वैश्विक यथार्थ से आंखें मूंदे हुए हैं?
AI, डेटा और भारत की असली ताकत
भाषण का सबसे तीखा और भविष्य-दृष्टा हिस्सा डेटा और AI पर था। राहुल ने कहा—अगर AI इंजन है, तो डेटा उसका पेट्रोल है। और भारत के पास 1.4 अरब लोगों की वह ऊर्जा है, जो दुनिया में अद्वितीय है। उन्होंने दावा किया कि भारत का डेटा सोने की खान है—क्योंकि यहां लोकतांत्रिक स्वतंत्रता है, खुलापन है, विविधता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या हम इस डेटा को सुरक्षित रख पा रहे हैं? क्या डिजिटल ट्रेड समझौते और “फ्री डेटा फ्लो” की नीतियां हमारी डिजिटल संप्रभुता को कमजोर कर रही हैं? राहुल ने साफ शब्दों में कहा—डेटा सिर्फ टेक्नोलॉजी नहीं, शक्ति है। और जो डेटा पर नियंत्रण रखेगा, वही भविष्य लिखेगा।
US डील, टैरिफ और संतुलन का सवाल
अमेरिका के साथ व्यापारिक समझौतों पर राहुल गांधी का हमला सबसे आक्रामक था। उन्होंने आरोप लगाया कि टैरिफ ढांचे में संतुलन नहीं है। उनका तर्क था कि अमेरिकी आयात को राहत मिल रही है, जबकि भारतीय उद्योगों को अपेक्षित सुरक्षा नहीं मिल रही। टेक्सटाइल, मैन्युफैक्चरिंग और कृषि क्षेत्रों का उदाहरण देते हुए उन्होंने पूछा—क्या हम बराबरी की शर्तों पर व्यापार कर रहे हैं या दबाव में झुक रहे हैं? यह सवाल सिर्फ आर्थिक नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आत्मसम्मान से जुड़ा हुआ था।
किसान और मजदूर: सबसे पहले चोट इन्हीं पर
राहुल ने कहा कि वैश्विक डील का सबसे बड़ा असर किसान और मजदूर पर पड़ेगा। मक्का, सोयाबीन, कपास जैसे उदाहरण देकर उन्होंने अमेरिकी मेगा-फार्म्स से प्रतिस्पर्धा की आशंका जताई। बजट को लेकर उन्होंने कहा कि उसमें विज़न की कमी है—न सुरक्षा कवच स्पष्ट है, न दीर्घकालिक रणनीति। उनका आरोप कठोर था—क्या इतिहास में किसी प्रधानमंत्री ने अपने अन्नदाताओं को इस तरह वैश्विक प्रतिस्पर्धा के हवाले किया है? यह वाक्य संसद में गूंजा और सत्तापक्ष की बेंचों पर बेचैनी साफ दिखी।
एंग्री यंग मेन का उभार
आज का राहुल गांधी अलग थे। जोश भी था। होश भी था। आक्रोश भी था। हास्य भी था। व्यंग भी था। वह सिर्फ भाषण नहीं दे रहे थे—रणनीति बुन रहे थे। संसद सत्र की शुरुआत में ही उन्होंने जनरल नरवणे की किताब का जिक्र छेड़कर माहौल गरमा दिया। विरोध हुआ, टोका गया, रोका गया—लेकिन यही तो वह चाहते थे। उनके न बोलने की चर्चा, उनके भाषण से पहले ही, राजनीतिक विमर्श पर छा गई।
आज वह एक मंझे हुए शतरंज खिलाड़ी की तरह दिखे—सरकार और उसके इकोसिस्टम को अपनी चालों से उलझाते हुए। उन्होंने एजेंडा सेट किया, बहस की दिशा तय की और खुद को केंद्र में ला खड़ा किया।
डर बनाम जवाबदेही
राहुल ने संकेत दिया कि सत्ता की आंखों में डर है—बाहरी दबावों का, आंतरिक सवालों का। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय मामलों और कारोबारी विवादों का जिक्र कर माहौल को और गर्म कर दिया। यह आरोप गंभीर हैं और तथ्यों की कसौटी पर परखे जाने चाहिए। लेकिन लोकतंत्र में विपक्ष का काम ही है असहज सवाल पूछना। सवाल यह है कि क्या सरकार इन सवालों का उतनी ही स्पष्टता से जवाब देगी?
ग्रिप तोड़ने की चुनौती
राहुल गांधी का संदेश साफ था—भारत को अपने डेटा, किसानों, मजदूरों और ऊर्जा-संपदा की रक्षा करनी होगी। अगर वैश्विक तूफान आ रहा है, तो हमें अपने पैरों पर खड़ा होना होगा।
आज उन्होंने साबित किया कि वह सिर्फ आलोचक नहीं, बल्कि आक्रामक एजेंडा-सेटर बनना चाहते हैं। राजनीति के इस दौर में उन्होंने यह संदेश देने की कोशिश की कि खेल के नियम बदल रहे हैं—और वह उन नियमों को चुनौती देने के लिए तैयार हैं। लोकतंत्र में अंतिम फैसला जनता करती है। लेकिन इतना तय है—आज संसद में राहुल गांधी का जादू सर चढ़कर बोला।





