अवधेश कुमार | नई दिल्ली 4 जनवरी 2026
आज के दौर में खुद को साधु, संन्यासी और कथावाचक कहलवाने वाले कुछ चेहरे धर्म की नहीं, बल्कि सत्ता-संरक्षित नफ़रत की दलाली करते दिखते हैं। ये वही लोग हैं जो बलात्कार पर जमानत, ज़हरीली हवा-पानी, बेरोज़गारी और महंगाई, किसानों की आत्महत्याएं और मणिपुर की महीनों चली आग—इन सब पर या तो खामोश रहे या फिर नजरें चुराते रहे। लेकिन जैसे ही किसी मुद्दे को हिंदू–मुस्लिम रंग देने का मौका मिलता है, इनकी वाणी में अचानक “धर्म”, “राष्ट्र” और “संस्कृति” की गूंज तेज़ हो जाती है। यह साधना नहीं, चयनात्मक उन्माद है; यह वैराग्य नहीं, राजनीतिक ठेका है।
सच्चे संत बनाम ‘सरकारी संत’
तथ्य यह है कि अड़गड़ानंद जी महाराज और प्रेमानंद महाराज जैसे संत सार्वजनिक उकसावे से दूर रहे—क्योंकि वे जानते हैं कि धर्म का काम आत्मा को ऊँचा उठाना है, भीड़ को भड़काना नहीं। इसके उलट, आज के कुछ तथाकथित सरकारी संत—देवकीनंदन ठाकुर, रामभद्राचार्य, अनिरुद्धाचार्य—और उनसे जुड़े मंचों ने कलाकारों के खिलाफ बहिष्कार, अपमान और धमकी की भाषा को वैधता दी। यह शास्त्र नहीं, शोर की राजनीति है; यह कथा नहीं, कंटेंट-मैनेजमेंट है—जहाँ धर्म को क्लिक, तालियाँ और सत्ता-समीकरण के लिए इस्तेमाल किया जाता है।
धमकी का उत्सव और कानून की अवमानना
जब हिंदू महासभा की जिला अध्यक्ष मीरा राठौर खुलेआम किसी अभिनेता की जबान काटने पर इनाम घोषित करती हैं, तो यह महज़ बयान नहीं—कानून और संविधान को खुली चुनौती है। जब गाजियाबाद (लोनी) के भाजपा विधायक नंद किशोर गुर्जर सार्वजनिक मंचों से अपशब्द कहते हुए फिल्मों के बहिष्कार की अपील करते हैं, तो यह अभिव्यक्ति नहीं—उकसावे की राजनीति है। और जब कथावाचक-संत इन बयानों पर ताली बजाते हैं या मौन साध लेते हैं, तो वे हिंसा के सहलेखक बन जाते हैं। धर्म यहाँ ढाल है, वार हथियार।
क्रिकेट, राष्ट्रवाद और पाखंड
क्रिकेट के मैदान में भी यही चयनात्मक राष्ट्रवाद दिखता है। बांग्लादेशी खिलाड़ी को हटाने का श्रेय लेना, खेल संस्थाओं (BCCI/फ्रेंचाइज़ी) पर दबाव बनाना और इसे “हिंदुत्व की जीत” कहना—यह खेल-न्याय नहीं, भीड़-प्रभाव है। सवाल यह है कि यही आक्रामकता रोज़गार, महंगाई, पर्यावरण और हिंसा पर क्यों नहीं दिखती? क्योंकि वहाँ नफ़रत का त्वरित लाभ नहीं मिलता, वहाँ मेहनत, नीति और जवाबदेही चाहिए।
मौन की राजनीति: असली परीक्षा
इन तथाकथित संतों की असली परीक्षा सरल है—
रेप पर जमानत के खिलाफ क्या उतनी ही आवाज़ उठी? नहीं।
मणिपुर के पीड़ितों के लिए क्या वैसी ही आग दिखी? नहीं।
किसानों के लिए क्या वैसी ही गर्जना हुई? नहीं।
तो फिर किसी अभिनेता पर यह उबाल क्यों? क्योंकि यह सुरक्षित निशाना है—जहाँ नफ़रत बेची जा सकती है, सत्ता खुश रखी जा सकती है और जोखिम शून्य रहता है।
नागरिकता का प्रमाणपत्र किसके हाथ में?
जो लोग किसी अभिनेता को “राक्षस”, “विषैला सांप” कहकर बहिष्कार का आह्वान करते हैं, वे भूल जाते हैं कि देशभक्ति का प्रमाणपत्र किसी कथावाचक के हाथ में नहीं। नागरिक की निष्ठा कानून, कर्म और संवैधानिक मूल्यों से तय होती है—न कि भीड़ के नारों से। और धर्म की मर्यादा करुणा, संयम और न्याय से बनती है—धमकी, इनाम और अपमान से नहीं।
धर्म का सबसे बड़ा दुश्मन
आज धर्म का सबसे बड़ा दुश्मन कोई कलाकार नहीं, बल्कि वे ठेकेदार हैं जो धर्म को राजनीतिक हथियार बनाकर चलाते हैं। सच्चे संत समाज को जोड़ते हैं; ये तथाकथित संत समाज को फाड़ते हैं। जो लोग हिंसा पर चुप रहकर नफ़रत पर चिल्लाते हैं—वह धर्म नहीं, पाखंड है। और पाखंड, चाहे कितनी ऊँची गद्दी से आए, अंततः लोकतंत्र और धर्म—दोनों को कमजोर करता है।




