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ओपिनियन | ट्रंपवाद की “टैरिफ़ी” दुनिया में भारत की 8% ग्रोथ की अग्निपरीक्षा

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— शिवाजी सरकार, अर्थशास्त्री | नई दिल्ली 11 जनवरी 2026

बदलती दुनिया, बदलता व्यापार: नियमों से ताकत तक का सफर

दुनिया की आर्थिक व्यवस्था आज एक ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ी है। यूरोप और पश्चिम एशिया में जारी युद्ध, अमेरिका–चीन के बीच बढ़ती रणनीतिक टकराहट, टैरिफ की खुली वापसी और WTO जैसी वैश्विक संस्थाओं की कमजोर पड़ती भूमिका ने अंतरराष्ट्रीय व्यापार को पूरी तरह बदल दिया है। अब व्यापार केवल आयात-निर्यात या मुनाफे का मामला नहीं रह गया, बल्कि यह राष्ट्रीय सुरक्षा, राजनीतिक प्रभाव, रणनीतिक दबाव और वैश्विक शक्ति संतुलन का औज़ार बन चुका है। जिस व्यवस्था में कभी नियम, सहमति और बहुपक्षीय समझौते सर्वोपरि थे, वहां अब ताकत और हित सबसे ऊपर हैं। भारत के लिए यह बदलाव सिर्फ खतरा नहीं, बल्कि खुद को वैश्विक शक्ति के रूप में स्थापित करने का एक बड़ा अवसर भी है।

वैश्वीकरण से पीछे हटती दुनिया और लौटता संरक्षणवाद

करीब एक दशक पहले तक वैश्विक व्यापार का आधार WTO के तहत धीरे-धीरे उदारीकरण था। विकसित देश यह मानकर चलते थे कि विकासशील देशों को कुछ विशेष छूट दी जानी चाहिए। लेकिन अब यह सहमति टूट चुकी है। आज दुनिया में संरक्षणवाद, आर्थिक राष्ट्रवाद और “पहले मेरा देश” जैसी सोच खुलकर सामने आ चुकी है। वैश्वीकरण को अब विकास का इंजन नहीं, बल्कि घरेलू नौकरियों और उद्योगों के लिए खतरा माना जाने लगा है। यही वजह है कि टैरिफ, सब्सिडी और व्यापार प्रतिबंध फिर से सामान्य हथियार बन गए हैं।

BRICS: विकल्प या केवल संतुलन का औज़ार?

ऐसे माहौल में BRICS को अक्सर पश्चिमी वर्चस्व के विकल्प के रूप में देखा जाता है, लेकिन हकीकत इससे कहीं ज्यादा जटिल है। अमेरिका की आक्रामक वैश्विक नीति के चलते BRICS की भूमिका भी सीमित दिखाई देती है। वेनेजुएला ने जब BRICS के करीब जाने और तेल का व्यापार डॉलर के बजाय युआन और रूबल में करने की कोशिश की, तो उसे कड़े प्रतिबंधों की भारी कीमत चुकानी पड़ी। भारत ने भी दक्षिण अफ्रीका के तट पर प्रस्तावित BRICS सैन्य अभ्यास को टालकर साफ संकेत दिया कि वह किसी एक गुट में फंसने के बजाय संतुलन की नीति अपनाना चाहता है। BRICS भारत के लिए एक हेज हो सकता है, लेकिन यह वैश्विक बाजारों का विकल्प नहीं बन सकता।

भारत की आर्थिक वृद्धि: उपलब्धि भी, चेतावनी भी

आज के अस्थिर वैश्विक माहौल में भारत की 7.4% की विकास दर निश्चित रूप से एक बड़ी उपलब्धि है, खासकर तब जब पिछली अवधि में वृद्धि अपेक्षाकृत कमजोर रही थी। लेकिन यह उपलब्धि मंज़िल नहीं है। भारत को रोजगार, गरीबी उन्मूलन और वैश्विक प्रभाव के लिए लगातार 8% या उससे अधिक की विकास दर चाहिए। इसके लिए केवल आंकड़ों से काम नहीं चलेगा। टैक्स दरों को तर्कसंगत बनाना, निवेश को बढ़ावा देना और विकास की गति तेज करना जरूरी है। बार-बार रेल किराया और टैक्स बढ़ाने से महंगाई बढ़ती है, जिसका सीधा असर आम आदमी और रुपये की मजबूती पर पड़ता है।

जब व्यापार बन गया भू-राजनीति का हथियार

आज व्यापार नीति पूरी तरह भू-राजनीति से जुड़ चुकी है। राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर निर्यात पर रोक लगाई जा रही है, घरेलू उद्योगों को भारी सब्सिडी दी जा रही है और विदेशी निवेश की कड़ी जांच हो रही है। कभी WTO का मूल सिद्धांत रहा गैर-भेदभाव, अब उसकी जगह “फ्रेंड-शोरिंग” और “चयनात्मक दूरी” ने ले ली है। WTO की विवाद निपटान प्रणाली लगभग ठप है और बहुपक्षीय वार्ताएं जमी हुई हैं। ऐसे में भारत जैसे देश के लिए, खासकर अमेरिका के सख्त रुख के बीच, व्यापारिक फैसले कहीं ज्यादा चुनौतीपूर्ण हो गए हैं।

भारत का बदला हुआ व्यापारिक चेहरा: नीति से आगे निकलती हकीकत

भारत की व्यापारिक तस्वीर चुपचाप लेकिन निर्णायक रूप से बदल चुकी है। आज भारत सिर्फ कच्चे माल या सस्ते उत्पादों का निर्यातक नहीं है। IT, फाइनेंस, डिजाइन, रिसर्च और डेवलपमेंट जैसी सेवाओं में भारत वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी है। दवाइयां, इंजीनियरिंग उत्पाद, केमिकल्स और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे क्षेत्रों में भी भारत की मजबूत मौजूदगी है। अमेरिका और यूरोप भारत के सबसे बड़े बाजार हैं, और Tata, Mahindra, Infosys, Wipro, HCL और Airtel जैसी कंपनियां दुनिया भर में भारत का प्रतिनिधित्व कर रही हैं। भारत की अर्थव्यवस्था पहले से ही हाई-वैल्यू और वैश्विक रूप से जुड़ी हुई है, लेकिन उसकी व्यापार नीति अब भी जरूरत से ज्यादा रक्षात्मक बनी हुई है।

बहुपक्षीय सुरक्षा कवच का अंत और भारत की दुविधा

भारत ने लंबे समय तक WTO और GATT के तहत “विशेष छूट” का सहारा लेकर अपनी नीतिगत आज़ादी बचाई। यह रणनीति तब तक कारगर रही, जब तक बहुपक्षीय व्यवस्था मजबूत थी। अब जबकि वह व्यवस्था कमजोर पड़ चुकी है, व्यापार का केंद्र द्विपक्षीय और क्षेत्रीय समझौते बन गए हैं। यही वह क्षेत्र है, जहां भारत अक्सर हिचकिचाता है। सीमित FTA और कठिन शर्तें भारत की वैश्विक आकांक्षाओं के रास्ते में बाधा बन रही हैं।

ट्रंप टैरिफ, वेनेजुएला और आर्थिक दबाव की सख्त सीख

ट्रंप काल के टैरिफ ने यह साफ कर दिया कि विकसित देश अब व्यापार घाटे को अनंत काल तक सहन नहीं करेंगे। टैरिफ घरेलू राजनीति और राष्ट्रीय सुरक्षा का हथियार बन चुके हैं—और यह सोच ट्रंप के बाद भी खत्म नहीं हुई। भारत के लिए यह दौर अवसर भी लाता है, क्योंकि वैश्विक कंपनियां नए सप्लायर और मैन्युफैक्चरिंग हब तलाश रही हैं। लेकिन खतरा भी उतना ही बड़ा है, क्योंकि बाजार तक पहुंच कभी भी अस्थिर हो सकती है। वेनेजुएला का अनुभव बताता है कि अगर व्यापार और वित्त को हथियार बना दिया जाए, तो पूरी अर्थव्यवस्था ठप हो सकती है। भारत के लिए संदेश साफ है—विविधीकरण अब मजबूरी नहीं, रणनीतिक सुरक्षा है।

भारत के सामने तीन रास्ते: बंद, सीमित या खुला व्यापार

आज भारत के सामने तीन स्पष्ट विकल्प हैं। पहला, ट्रेड ज़ीरो, जिसमें घरेलू बाजार पर निर्भरता बढ़ाई जाए—यह राजनीतिक रूप से सुरक्षित है, लेकिन विकास को सीमित कर देता है। दूसरा, डाइट ट्रेड, जिसमें कुछ भरोसेमंद साझेदारों से सीमित व्यापार किया जाए—यह कुछ लाभ देता है, लेकिन भारत की बड़ी महत्वाकांक्षाओं को पूरा नहीं करता। तीसरा, ट्रेड रेगुलर, जिसमें भारत खुद को वैश्विक अर्थव्यवस्था के केंद्र में स्थापित करे—यह कठिन है, सुधार मांगता है, लेकिन सबसे ज्यादा अवसर, पूंजी, तकनीक और प्रभाव देता है।

हिचक से रणनीति की ओर भारत

वास्तविकता यह है कि भारत की अर्थव्यवस्था पहले से ही ट्रेड रेगुलर की दिशा में बढ़ चुकी है। उसकी कंपनियां वैश्विक हैं, उसकी सेवाएं खुले बाजार पर निर्भर हैं और उसकी विकास आकांक्षाएं अंतरराष्ट्रीय जुड़ाव के बिना पूरी नहीं हो सकतीं। समस्या दिशा की नहीं, नीति की है। आज की दुनिया में व्यापार कोई विचारधारा नहीं, बल्कि ताकत का औज़ार है। अगर भारत को 21वीं सदी की निर्णायक शक्ति बनना है, तो उसे हिचक छोड़कर एक स्पष्ट, साहसी और रणनीतिक व्यापार नीति अपनानी होगी—जो उसके आर्थिक सामर्थ्य और वैश्विक भूमिका के अनुरूप हो।

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