सरोज सिंह | पटना 21 नवंबर 2025
बिहार की राजनीति में जिस स्थिरता और नियंत्रण का प्रतीक वर्षों से मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को माना जाता था, वह अब एक नए मोड़ पर खड़ा दिखाई देता है। राज्य की नई सरकार में पहली बार ऐसा हुआ है कि नीतीश कुमार के पास गृह विभाग नहीं होगा, जबकि यह विभाग परंपरागत रूप से मुख्यमंत्री के पास रखने की राजनीतिक परंपरा के रूप में जाना जाता है। यह फैसला न सिर्फ प्रशासनिक ढांचे में बड़े बदलाव का संकेत देता है, बल्कि सत्ता के भीतर बदलते समीकरणों और भविष्य के राजनीतिक संदेशों को भी बेहद स्पष्ट कर देता है। गृह विभाग का किसी और को सौंपा जाना बिहार की राजनीतिक परंपरा से हटकर है और यह इस बात का प्रमाण है कि इस बार गठबंधन की सत्ता-साझेदारी पूरी तरह अलग दिशा में आगे बढ़ रही है।
इस अहम जिम्मेदारी को सौंपा गया है सम्राट चौधरी को—जो बीजेपी के वरिष्ठ नेता, उपमुख्यमंत्री और लंबे समय से हिन्दुत्व राजनीति के मजबूत स्तंभ के रूप में पहचान रखते हैं। सम्राट चौधरी को गृह विभाग मिलना सिर्फ एक प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि एक राजनीतिक घोषणा है कि बिहार में कानून-व्यवस्था, पुलिस ताकत, सुरक्षा तंत्र और आंतरिक नियंत्रण का केंद्र अब बीजेपी के हाथ में होगा। यह बीजेपी की बढ़ती शक्ति और प्रशासन पर उसकी निर्णायक पकड़ को दिखाता है। ऐसा माना जा रहा है कि यह नियुक्ति बीजेपी के 2025 और 2029 के बड़े राजनीतिक लक्ष्यों के अनुरूप है, जिसमें बिहार को राष्ट्रीय राजनीति के मुख्य मोर्चे पर एक निर्णायक राज्य के रूप में स्थापित करना शामिल है।
नई कैबिनेट सूची में विभागों का वितरण यह बताता है कि इस सरकार की दिशा अब साझा नेतृत्व की ओर बढ़ रही है, लेकिन नियंत्रण के दायरे स्पष्ट रूप से विभाजित किए गए हैं। सम्राट चौधरी को गृह विभाग के अलावा पुलिस आधुनिकीकरण, सुरक्षा सुधार और कानून-व्यवस्था की चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों का सीधा नेतृत्व सौंपा गया है। वहीं, नीतीश कुमार अब उन विभागों पर ध्यान केंद्रित करेंगे, जिनमें विकास, प्रशासनिक संरचनाओं का स्थिरीकरण और सामाजिक योजनाओं का संचालन शामिल होगा। यह एक तरह से ऐसी व्यवस्था है जिसमें मुख्यमंत्री राजनीतिक ‘फेस’ रहेंगे, लेकिन सत्ता का ‘कमांड पावर’ साझा होगा।
यह बदलाव ऐसे समय में आया है जब बिहार में अपराध, सांप्रदायिक तनाव, नशाखोरी, साइबर क्राइम और तस्करी से जुड़े मामलों में लगातार बदलाव और चुनौती देखने को मिल रही है। बीजेपी का तर्क है कि गृह विभाग को अपने हाथ में लेकर वे राज्य की ‘लॉ एंड ऑर्डर’ को नई दिशा देना चाहते हैं। दूसरी ओर, नीतीश कुमार यह संदेश देना चाहते हैं कि वह गठबंधन में समानता, साझेदारी और राजनीतिक स्थिरता के मॉडल को आगे बढ़ाना चाहते हैं—भले ही इसके लिए उन्हें अपने सबसे प्रतिष्ठित विभाग से हाथ क्यों न धोना पड़े।
राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि यह कदम व्यापक गठबंधन राजनीति का हिस्सा है, लेकिन साथ ही यह नीतीश कुमार की राजनीतिक यात्रा में एक महत्वपूर्ण मोड़ भी है। 17 साल मुख्यमंत्री रहने के बाद गृह विभाग छोड़ना सिर्फ एक प्रशासनिक त्याग नहीं—बल्कि एक संकेत है कि बिहार की सत्ता संरचना में अब ‘एक-ध्रुवीय नियंत्रण’ खत्म हो चुका है और एक नए ‘साझा शक्ति समीकरण’ का दौर शुरू हो चुका है। बीजेपी के लिए यह अवसर है अपने शासन मॉडल को सीधे लागू करने का, जबकि जदयू के लिए यह चुनौती है कि वह अपने राजनीतिक अस्तित्व और प्रभाव को बनाए रखे।
नई मंत्री सूची ने बिहार के हर राजनीतिक खिलाड़ी को संकेत दे दिया है कि आने वाले महीनों में राज्य की राजनीति में बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं। सम्राट चौधरी को गृह विभाग मिलना न सिर्फ प्रशासनिक नियंत्रण का पुनर्वितरण है, बल्कि आने वाले समय की चुनावी रणनीति, सत्ता विस्तार और राजनीतिक प्रभुत्व की दिशा भी साफ करता है। यह बदलाव बिहार की सत्ता में एक नए ‘युग’ की शुरुआत माना जा रहा है, जहाँ नीतीश कुमार का अनुभव और सम्राट चौधरी की राजनीतिक आक्रामकता मिलकर सत्ता का नया चरित्र गढ़ने जा रहे हैं।




