अंतरराष्ट्रीय डेस्क 29 नवंबर 2025
नाइजीरिया इन दिनों एक ऐसी भयावह स्थिति से गुजर रहा है जहाँ अपहरणों की लगातार बढ़ती घटनाओं ने पूरे देश को असुरक्षा की गिरफ्त में ले लिया है। देश के उत्तरी और उत्तर-पश्चिमी इलाकों में हाल के महीनों में सैकड़ों लोगों—स्कूली बच्चों, शिक्षकों, ग्रामीणों और यात्रियों—को एक साथ अगवा कर लिया गया है। राष्ट्रपति बोला टिनुबू की सरकार का दावा है कि इस हिंसा की जड़ें जिहादी संगठनों, खासकर बोको हराम और ISWAP (इस्लामिक स्टेट वेस्ट अफ्रीका प्रांत) से जुड़ी हैं। लेकिन स्थानीय समुदायों, स्वतंत्र पत्रकारों और सुरक्षा शोधकर्ताओं का कहना है कि सरकार वास्तविकता को सरल बनाकर पेश कर रही है, जबकि इन घटनाओं में सबसे बड़ा योगदान सशस्त्र अपराधी गिरोहों, जिन्हें स्थानीय भाषा में “बैंडिट्स” कहा जाता है, का है—जो पैसे के लिए अपहरण को उद्योग बना चुके हैं।
सरकार का तर्क है कि जिहादी तत्व इन बैंडिट गिरोहों को प्रशिक्षण देते हैं, हथियार मुहैया कराते हैं और प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से उनके साथ सहयोग करते हैं। पिछले सप्ताह उत्तरी नाइजर राज्य में एक कैथोलिक स्कूल से 300 से अधिक बच्चों और शिक्षकों का अपहरण इसी बहस के केंद्र में है। यह हालिया घटना तब सामने आई जब कुछ दिन पहले पड़ोसी केब्बी राज्य में 24 छात्राओं का सामूहिक अपहरण हुआ था। इन घटनाओं ने पूरे देश को हिला दिया और राष्ट्रपति टिनुबू को तुरंत सुरक्षा बलों की अतिरिक्त तैनाती, 20,000 नए पुलिसकर्मियों की भर्ती और स्कूलों की सुरक्षा को दुरुस्त करने जैसे कदमों की घोषणा करनी पड़ी।
लेकिन जमीन पर तस्वीर कुछ और है। कई इलाकों में जहां अपहरण हुए, वहाँ के ग्रामीणों का कहना है कि हमलावर “बोको हराम के जिहादी” नहीं थे, बल्कि सालों से सक्रिय स्थानीय हथियारबंद गिरोह थे जो फिरौती वसूलने के लिए लोगों को उठा ले जाते हैं। कई विशेषज्ञ कहते हैं कि नाइजीरिया में हिंसा की प्रकृति बदल चुकी है—जहाँ पहले जिहादी संगठन विचारधारा के लिए लड़ते थे, आज उनके कई धड़े “बैंडिट नेटवर्क” का हिस्सा बन चुके हैं, जिनका मक़सद सिर्फ़ पैसा, जमीन और प्रभाव क्षेत्र पर कब्जा है। इससे पूरा इलाका आतंक और आर्थिक अपराध के मिश्रित चक्र में फंस गया है।
देश के रक्षा प्रमुख जनरल क्रिस मूसा ने यह स्वीकार किया है कि सुरक्षा एजेंसियों को “गलत अथवा अधूरी खुफिया जानकारी” मिल रही है, जिससे ऑपरेशन कमजोर पड़ जाते हैं और अपराधी फ़ायदा उठा लेते हैं। कई ग्रामीण बताते हैं कि हमले रातों-रात नहीं हुए—क्षेत्रों में पहले से हथियारबंद गिरोहों की सक्रियता थी, लेकिन स्थानीय प्रशासन गंभीरता नहीं दिखाता। कई बार पुलिस की संख्या कम होती है, हथियार खराब स्थिति में होते हैं, और कई इलाकों में राज्य की उपस्थिति लगभग गायब-सी महसूस होती है।
इन अपहरणों ने देश भर में सामाजिक और मानसिक संकट भी पैदा कर दिया है। ग्रामीण बच्चे स्कूल जाने से डरते हैं, माता-पिता अपने बच्चों को हॉस्टल भेजने से परहेज कर रहे हैं, चर्चों और मस्जिदों की सुरक्षा बढ़ानी पड़ रही है। कई परिवार महीनों तक फिरौती के लिए जूझते हैं, अपनी ज़मीन, घर और मवेशी बेचकर अपहरणकर्ताओं को भुगतान करते हैं—और यह सिलसिला फिर उसी क्षेत्र में नए अपराध को जन्म देता है।
विद्वान और सुरक्षा विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि नाइजीरिया केवल सैन्य उपायों से इस संकट से नहीं निकल सकता। दीर्घकालिक समाधान में जंगलों में बसे गिरोहों की सफाई, गरीबी और बेरोजगारी की जड़ों पर प्रहार, स्थानीय समुदायों की सुरक्षा इकाइयों को मज़बूत करना, तथा सीमा पार हथियारों की तस्करी पर रोक शामिल है। जब तक यह सब नहीं होता, अपहरणों का यह उद्योग चलता रहेगा—और सरकार चाहे इसे आतंकवाद कहे या संगठित अपराध, पीड़ा झेलने वाले नागरिकों के लिए दोनों का परिणाम एक जैसा ही है।
नाइजीरिया के सामने आज सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या वह असल चुनौती को पहचानकर उससे निपट पाएगा, या राजनीतिक बयानबाज़ी के बीच यह देश अपहरण और आतंक के इस काले चक्र में और गहराई तक फँसता जाएगा?




