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RSS नहीं, ‘viRSS’—लोकतंत्र के लिए वायरस जैसा ख़तरा: कांग्रेस

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बेंगलुरु 17 नवंबर 2025

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के बेटे और कर्नाटक सरकार में मंत्री प्रियंक खड़गे ने RSS पर अब तक का सबसे तीखा राजनीतिक हमला करते हुए उसे “viRSS—एक वायरस” कहा है। उनका आरोप है कि भारत के सामाजिक-राजनीतिक ढांचे में एक ऐसा संगठन खड़ा हो चुका है जो संवैधानिक व्यवस्था के बाहर खड़ा है, लेकिन सरकारों की नीतियों से लेकर मीडिया, शिक्षा, नौकरशाही और सिविल सोसाइटी तक—हर स्तर पर गहरी पैठ रखता है। प्रियंक खड़गे का कहना है कि यह ऐसा ढांचा है जिसकी न कोई परिभाषा है, न कोई कानूनी जवाबदेही, और न कोई पारदर्शी ऑडिट। इसके बावजूद इसकी पकड़ अनेक संस्थाओं से भी कहीं अधिक मजबूत है। कांग्रेस नेता के अनुसार, यह “body of individuals” कानून से ऊपर खड़ी एक ऐसी शक्ति है जिसे नियंत्रित करना लगभग नामुमकिन है, और जिसने वर्षों में एक पूरा “विचार परिवार” खड़ा कर लिया है—एक ऐसा परिवार जिसमें सैकड़ों संगठन, मोर्चे, ट्रस्ट, शाखाएँ और सेल शामिल हैं, जो खुले राजनीतिक दलों से ज़्यादा असरदार हैं क्योंकि वे पर्दे के पीछे से सत्ता का संचालन करते हैं।

प्रियंक खड़गे का आरोप है कि यह नेटवर्क केवल विचारधारा प्रचार का माध्यम नहीं, बल्कि एक पूर्ण और गहराई तक फैला हुआ छाया-इकोसिस्टम बन चुका है। इसकी पकड़ इतनी व्यापक है कि नौकरशाही के नियुक्ति तंत्र से लेकर विश्वविद्यालयों की वैचारिक दिशा तक, मीडिया की खबरों से लेकर कॉर्पोरेट-राजनीतिक संबंधों तक—हर जगह इसकी छाप दिखाई देती है। किसे कुलपति बनाना है, किस NGO को देशद्रोही घोषित करना है, कौन-सा टीवी चैनल किस नैरेटिव को चलाएगा, कौन सा अफसर किस राज्य में पोस्ट होगा, कौन-सी किताबें स्कूलों में पढ़ाई जाएंगी—यह सब निर्णय अक्सर सार्वजनिक मंचों पर नहीं, बल्कि इसी छाया-तंत्र की बंद कमरों में तय होते हैं। यह वही बात है जिस पर कांग्रेस नेता जोर देते हैं—कि एक अदृश्य, अघोषित, लेकिन अत्यंत शक्तिशाली व्यवस्था लोकतंत्र के सिर पर बैठ चुकी है।

कांग्रेस का आरोप केवल वैचारिक संरचना पर नहीं, बल्कि उस आर्थिक ढांचे पर भी है जो इस पूरे तंत्र को शक्ति देता है। प्रियंक खड़गे के अनुसार, RSS और उसके संबद्ध संगठनों का असली वित्तीय आधार वह “गुरु दक्षिणा” नहीं है जिसे पवित्रता के साथ प्रचारित किया जाता है। इसके बजाय, वर्षों में एक बेहद जटिल, अपारदर्शी और अनियमित फंडिंग नेटवर्क विकसित हुआ है—जिसमें धनशोधन (Money Laundering), बेनामी दान, अवैध विदेशी चंदा, नकद प्रवाह, और सबसे अहम, इलेक्टोरल बॉन्ड्स जैसी अपारदर्शी व्यवस्थाएँ शामिल हैं। उनका कहना है कि हजारों करोड़ रुपये उधर से उन राजनीतिक दलों और संगठनों तक पहुँचाए गए, जिनकी विचारधारा इस “विचार परिवार” से मेल खाती है। यह वही फंडिंग मॉडल है जिसे सुप्रीम कोर्ट ने असंवैधानिक घोषित किया, क्योंकि इससे जनता को यह जानने का अधिकार ही खत्म हो गया था कि राजनीतिक दलों का वित्तीय स्रोत कौन है और किस हित की पूर्ति के लिए पैसा पहुँचाया जा रहा है।

प्रियंक खड़गे का तर्क है कि फंडिंग की यह गुप्त संरचना इस नेटवर्क को न केवल आर्थिक शक्ति देती है, बल्कि उसे संस्थागत दखल का रास्ता भी उपलब्ध कराती है। शिक्षा में पाठ्यक्रम बदलने हों, मीडिया में नैरेटिव सेट करने हों, चुनावों में बूथ-स्तर की सोशल इंजीनियरिंग करनी हो या विदेशों में भारत की छवि को विशेष विचारधारा के अनुरूप ढालना—सभी काम इस अपारदर्शी पूंजी से चलते हैं। यह पूरी मशीनरी लोकतंत्र के विमर्श, बहस और नीतियों को प्रभावित करती है, लेकिन इसकी गतिविधियों की कोई जवाबदेही नहीं—न संसद में, न किसी वैधानिक निकाय के सामने। यही कारण है कि कांग्रेस इसे “viRSS”—अर्थात वायरस की तरह फैलने वाला, पर अदृश्य और बेहद खतरनाक तंत्र—कह रही है।

कांग्रेस का सबसे गंभीर आरोप यह है कि यह मॉडल—गोपनीयता, अनियंत्रित फंडिंग और व्यापक वैचारिक पैठ का संगम—भारतीय लोकतंत्र के लिए संरचनात्मक खतरा बन चुका है। लोकतंत्र के तीन स्तंभ—पारदर्शिता, जवाबदेही और सार्वजनिक निगरानी—इन सभी की उपेक्षा इसी मॉडल में होती है। जब एक ऐसी शक्ति संरचना मौजूद हो, जो न जनता के प्रति जवाबदेह हो, न संस्थाओं के प्रति, और न ही किसी कानूनी ढांचे में बंधी हो—लेकिन जिसके बावजूद वह सरकार, संसद, शिक्षा, मीडिया, न्यायपालिका और नौकरशाही पर गहरा प्रभाव रखती हो—तब लोकतंत्र केवल चुनावों की व्यवस्था बनकर रह जाता है। असल नियंत्रण उन हाथों में चला जाता है जो न तो चुने गए हैं और न ही सार्वजनिक जवाबदेही को स्वीकार करते हैं।

अंत में, प्रियंक खड़गे का दावा है कि भारत में लोकतंत्र को सबसे बड़ा खतरा उन लोगों से नहीं है जो चुनाव लड़ते हैं या हारते-जीतते हैं—बल्कि उन अदृश्य ढाँचों से है जो पर्दे के पीछे से सत्ता का संचालन करते हैं, नीतियों को दिशा देते हैं और समाज को वैचारिक रूप से अपने अनुरूप ढालते हैं। खड़गे का “viRSS” शब्द इसी खतरे की ओर इशारा करता है—एक ऐसा तंत्र जो लोकतंत्र के बाहर खड़ा है, लेकिन लोकतंत्र को भीतर से नियंत्रित करता है।

कांग्रेस का संदेश स्पष्ट है—जब तक यह छाया-साम्राज्य बिना किसी जवाबदेही के सक्रिय रहेगा, तब तक लोकतंत्र का वास्तविक मालिक जनता नहीं बल्कि एक गुप्त विचार-संरचना रहेगी।

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