एबीसी डेस्क 27 दिसंबर 2025
दिग्विजय सिंह: भोले नहीं, बल्कि राजनीति के पुराने खिलाड़ी
दिग्विजय सिंह को अक्सर ऐसा नेता दिखाया जाता है जो सहज, बेबाक और कभी-कभी जरूरत से ज़्यादा ईमानदार नजर आता है। लेकिन भारतीय राजनीति को समझने वाला हर आदमी जानता है कि दिग्विजय सिंह उतने भोले नहीं हैं जितने वे दिखाई देते हैं। वे उस दौर की राजनीति के गवाह रहे हैं जब सत्ता के फैसले बंद कमरों में तय होते थे और संगठन से ज़्यादा रणनीति मायने रखती थी। नरेंद्र मोदी को केशुभाई पटेल के मुकाबले खड़ा करना कोई अचानक लिया गया फैसला नहीं था—यह एक सोची-समझी राजनीतिक चाल थी, जिसमें आडवाणी की सिफारिश और संघ की सहमति अहम थी। दिग्विजय सिंह यह सब जानते हैं, फिर भी जब वे आज की राजनीति पर हल्की टिप्पणियां करते हैं, तो सवाल उठना स्वाभाविक है।
मोदी का उदय: योग्यता नहीं, परिस्थितियों की पैदाइश
नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के पीछे योग्यता से अधिक परिस्थितियों का योगदान रहा—यह बात इतिहास के पन्नों में दर्ज है। गुजरात दंगों के बाद जिस तरह का ध्रुवीकरण हुआ, उसने भाजपा और आरएसएस को यह विश्वास दिला दिया कि हिंदू राजनीति को डर, नफरत और अस्मिता के उभार से साधा जा सकता है। इसके साथ ही कॉरपोरेट जगत का दबाव भी खुलकर सामने आया, जिसने “मजबूत नेता” की छवि को हवा दी। अटल बिहारी वाजपेयी यह भली-भांति समझते थे कि मोदी में गंभीर प्रशासनिक और नैतिक कमियां हैं—इसीलिए उन्होंने सार्वजनिक मंच से उन्हें ‘राजधर्म’ की याद दिलाई थी। यह किसी औपचारिक भाषण का हिस्सा नहीं था, बल्कि एक चेतावनी थी।
कांग्रेस पर तंज और ‘दरी की कतार’ का मिथक
दिग्विजय सिंह जैसे नेता जब यह कहते हैं कि कांग्रेस में आगे बढ़ने के लिए ‘दरी पर आगे बैठना’ पड़ता है, तो यह आधा सच है। कांग्रेस में खामियां हैं—अनुशासन की कमी, गुटबाजी, और कई बार स्पष्ट नेतृत्व का अभाव। लेकिन यह भी उतना ही बड़ा सच है कि कांग्रेस ने बार-बार जमीन से उठे नेताओं को शीर्ष तक पहुंचाया है। सवाल यह नहीं है कि कौन आगे बैठा, सवाल यह है कि किसने पार्टी और समाज के लिए संघर्ष किया।
मल्लिकार्जुन खड़गे: संघर्ष से शीर्ष तक
मल्लिकार्जुन खड़गे का राजनीतिक सफर कांग्रेस की उस परंपरा का उदाहरण है, जिसे आज जानबूझकर भुलाया जा रहा है। कर्नाटक के कलबुर्गी जिले के एक साधारण कार्यकर्ता से शुरू होकर उन्होंने नौ बार विधानसभा चुनाव जीते, मंत्री बने, लोकसभा में विपक्ष के नेता रहे और आज कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। दलित समाज से आने वाला यह नेता किसी खानदानी विरासत से नहीं, बल्कि संघर्ष, धैर्य और संगठन के भरोसे आगे बढ़ा है। यह बताता है कि कांग्रेस अब भी अवसर देती है—बस शर्त यह है कि संघर्ष वास्तविक हो।
के. कामराज: सत्ता छोड़कर संगठन मजबूत करने वाला नेता
के. कामराज भारतीय राजनीति में त्याग और संगठनात्मक ईमानदारी का सबसे बड़ा नाम हैं। बेहद गरीब पृष्ठभूमि से आने वाले कामराज ने जेल यात्राएं झेलीं, तमिलनाडु के मुख्यमंत्री बने और फिर कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष। लेकिन उनका सबसे बड़ा योगदान ‘कामराज प्लान’ था, जिसमें उन्होंने खुद सत्ता छोड़ दी ताकि पार्टी को जमीनी स्तर पर मजबूत किया जा सके। आज के दौर में, जब कुर्सी से चिपके रहना ही राजनीति का लक्ष्य बन गया है, कामराज एक भूली-बिसरी मिसाल हैं।
पी.वी. नरसिम्हा राव: संगठन से सत्ता तक
पी.वी. नरसिम्हा राव को अक्सर केवल आर्थिक सुधारों तक सीमित कर दिया जाता है, लेकिन उनका राजनीतिक सफर इससे कहीं बड़ा था। साधारण पृष्ठभूमि से निकलकर वे आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री बने, वर्षों तक संगठन में काम किया और देश के प्रधानमंत्री बने। 1991 के आर्थिक सुधार किसी जादू का नतीजा नहीं थे, बल्कि दशकों के राजनीतिक अनुभव और समझ का परिणाम थे। कांग्रेस ने उन्हें मौका दिया—और उन्होंने इतिहास बदल दिया।
सीताराम केसरी: हाशिए से अध्यक्ष पद तक
सीताराम केसरी कांग्रेस के पहले गैर-ब्राह्मण राष्ट्रीय अध्यक्ष थे। बिहार से उठे, जमीनी राजनीति की और पार्टी के शीर्ष तक पहुंचे। उनका दौर विवादों से भरा रहा, लेकिन यह तथ्य नहीं बदला जा सकता कि कांग्रेस ने सामाजिक पृष्ठभूमि नहीं, बल्कि राजनीतिक यात्रा को महत्व दिया। आज जब सामाजिक न्याय की बातें सिर्फ भाषणों में सिमट रही हैं, केसरी का उदाहरण याद किया जाना चाहिए।
सुरूपसिंह नाइक: आदिवासी क्षेत्र से राष्ट्रीय पहचान
महाराष्ट्र के आदिवासी बहुल नवापुर क्षेत्र से आने वाले सुरूपसिंह नाइक जैसे नेताओं ने दशकों तक जमीनी राजनीति की। विधायक, मंत्री और वरिष्ठ नेता के रूप में उन्होंने दिखाया कि कांग्रेस सिर्फ शहरी अभिजात वर्ग की पार्टी नहीं रही है। आदिवासी और हाशिए के समाज को प्रतिनिधित्व देना कांग्रेस की ऐतिहासिक मजबूरी नहीं, बल्कि उसकी पहचान रही है।
थरूर, अनुशासन और कांग्रेस की दुविधा
शशि थरूर जैसे पढ़े-लिखे, वैश्विक दृष्टि वाले नेता कांग्रेस की ताकत भी हैं और चुनौती भी। उनकी स्वतंत्र राय, अंतरराष्ट्रीय स्वीकार्यता और आत्मविश्वास कई बार पार्टी नेतृत्व को असहज करता है। लेकिन सवाल यह है—क्या अनुशासन का मतलब चुप्पी है? या विचारों की विविधता? कांग्रेस की समस्या अनुशासन की कमी नहीं, बल्कि स्पष्ट राजनीतिक दिशा का अभाव है। जब दिशा साफ होगी, तो थरूर हों या दिग्विजय—सब उसी रेखा में खड़े दिखेंगे।
कांग्रेस की कमजोरी नहीं, उसकी विरासत सवालों में
कांग्रेस आज संकट में है, यह सच है। लेकिन यह कहना कि कांग्रेस सिर्फ ‘दरी पर बैठने वालों’ की पार्टी है, ऐतिहासिक अन्याय है। असल सवाल यह नहीं कि कौन कितना आगे बैठा, बल्कि यह है कि पार्टी अपने संघर्षशील अतीत से क्या सीख लेती है। दिग्विजय सिंह हों या शशि थरूर—आलोचना जरूरी है, लेकिन आत्ममंथन उससे भी ज्यादा। क्योंकि अगर कांग्रेस ने अपनी जड़ों को फिर से पहचाना, तो राजनीति में विकल्प अभी खत्म नहीं हुआ है।




