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चुनाव से पहले नीतीश को झटका: JDU विधायक संजीव कुमार RJD में, बीजेपी–JDU खेमे से पलायन शुरू

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पटना 3 अक्टूबर 2025

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 की घोषणा से ठीक पहले सूबे की राजनीति में बड़ी हलचल मच गई है। खगड़िया जिले के परबत्ता से विधायक डॉ. संजीव कुमार ने जेडीयू (JDU) छोड़कर राष्ट्रीय जनता दल (RJD) का दामन थामने का ऐलान कर दिया है। यह कदम मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है क्योंकि संजीव कुमार का क्षेत्रीय असर और जातीय समीकरण, दोनों ही पार्टी के लिए अहम थे। वे अब तेजस्वी यादव के नेतृत्व वाले महागठबंधन का हिस्सा बनने जा रहे हैं।

संजीव कुमार का कदम क्यों अहम है

डॉ. संजीव कुमार लंबे समय से जेडीयू के टिकट पर सक्रिय राजनीति कर रहे थे, लेकिन पार्टी नेतृत्व और संगठन से दूरी बढ़ती जा रही थी। टिकट बंटवारे की आशंका, स्थानीय समीकरण और नेतृत्व शैली से नाराज़ होकर उन्होंने आरजेडी का रुख किया। वे भूमिहार समुदाय से आते हैं, और आरजेडी ने इस कदम को अपने “सामाजिक विस्तार” के रूप में देखा है। तेजस्वी यादव इस शामिली को अपनी रणनीतिक जीत बता रहे हैं क्योंकि इससे विपक्षी खेमे की जातीय और क्षेत्रीय पकड़ और मज़बूत होगी।

बीजेपी–JDU से RJD–कांग्रेस खेमे में कौन-कौन आए?

हालाँकि अभी तक संजीव कुमार का शामिल होना सबसे ताज़ा और बड़ा उदाहरण है, लेकिन यह अकेला मामला नहीं है। पिछले कुछ वर्षों और हालिया महीनों में भी पलायन का सिलसिला देखने को मिला है।

2020 के बाद अनंत सिंह (पूर्व JDU विधायक) ने RJD से हाथ मिलाया था।

कई स्थानीय स्तर के नेता और कार्यकर्ता, खासकर सीमांचल और मगध क्षेत्रों में, धीरे-धीरे कांग्रेस और आरजेडी के पाले में गए हैं। चुनाव से पहले 2–3 और JDU विधायक और कुछ बीजेपी नेता भी महागठबंधन में शामिल होने की तैयारी में हैं, हालांकि उनके नामों पर औपचारिक घोषणा अभी बाकी है। कांग्रेस को भी हाल के महीनों में बीजेपी–JDU खेमे से कुछ जिलास्तरीय संगठनात्मक चेहरे मिले हैं, जो टिकट की उम्मीद में महागठबंधन का हिस्सा बन गए हैं।

नीतीश कुमार और बीजेपी की चिंता

नीतीश कुमार के लिए यह घटना एक बड़ा संकेत है। जेडीयू पहले ही 2020 विधानसभा चुनाव में सीटें गंवा चुकी थी, और अब यदि विधायक पार्टी छोड़ते हैं तो संगठन की साख पर असर पड़ेगा। बीजेपी भी इस स्थिति पर नजर बनाए हुए है। हाल में खबर आई थी कि बीजेपी अपने कई मौजूदा विधायकों का टिकट काट सकती है और “गुजरात फॉर्मूला” अपनाकर नए चेहरे उतार सकती है। इससे कुछ असंतोषग्रस्त नेता महागठबंधन की ओर खिंच सकते हैं।

महागठबंधन का आत्मविश्वास

तेजस्वी यादव इस पलायन को अपने पक्ष में माहौल बनाने का जरिया मान रहे हैं। आरजेडी और कांग्रेस के नेताओं का कहना है कि यह सिलसिला अभी थमेगा नहीं और चुनाव आते-आते बीजेपी–JDU से कई और चेहरे उनकी पंक्ति में शामिल होंगे। विपक्ष इस समय बेरोज़गारी, महंगाई और कानून-व्यवस्था को मुद्दा बनाकर जनता को जोड़ने की कोशिश कर रहा है।

साफ है कि बिहार का चुनावी रणभूमि इस बार “पलायन” और “समायोजन” की राजनीति से भरी होगी। जहाँ बीजेपी–JDU को अपने नेताओं को साधने की चुनौती है, वहीं आरजेडी–कांग्रेस गठबंधन इस स्थिति को भुनाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहा। डॉ. संजीव कुमार का आरजेडी में जाना इसकी शुरुआत भर है — और जैसे-जैसे चुनाव की तारीख नज़दीक आएगी, यह सिलसिला और तेज़ हो सकता है।

 

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