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मोदी जितनी बार भी नाम रट लें, नेहरू के योगदान पर दाग नहीं लगा पाएंगे : गौरव गोगोई

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महेंद्र सिंह । नई दिल्ली 8 दिसंबर 2025

संसद के सत्र के दौरान कांग्रेस के उपनेता गौरव गोगोई ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर एक बार फिर सीधा राजनीतिक प्रहार किया। गोगोई ने विस्तृत आंकड़ों के साथ दावा किया कि प्रधानमंत्री जब भी किसी राष्ट्रीय मुद्दे पर बोलते हैं, उनकी राजनीतिक रणनीति बार-बार पंडित जवाहरलाल नेहरू और कांग्रेस पार्टी को घेरने की रहती है। गोगोई ने कहा कि यह सिर्फ राजनीतिक हमला नहीं, बल्कि एक व्यवस्थित प्रयास है जिससे जनता का ध्यान मौजूदा मुद्दों और सरकार की नाकामियों से हटाया जा सके। उन्होंने यह आरोप भी लगाया कि प्रधानमंत्री अपने भाषणों में स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री का नाम इतनी बार लेते हैं कि यह एक राजनीतिक ‘टूल’ बन चुका है—जिसका उद्देश्य इतिहास को पुनर्परिभाषित करना और राजनीतिक विमर्श को भटकाना है।

गोगोई द्वारा पेश किए गए आंकड़े—“मोदी जी के भाषणों में नेहरू और कांग्रेस एक अनिवार्य तत्व”

गौरव गोगोई ने सदन में कुछ अहम आंकड़े पेश किए, जिनके अनुसार—

ऑपरेशन सिंदूर पर प्रधानमंत्री के भाषण में पंडित नेहरू का नाम 14 बार और कांग्रेस का 50 बार लिया गया।

संविधान की 75वीं वर्षगांठ पर दिए संबोधन में नेहरू का नाम 10 बार और कांग्रेस का 26 बार लिया गया।

2022 के राष्ट्रपति अभिभाषण पर चर्चा में नेहरू का नाम 15 बार आया।

2020 के राष्ट्रपति अभिभाषण पर बोलते हुए प्रधानमंत्री ने नेहरू का नाम 20 बार लिया।

गोगोई का तर्क था कि ये आंकड़े सिर्फ संयोग नहीं, बल्कि यह दर्शाते हैं कि प्रधानमंत्री हर नीति, हर विफलता और हर बहस को इतिहास की ओर मोड़ देते हैं ताकि वर्तमान की जवाबदेही से बचा जा सके। उन्होंने यह भी कहा कि यह राजनीतिक संस्कृति के लिए बेहद चिंताजनक है कि सत्तारूढ़ दल देश के सबसे महत्वपूर्ण संस्थानों और बहसों को बार-बार इतिहास बनाम वर्तमान की लड़ाई में बदल देता है।

“नेहरू पर कीचड़ उछालने की राजनीति बेअसर”—गोगोई का प्रधानमंत्री और सरकार पर गहरा कटाक्ष

गौरव गोगोई ने अपने संबोधन में कहा कि प्रधानमंत्री और उनका पूरा राजनीतिक तंत्र पंडित नेहरू की छवि को धूमिल करने के लिए कितना भी प्रयास कर ले, भारत के पहले प्रधानमंत्री के योगदान पर एक भी दाग नहीं लगाया जा सकता। उन्होंने जोर देकर कहा कि नेहरू ने लोकतंत्र, संस्थाओं, संविधान, वैज्ञानिक विकास, पंचवर्षीय योजनाओं, पीएसयू, विदेश नीति और आधुनिक भारत की नींव रखने में वह भूमिका निभाई है जिसे कोई भी सरकार या राजनीतिक दल इतिहास से मिटा नहीं सकता। गोगोई ने कहा कि नेहरू सिर्फ एक नेता नहीं, बल्कि वह विचारधारा हैं जिसने भारत की आधुनिक पहचान गढ़ी है।

उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री की बार-बार की आलोचनाएँ इस बात का प्रमाण हैं कि वर्तमान सरकार नेहरू को एक राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक छाया के रूप में देखती है—जिससे उन्हें लगातार अपनी तुलना करनी पड़ती है। यह स्थिति खुद दर्शाती है कि नेहरू आज भी भारतीय राजनीति में कितने प्रासंगिक हैं।

राजनीतिक संदेश स्पष्ट—कांग्रेस की रणनीति आक्रामक, नेहरू की विरासत बनाम वर्तमान सत्ता की राजनीति का टकराव

गोगोई का यह बयान केवल सरकार की आलोचना नहीं, बल्कि कांग्रेस की एक सुस्पष्ट राजनीतिक रणनीति का हिस्सा है। पार्टी अब खुलकर यह रेखांकित कर रही है कि भाजपा की राजनीति “नेहरू विरोध” को एक स्थायी हथियार की तरह इस्तेमाल करती है। कांग्रेस यह दिखाना चाहती है कि मोदी हर मंच पर नेहरू का नाम लेकर राजनीतिक लाभ उठाना चाहते हैं, जबकि वास्तविक चुनौतियों—बेरोज़गारी, आर्थिक सुस्ती, सामाजिक विभाजन, संस्थागत कमजोरी—पर ध्यान नहीं देते।

गोगोई के वक्तव्य का यह भी संकेत है कि आने वाले महीनों में कांग्रेस, नेहरू की विरासत को राजनीतिक प्रतिरोध का केंद्र बनाएगी। यह रणनीति भाजपा के इस नैरेटिव को सीधे चुनौती देती है कि देश की हर समस्या की जड़ नेहरू के निर्णयों में थी। गोगोई ने यह स्पष्ट किया कि नेहरू की समकालीन आलोचना और वर्तमान राजनीति में उनकी बार-बार आलोचना—दोनों में बहुत बड़ा अंतर है, और दोनों को जानबूझकर मिलाया जा रहा है।

संघर्ष सिर्फ शब्दों का नहीं, इतिहास और भविष्य की परिभाषा का

गौरव गोगोई के बयान ने एक बार फिर संकेत दिया है कि आज की भारतीय राजनीति में इतिहास का उपयोग सिर्फ स्मृति के रूप में नहीं, बल्कि तीखे राजनीतिक हथियार के रूप में किया जा रहा है। प्रधानमंत्री द्वारा बार-बार नेहरू और कांग्रेस का उल्लेख और कांग्रेस द्वारा इन बयानों का प्रतिवाद—दोनों मिलकर दिखाते हैं कि यह संघर्ष सिर्फ शासन और विपक्ष का नहीं, बल्कि भारत की आधुनिकता, विकास और विचारधारा की परिभाषा का संघर्ष है।

गोगोई के शब्द विपक्ष की तरफ से एक मजबूत प्रतिरोध का प्रतीक माने जा रहे हैं—जिसमें संदेश साफ है कि नेहरू की विरासत को न तो दागदार किया जा सकता है, न ही भुलाया जा सकता है।

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