एबीसी नेशनल न्यूज | नई दिल्ली | 11 फरवरी 2026
पूर्व सेना प्रमुख Manoj Mukund Naravane की हालिया पुस्तक को लेकर सियासी हलकों में हलचल तेज हो गई है। पुस्तक के कुछ अंश सामने आने के बाद विपक्षी दलों ने सरकार पर सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं, जबकि सत्तापक्ष की ओर से बचाव और स्पष्टीकरण का सिलसिला जारी है। प्रकाशक Penguin Random House India की ओर से भी सफाई और स्पष्टीकरण जारी किए जाने के बाद यह मुद्दा और गर्म हो गया है।
कांग्रेस नेता Rahul Gandhi लगातार इस विषय को उठा रहे हैं। उनका आरोप है कि चीन से जुड़े घटनाक्रम को लेकर सरकार ने पारदर्शिता नहीं बरती। भाजपा और उसके समर्थक इस आरोप को राजनीति से प्रेरित बता रहे हैं, लेकिन जिस तरह से लगातार प्रतिक्रियाएं आ रही हैं, उससे यह स्पष्ट है कि मामला संवेदनशील है।
पुस्तक में 31 अगस्त 2020 की रात का उल्लेख खास तौर पर चर्चा में है। उस समय लद्दाख में भारत-चीन के बीच तनाव चरम पर था और कैलाश पर्वतमाला के रणनीतिक इलाकों पर भारतीय सेना ने बढ़त बनाई थी। नरवणे ने लिखा है कि उस रात की परिस्थितियां असाधारण थीं और निर्णय का भार पूरी तरह सैन्य नेतृत्व पर आ गया था। उनके अनुसार, प्रधानमंत्री Narendra Modi द्वारा “जो ठीक समझो वो करो” कहे जाने के बाद निर्णय की जिम्मेदारी सेना के कंधों पर आ गई।
रक्षा मंत्री Rajnath Singh और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार Ajit Doval भी उस समय की बैठकों में शामिल थे। दिवंगत सीडीएस Bipin Rawat का नाम भी चर्चा में है, क्योंकि वे उस दौर में सामरिक निर्णय प्रक्रिया का अहम हिस्सा थे।
पुस्तक के कुछ अंशों के आधार पर अब तीन बड़े सवाल खड़े किए जा रहे हैं। पहला—चीन के खिलाफ ‘पहले हमला न करने’ की नीति किस स्तर पर तय हुई थी? क्या यह निर्णय राजनीतिक नेतृत्व का था या सैन्य रणनीति का हिस्सा? दूसरा—जब चीनी सैनिक संवेदनशील क्षेत्र के नजदीक पहुंच गए थे, तब जवाबी गोलाबारी का आदेश क्यों नहीं दिया गया, जबकि पाकिस्तान मोर्चे पर ऐसी कार्रवाई नियमित रूप से होती रही है? तीसरा—यदि कैलाश रेंज पर सामरिक बढ़त हासिल कर ली गई थी, तो उस अवसर का उपयोग निर्णायक जवाबी कार्रवाई के लिए क्यों नहीं किया गया?
सरकार की ओर से अब तक इन विशिष्ट सवालों पर विस्तृत प्रतिक्रिया नहीं आई है। भाजपा नेताओं का कहना है कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े विषयों पर सार्वजनिक बहस सीमित दायरे में होनी चाहिए। वहीं विपक्ष का तर्क है कि जब पूर्व सेना प्रमुख ने स्वयं अपनी पुस्तक में घटनाक्रम का उल्लेख किया है, तो सरकार को भी स्पष्ट रुख सामने रखना चाहिए।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह मुद्दा केवल एक पुस्तक तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि 2020 के भारत-चीन सीमा तनाव की व्यापक समीक्षा की मांग को जन्म दे सकता है। आने वाले दिनों में संसद के भीतर और बाहर इस विषय पर बहस और तेज होने के संकेत हैं।
फिलहाल देश की नजर इस बात पर टिकी है कि क्या प्रधानमंत्री या रक्षा मंत्रालय इस पूरे प्रकरण पर औपचारिक और विस्तृत बयान जारी करेगा, या यह विवाद राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक ही सीमित रहेगा।




