मध्य प्रदेश के प्याज उत्पादक किसान इन दिनों खून के आंसू रो रहे हैं। राज्य के कई जिलों — नीमच, मंदसौर, उज्जैन, रतलाम और शाजापुर — की मंडियों में प्याज की कीमत सिर्फ 2 रुपये प्रति किलो तक गिर गई है। किसानों की हालत यह है कि वे अपनी मेहनत की उपज औने-पौने दामों में बेचने को मजबूर हैं, क्योंकि उनके पास न तो भंडारण की सुविधा है, न ही इंतज़ार की गुंजाइश। धूप में झुलसते, बारिश में भीगते और कर्ज के बोझ तले दबे किसान अब अपने प्याज की उपज को ट्रैक्टरों से मंडियों तक लेकर जा रहे हैं — लेकिन लौटते वक्त उनके हाथों में सिर्फ निराशा और आंखों में आंसू हैं।
मंडी के बाहर पड़े प्याज के ढेर किसानों की बेबसी का प्रतीक बन चुके हैं। 2 रुपये किलो के भाव में प्याज बेचना मतलब किसान की सालभर की मेहनत और लागत का अपमान। खेत जोतने, बीज, खाद, सिंचाई, मजदूरी, ट्रांसपोर्ट और मंडी शुल्क — इन सब खर्चों के बाद प्याज की लागत करीब 8 से 10 रुपये प्रति किलो पड़ती है। लेकिन बाजार में उन्हें उसका पांचवां हिस्सा भी नहीं मिल पा रहा। कई किसान तो मजबूर होकर अपनी उपज सड़कों पर फेंक रहे हैं, क्योंकि प्याज बेचने से बेहतर है उसे मिट्टी में मिलाना — कम से कम ट्रांसपोर्ट का खर्च तो बचेगा।
किसानों की यह हालत ऐसे समय में हो रही है जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2014 में वादा किया था कि “2022 तक किसानों की आय दोगुनी की जाएगी।” लेकिन 2025 तक पहुंचते-पहुंचते वास्तविकता यह है कि किसान की आय बढ़ने की बजाय घट गई है। केंद्र सरकार की योजनाएं, घोषणाएं और भाषण कागज़ों पर भले सुनहरे लगते हों, पर जमीन पर किसान की हालत लगातार बिगड़ती जा रही है। प्याज, टमाटर, लहसुन, आलू — हर फसल के दाम औंधे मुंह गिर रहे हैं, और कृषि नीति अब किसान के पक्ष में नहीं बल्कि बाज़ार और बिचौलियों के लिए ज्यादा लाभकारी दिखती है।
प्याज किसानों का कहना है कि अगर सरकार वास्तव में किसानहितैषी होती, तो न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) लागू करती और बाजार में बिचौलियों पर रोक लगाती। लेकिन सरकार ने न तो प्याज को MSP के दायरे में शामिल किया, न ही मूल्य स्थिरीकरण फंड का उपयोग किसानों के लिए किया। परिणामस्वरूप आज प्याज किसान या तो कर्ज़ में डूब रहे हैं या आत्महत्या के कगार पर पहुंच चुके हैं।
विपक्षी दलों ने भी इस मुद्दे पर मोदी सरकार पर तीखा हमला बोला है। कांग्रेस प्रवक्ताओं ने कहा कि “प्रधानमंत्री किसानों की आय दोगुनी करने का वादा करके आए थे, लेकिन हकीकत यह है कि उन्होंने किसानों को पूरी तरह बर्बाद कर छोड़ा है।” पार्टी ने सरकार से तत्काल राहत पैकेज और प्याज किसानों के लिए समर्थन मूल्य तय करने की मांग की है।
राजनीतिक विश्लेषक इसे चुनावी वादों और जमीनी सच्चाई के बीच की खाई का सबसे बड़ा उदाहरण मान रहे हैं। किसानों की नाराज़गी अब धीरे-धीरे सड़कों पर उतरने लगी है। गाँवों से शहरों तक “किसान के आंसू, सरकार की चुप्पी” जैसे नारे सुनाई दे रहे हैं। यदि हालात ऐसे ही बने रहे, तो यह केवल प्याज का संकट नहीं रहेगा — बल्कि भारत के किसान के धैर्य का अंत बन सकता है।





