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जनता के हक़ पर सौदा मंज़ूर नहीं : उमर अब्दुल्ला

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नेशनल कॉन्फ्रेंस (NC) के उपाध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने जम्मू-कश्मीर के राज्यत्व की बहाली पर केंद्र सरकार को सीधी चुनौती दी है। उनका कहना है कि अगर उनकी पार्टी ने बीजेपी से समझौता कर लिया होता, तो राज्य का दर्जा आज तक बहाल हो चुका होता। लेकिन वे सत्ता की कुर्सी के लिए जनता के अधिकारों का सौदा करने को तैयार नहीं। उमर का यह बयान न केवल बीजेपी की नीतियों पर हमला है, बल्कि उनके सिद्धांतों और जनता के साथ खड़े रहने की प्रतिबद्धता का भी ऐलान है।

जम्मू-कश्मीर की अस्मिता का सवाल

2019 में अनुच्छेद 370 और 35A हटने के बाद जम्मू-कश्मीर की विशेष पहचान समाप्त कर दी गई थी। तब से ही राज्यत्व बहाली का मुद्दा हर नागरिक की जुबान पर है। उमर अब्दुल्ला का कहना है कि यह कोई राजनीतिक सौगात नहीं, बल्कि संवैधानिक अधिकार है जिसे छीना गया और अब उसे बहाल किया जाना चाहिए। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि “यह बहाली जनता का हक़ है, सरकार की मेहरबानी नहीं।”

बीजेपी के साथ समझौते पर दो-टूक

उमर अब्दुल्ला ने बिना किसी लाग-लपेट के कहा— “अगर यह जरूरी है कि सरकार में बीजेपी को शामिल करना ही होगा, तो मेरा इस्तीफा स्वीकार कर लीजिए। आप किसी भी विधायक को मुख्यमंत्री बना दीजिए और बीजेपी के साथ सरकार बना लीजिए। लेकिन मैं इस सौदे का हिस्सा नहीं बनूंगा।” यह बयान उस राजनीतिक संस्कृति के खिलाफ है, जहाँ सत्ता के लिए समझौते आम हो चुके हैं। उमर का कहना है कि उनकी पार्टी सत्ता के लिए अपने मूल्यों और जनता की उम्मीदों से समझौता नहीं कर सकती।

राज्यत्व बहाली में देरी पर केंद्र को घेरा

उमर ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार बार-बार बहाली के वादे करके उसे टाल रही है। जनता सालों से धैर्यपूर्वक इंतजार कर रही है, लेकिन दिल्ली की चुप्पी से निराशा बढ़ती जा रही है। उन्होंने सवाल किया कि जब राज्यत्व बहाल करना ही है तो देरी क्यों? क्या यह देरी जनता को थकाने और कमजोर करने की रणनीति है?

सिद्धांतों की राजनीति बनाम सत्ता का सौदा

नेशनल कॉन्फ्रेंस का रुख़ हमेशा से साफ रहा है — सत्ता से ज्यादा अहम जनता का भरोसा। उमर अब्दुल्ला ने एक बार फिर इसे साबित किया। उन्होंने यह साफ संदेश दिया कि वे मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ सकते हैं, लेकिन बीजेपी की शर्तों पर समझौता करके अपने लोगों के हक़ से समझौता नहीं करेंगे। यही उनकी राजनीति की पहचान है — समझौताविहीन, सिद्धांतों पर टिकी हुई।

370 हटने के बाद का परिदृश्य

अनुच्छेद 370 और 35A हटने के बाद से ही जम्मू-कश्मीर की सियासत अशांत है। राज्य का दर्जा छिन जाने से लोगों को अपने भविष्य और पहचान पर संकट महसूस हो रहा है। उमर अब्दुल्ला और उनकी पार्टी लगातार यह कहते आए हैं कि राज्य का दर्जा बहाल करना ही लोकतंत्र और न्याय की सच्ची बहाली होगी।

जनता के पक्षधर उमर

उमर अब्दुल्ला का ताज़ा बयान सिर्फ़ एक राजनीतिक टिप्पणी नहीं, बल्कि जनता के साथ उनके खड़े होने का सबूत है। उन्होंने साफ कर दिया है कि उनके लिए सत्ता की राजनीति नहीं, बल्कि जनता का भरोसा और लोकतांत्रिक अधिकार सबसे ऊपर हैं। यही वह बात है जो उन्हें भीड़ में अलग खड़ा करती है और यही वजह है कि आज भी जम्मू-कश्मीर की बड़ी आबादी उन्हें अपने असली प्रतिनिधि के तौर पर देखती है।

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