अवधेश कुमार | 24 दिसंबर 2025
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के वरिष्ठ नेता दत्तात्रेय होसबाले द्वारा हिंदू धर्म को श्रेष्ठ बताते हुए मुसलमानों से सूर्य नमस्कार करने तथा नदियों और प्रकृति की पूजा करने संबंधी टिप्पणी ने देश में एक बार फिर धर्म, आस्था और सह-अस्तित्व पर गहरी और संवेदनशील बहस छेड़ दी है। यह विवाद अब किसी एक वक्तव्य तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसने भारत की मूल आत्मा—उसके संविधान, धर्मनिरपेक्ष चरित्र और साझा ऐतिहासिक विरासत—पर भी गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। समाज के अनेक वर्गों की स्पष्ट राय है कि हर आदमी को अपने धर्म और आस्था के अनुसार जीवन जीने का पूरा अधिकार है, लेकिन दूसरे के धर्म में दख़ल देना, उस पर टिप्पणी करना या धार्मिक सलाह देना न तो भारतीय परंपरा है और न ही संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप।
आलोचकों का कहना है कि भारत में न कोई धर्म बड़ा है और न कोई छोटा। यह देश किसी एक धार्मिक पहचान से नहीं, बल्कि संविधान से चलता है। भारतीय संविधान धर्मनिरपेक्षता की गारंटी देता है, जहां राज्य और समाज सभी धर्मों को समान सम्मान देते हैं। यही कारण है कि भारत न कभी “हिंदू राष्ट्र” था और न कभी “मुस्लिम राष्ट्र”। इतिहास गवाह है कि जब हिंदू राजा शासन में थे, तब भी भारत किसी एक धर्म का देश नहीं बना; और जब मुस्लिम शासक सत्ता में थे, तब भी यह देश सबका ही रहा। भारत की पहचान सदैव विविधता, सह-अस्तित्व और आपसी सम्मान से निर्मित हुई है।
होसबाले के बयान को कुछ लोग सांस्कृतिक समन्वय और पर्यावरण संरक्षण के नजरिये से भी देख रहे हैं। उनका तर्क है कि सूर्य नमस्कार, योग और प्रकृति के प्रति सम्मान आज वैश्विक स्तर पर स्वास्थ्य और पर्यावरण से जुड़ी गतिविधियां बन चुकी हैं, जिन्हें केवल धार्मिक चश्मे से देखना सीमित दृष्टि होगी। समर्थकों का मानना है कि प्रकृति का सम्मान किसी एक धर्म की बपौती नहीं, बल्कि पूरी मानवता की साझा जिम्मेदारी है।
लेकिन दूसरी ओर, बड़ी संख्या में बुद्धिजीवी, सामाजिक कार्यकर्ता और धार्मिक जानकार यह सवाल उठा रहे हैं कि आस्था का क्षेत्र अत्यंत निजी होता है। पूजा-पद्धति, धार्मिक प्रतीक और विश्वास किसी व्यक्ति या समुदाय की आत्मिक स्वतंत्रता से जुड़े होते हैं। ऐसे में किसी दूसरे धर्म के लोगों से यह अपेक्षा करना कि वे किसी विशेष धार्मिक परंपरा का पालन करें—भले ही उसे “मानव धर्म” का नाम दिया जाए—संवेदनशीलता की कमी को दर्शाता है और अनावश्यक असहजता पैदा करता है।
यह पूरा विवाद हमें फिर याद दिलाता है कि भारत की असली ताकत एकरूपता में नहीं, बल्कि विविधता में एकता में निहित है। गंगा-जमुनी तहज़ीब, सूफी-संत परंपरा और संविधान की भावना ने सदियों से इस समाज को जोड़े रखा है। इसलिए देश के विभिन्न हिस्सों से यह आवाज़ उठना स्वाभाविक है कि धार्मिक सौहार्द आदेश या सलाह से नहीं, बल्कि आपसी सम्मान, समझ और संवाद से कायम होता है।
कुल मिलाकर, होसबाले का बयान एक बड़े आत्ममंथन का अवसर भी है—कि हम किस तरह का भारत चाहते हैं। ऐसा भारत, जहां हर आदमी अपने धर्म, आस्था और पहचान के साथ सुरक्षित और सम्मानित महसूस करे; या ऐसा भारत, जहां गैर-जिम्मेदार बयान समाज को बांटने का कारण बनें। आज ज़रूरत है कि संवाद की भाषा संयमित हो, संवैधानिक मूल्यों को सर्वोपरि रखा जाए और यह याद रखा जाए कि भारत प्राचीन काल से सबका था, सबका है और सबका ही रहेगा।




