समी अहमद | नई दिल्ली 21 दिसंबर 2025
ढाका से आ रही तस्वीरें बेचैन करने वाली हैं। सड़कों पर गुस्से से भरी भीड़, जलते वाहन, टूटे शीशे और हवा में गूंजते नारे—“भारत हस्तक्षेप बंद करो”, “शेख हसीना को वापस भेजो।” यह सिर्फ एक विरोध प्रदर्शन नहीं, बल्कि उस असंतोष का विस्फोट है जो लंबे समय से भीतर सुलग रहा था। इस उबाल की शुरुआत युवा छात्र नेता शरीफ उस्मान हादी की मौत से हुई। 12 दिसंबर 2025 को ढाका में मस्जिद से निकलते वक्त उन पर अज्ञात हमलावरों ने गोलियां चलाईं। हालत नाजुक होने पर उन्हें सिंगापुर ले जाया गया, लेकिन 18 दिसंबर को उनकी मौत ने पूरे देश को झकझोर दिया।
हादी सिर्फ एक छात्र नेता नहीं थे, बल्कि पिछले साल के जुलाई आंदोलन का बड़ा चेहरा थे—वही आंदोलन जिसने शेख हसीना की सरकार को सत्ता से बाहर किया। वे खुले तौर पर भारत-विरोधी रुख रखते थे और अक्सर भारत पर बांग्लादेश के आंतरिक मामलों में दखल देने का आरोप लगाते थे। उनकी मौत की खबर फैलते ही गुस्सा सड़कों पर उतर आया। ढाका में प्रथम आलो और डेली स्टार जैसे बड़े अखबारों के दफ्तरों को आग के हवाले कर दिया गया, क्योंकि प्रदर्शनकारियों की नजर में ये “भारत-समर्थक” थे। चटगांव में भारतीय सहायक उच्चायोग पर पथराव हुआ। धानमंडी में शेख मुजीबुर रहमान के घर—जो अब खंडहर है—पर फिर हमला हुआ। हालात इतने बिगड़े कि एक हिंदू युवक की लिंचिंग की खबरों ने पूरे क्षेत्र को हिला दिया।
स्थिति को संभालने के लिए अंतरिम सरकार के प्रमुख मोहम्मद यूनुस को सेना उतारनी पड़ी। उन्होंने राष्ट्र के नाम संबोधन में शांति की अपील की और हादी के सम्मान में राजकीय शोक का ऐलान किया। लेकिन सच्चाई यह है कि अपीलों से गुस्सा ठंडा नहीं हुआ। सड़कों पर डर और अविश्वास का माहौल है, और हर नया बयान आग में घी डालने जैसा साबित हो रहा है।
दरअसल, बांग्लादेश में भारत-विरोध कोई नई बात नहीं है। अगस्त 2024 में शेख हसीना सरकार के गिरने के बाद से यह भावना और तेज हुई है। हसीना इस वक्त भारत में शरण लिए हुए हैं, जबकि बांग्लादेश की एक अदालत उन्हें मौत की सजा सुना चुकी है। अंतरिम सरकार कई बार भारत से उनके प्रत्यर्पण की मांग कर चुकी है, लेकिन भारत की चुप्पी ने कट्टरपंथी दलों और छात्र संगठनों को और उग्र कर दिया है। उनके लिए यह मुद्दा सिर्फ राजनीति नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्वाभिमान का सवाल बनता जा रहा है।
हाल के दिनों में बयानबाजी और भी खतरनाक हो गई है। छात्र नेता हसनत अब्दुल्ला, जो पहले अंतरिम सरकार के सलाहकार रह चुके हैं और अब नेशनल सिटीजन पार्टी के नेता हैं, ने खुली धमकी दी कि अगर भारत ने बांग्लादेश को अस्थिर करने की कोशिश की तो भारत के पूर्वोत्तर के सात राज्यों को देश से काट दिया जाएगा। इस बयान पर भारत ने कड़ा रुख अपनाते हुए बांग्लादेशी राजदूत को तलब किया। वहीं अंतरिम सरकार के एक अन्य सलाहकार मोहम्मद तौहीद हुसैन ने आरोप लगाया कि भारत 1971 के मुक्ति संग्राम में बांग्लादेश के योगदान को कम करके देखता है। ऐसे आरोप और जवाबी प्रतिक्रियाएं रिश्तों को और तल्ख बना रही हैं।
फरवरी 2026 के संसदीय चुनाव नजदीक हैं, और यही सबसे बड़ी चिंता की बात है। राजनीतिक जानकार मानते हैं कि यह चुनाव भारत-विरोध के मुद्दे पर लड़ा जा सकता है। जमात-ए-इस्लामी और बीएनपी जैसे दल पहले से ही भारत-विरोधी लाइन पर हैं। अवामी लीग पर बैन लगने के बाद मैदान लगभग खाली है, और हर दल जनता के गुस्से को भुनाने की कोशिश में है। प्रोफेसर संगीता घोष कहती हैं कि भारत-विरोध चुनावी राजनीति का सबसे बड़ा हथियार बन सकता है। उनका मानना है कि अगर समय रहते राजनयिक बातचीत नहीं हुई, तो दोनों देशों के रिश्ते और बिगड़ेंगे।
भारत के लिए यह सिर्फ पड़ोसी देश की उथल-पुथल नहीं है, बल्कि एक सीधी चेतावनी भी है। पूर्वोत्तर की सुरक्षा, सीमावर्ती इलाकों में तनाव और बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों पर हमले—सब आपस में जुड़े हुए हैं। अंतरिम यूनुस सरकार शांतिपूर्ण चुनाव का भरोसा दिला रही है, लेकिन जिस तरह हिंसा और कट्टरता की आग फैल रही है, उसे बुझाना आसान नहीं होगा। आखिरकार, जब पड़ोसी के घर में आग लगती है, तो उसकी गर्मी अपने घर तक पहुंचती ही है। उम्मीद बस यही है कि ढाका और दिल्ली दोनों समझदारी दिखाएं, संवाद का रास्ता खोलें और दशकों पुराने रिश्तों को इस आग में जलने से बचा लें।





