अंतरराष्ट्रीय डेस्क 21 नवंबर 2025
अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में हलचल मचाते हुए अमेरिका और रूस द्वारा तैयार की गई 28-बिंदुओं वाली ‘गुप्त युद्ध रोक योजना’ यूरोप के माथे पर गहरी चिंता की लकीरें खींच रही है। यह विवाद तब भड़का जब ब्रसेल्स में यूरोपीय विदेश मंत्रियों की बैठक से ठीक पहले इस संवेदनशील दस्तावेज़ के कुछ हिस्से मीडिया में लीक हो गए। इस दस्तावेज़ में यूक्रेन के लिए बेहद घातक प्रस्ताव नजर आए—डोनबास क्षेत्र का पूरा समर्पण, यूक्रेनी सेना पर कठोर पाबंदियां, और मॉस्को के हितों के अनुकूल शर्तें। इस खबर ने यूरोपीय संघ के शीर्ष नेतृत्व में खलबली मचा दी। यूरोपीय संघ की विदेश नीति प्रमुख काया कलास ने खुलकर कहा कि युद्ध रोकने की कोई भी योजना बंद कमरों में नहीं बनाई जा सकती, और यूक्रेन या यूरोप को बाहर रखकर किसी भी सौदे का कोई भविष्य नहीं। उन्होंने तीखे शब्दों में चेतावनी देते हुए कहा कि यदि पुतिन सचमुच युद्ध खत्म करना चाहते हैं, तो “यूक्रेनी नागरिकों पर बम बरसाना बंद कर दें”—लेकिन अभी तक रूस से समझौते जैसी कोई इच्छा नहीं झलक रही।
इसी बीच, BBC ने खबर दी कि अमेरिकी सैन्य अधिकारी कीव पहुंच चुके हैं, जहां वे राष्ट्रपति जेलेंस्की के साथ इस ‘गोपनीय प्रस्ताव’ पर बात करेंगे। इससे यूरोप की आशंकाएं और बढ़ गई हैं कि कहीं अमेरिका—रूस की बातचीत से यूरोप को दरकिनार कर संघर्ष का समाधान थोपने की कोशिश न की जाए। यूरोपीय देशों ने कहा कि यूक्रेन की भूमि, उसकी सुरक्षा और भविष्य का निर्धारण किसी तीसरे देश की बातचीत का विषय नहीं हो सकता। यह न सिर्फ यूरोपीय सुरक्षा के मूल ढांचे को चुनौती देता है, बल्कि विश्व व्यवस्था के लिए भी खतरनाक मिसाल बन सकता है।
इसी पृष्ठभूमि में यूरोप की दूसरी आर्थिक और नीतिगत खबरों ने भी भू-राजनीतिक परिदृश्य को और जटिल बना दिया है। यूरोपीय संघ ने पेंशन संकट से निपटने के लिए निजी पेंशन योजनाओं को मजबूत करने का प्रस्ताव रखा है, क्योंकि बढ़ती उम्र की आबादी राज्य की पेंशन प्रणाली पर भारी दबाव डाल रही है। EU का कहना है कि नागरिकों को वित्तीय सुरक्षा देना और रक्षा–हरित तकनीकों के लिए दस खरब यूरो जुटाना समय की मांग है। वहीं, एक और चौंकाने वाली रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि दुनिया के 24 अमीर देश—जिनमें अमेरिका और जापान भी शामिल हैं—गरीब देशों की मदद में पीछे हट रहे हैं। वैश्विक सहायता घटने से विकास सहयोग पर गंभीर खतरा मंडरा रहा है।
दूसरी ओर, पर्यावरण मोर्चे पर जर्मनी ने ब्राजील के वर्षावन कोष के लिए एक अरब यूरो देने का संकल्प लिया है, ताकि धरती के “हरे फेफड़ों” को बचाया जा सके। वहीं, दुनिया भर में डिजिटल कनेक्टिविटी का नेतृत्व कर रहा भारत—5G सब्सक्रिप्शन में 2031 तक एक अरब का आंकड़ा पार कर जाएगा, जिससे भारत वैश्विक तकनीकी नेटवर्क में केंद्रीय भूमिका निभाएगा। देश के भीतर, किशोर न्याय बोर्डों पर लंबित मामलों का गंभीर बोझ उजागर हुआ है, जहां 55% से अधिक केस कई राज्यों में वर्षों से अटके पड़े हैं।
उधर, सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में साफ कर दिया कि राष्ट्रपति और राज्यपालों को विधेयकों को मंजूरी देने की कोई बाध्य समयसीमा तय नहीं की जा सकती, लेकिन अगर राज्यपाल जानबूझकर कार्रवाई रोकते हैं, तो अदालत सीमित हस्तक्षेप कर सकती है। यह निर्णय केंद्र–राज्य संबंधों और संघवाद के भविष्य पर बड़ा असर डाल सकता है।
अंतरराष्ट्रीय मोर्चे पर, पाकिस्तान में फंसे 1,900 अफगानों की अनिश्चित स्थिति के बीच 52 अफगान नागरिक जर्मनी पुनर्वास के लिए पहुंच गए—यह नई जर्मन सरकार के गठन के बाद छठा समूह है। इसी क्रम में दक्षिण-पूर्व एशिया में मानव तस्करी के खिलाफ एक बड़ी जीत मिली है, जहां फिलीपींस की अदालत ने पूर्व मेयर एलिस गुओ को उम्रकैद की सजा सुनाई। जांच में यह खुलासा हुआ कि वह असल में चीनी नागरिक थीं और मानव तस्करी व ऑनलाइन स्कैम रैकेट चला रही थीं।
विश्व बैंक ने चेताया है कि कम आय वाले देशों को स्वास्थ्य सेवाओं पर तीन गुना खर्च बढ़ाना होगा, नहीं तो लाखों लोगों के जीवन पर संकट गहराएगा। आर्थिक मोर्चे पर चीन एक बार फिर अमेरिका को पीछे छोड़ते हुए जर्मनी का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार बन गया है, जबकि भारत में अफगानिस्तान के उद्योग मंत्री नूरुद्दीन अजीज़ी की यात्रा ने दोनों देशों के आर्थिक सहयोग को नई गति दी है।
दुनिया की राजनीति, अर्थव्यवस्था, युद्ध, जलवायु और मानवाधिकारों से जुड़ी इन सभी घटनाओं ने एक बात स्पष्ट कर दी है—विश्व व्यवस्था एक भारी हलचल के दौर से गुजर रही है, जहां हर निर्णय महाशक्तियों, क्षेत्रीय गठबंधनों और वैश्विक संस्थानों के संतुलन को गहराई से प्रभावित कर रहा है।




