अंतरराष्ट्रीय डेस्क 22 नवंबर 2025
नाइजीरिया के नाइजर राज्य में स्थित सेंट मैरी स्कूल पर शुक्रवार तड़के हुए सशस्त्र हमले ने पूरे देश को झकझोर दिया है। हथियारबंद हमलावरों ने स्कूल परिसर में घुसकर 303 छात्रों और 12 शिक्षकों सहित कुल 315 लोगों का अपहरण कर लिया, जिससे यह घटना देश के इतिहास के सबसे बड़े सामूहिक अपहरणों में शामिल हो गई है। शुरुआत में 215 बच्चों के अगवा होने की खबर आई थी, लेकिन बाद में ईसाई संगठनों और प्रशासन द्वारा सत्यापन के बाद संख्या में भारी वृद्धि की पुष्टि हुई। यह संख्या 2014 में कुख्यात चिबोक स्कूल से अगवा की गई 276 लड़कियों की घटना को भी पीछे छोड़ती दिख रही है, जिसने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आक्रोश पैदा किया था।
स्थानीय पुलिस के अनुसार, हमलावर रात करीब 2 बजे स्कूल में घुसे, जब अधिकांश छात्र हॉस्टल में सो रहे थे। हमले की अचानकता और तेजी ने किसी भी प्रकार के प्रतिरोध की संभावना खत्म कर दी। कई अभिभावक और परिवारजन घटनास्थल पर पहुंचे तो हालात देखकर बदहवास हो गए। एक महिला, जिसकी छह और तेरह साल की दो भतीजियां इस घटना में अगवा हो गईं, रोते हुए बोली—“मैं बस चाहती हूँ कि वे घर लौट आएं।” वहीं एक अन्य अभिभावक ने कहा कि “सब सदमे में हैं… किसी को इसका अंदेशा नहीं था।” पुलिस और सुरक्षा बलों ने आसपास के जंगलों में कॉम्बिंग ऑपरेशन शुरू कर दिया है, क्योंकि अपहरणकर्ता आमतौर पर पीड़ितों को जंगलों में छिपाते हैं।
नाइजर राज्य प्रशासन ने एक चौंकाने वाला दावा किया है कि स्कूल को पहले ही सुरक्षा अलर्ट जारी कर बोर्डिंग सुविधा बंद करने का आदेश दिया गया था, लेकिन उसने निर्देशों का पालन नहीं किया, जिससे छात्र और कर्मचारी अनावश्यक जोखिम में पड़े। हालांकि स्कूल प्रशासन ने इस आरोप पर कोई टिप्पणी नहीं की है। यह क्षेत्र हाल के महीनों में लगातार हमलों की चपेट में रहा है—सप्ताह भर में यह तीसरा सामूहिक अपहरण है। इससे पहले सोमवार को पड़ोसी केब्बी राज्य में एक बोर्डिंग स्कूल से 20 से अधिक मुस्लिम छात्राओं का अपहरण किया गया था, और क्वारा राज्य में एक चर्च पर हमले में दो लोग मारे गए और 38 लोगों को किडनैप कर लिया गया।
नाइजीरिया में वर्षों से अपराधी गिरोहों—जिन्हें स्थानीय तौर पर “बैंडिट्स” कहा जाता है—द्वारा फिरौती के लिए अपहरण एक बड़ी समस्या बन चुका है। भले ही फिरौती भुगतान को गैरकानूनी घोषित कर दिया गया है, लेकिन इसका प्रभाव नगण्य साबित हुआ है। उधर, बढ़ती असुरक्षा को लेकर देशभर में आक्रोश उबल रहा है। नागरिक सरकार पर आरोप लगा रहे हैं कि बच्चों और समुदायों को सुरक्षा देने में प्रशासन पूरी तरह विफल रहा है। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए राष्ट्रपति बोला टिनुबू ने अपने विदेशी दौरों, जिनमें इस सप्ताह दक्षिण अफ्रीका में होने वाला G20 शिखर सम्मेलन भी शामिल था, रद्द कर दिए हैं। केंद्र सरकार ने 40 से अधिक फेडरल कॉलेज बंद करने और कई राज्यों में स्कूलों को अस्थायी रूप से बंद करने का आदेश दिया है।
इस अपहरण का एक अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक पहलू भी उभरकर सामने आया है। अमेरिकी दक्षिणपंथी समूहों और पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया है कि नाइजीरिया में ईसाइयों पर व्यवस्थित उत्पीड़न हो रहा है। ट्रंप ने तो यहाँ तक कहा कि यदि नाइजीरियाई सरकार “ईसाइयों की हत्या रोकने में असफल रही” तो वे सेना भेज देंगे। नाइजीरियाई सरकार ने इन दावों को “हकीकत का भयावह तोड़-मरोड़” करार देते हुए स्पष्ट किया कि आतंकी समूह मुसलमानों, ईसाइयों और बिना धर्म वाले सभी लोगों को निशाना बनाते हैं, और अधिकांश हमले मुस्लिम बहुल उत्तरी क्षेत्रों में होते हैं, जहाँ सबसे ज्यादा पीड़ित भी मुस्लिम ही हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि कई जगहों पर किसान–चरवाहा संघर्ष भी संसाधनों जैसे जमीन और पानी को लेकर होता है, न कि धर्म पर आधारित।
2014 के चिबोक कांड ने वैश्विक अभियान शुरू कर दिया था, जिसमें तत्कालीन अमेरिकी प्रथम महिला मिशेल ओबामा तक शामिल हुई थीं। कई छात्राएं वर्षों बाद भाग निकलने या रिहा होने में सफल हुईं, लेकिन आज भी करीब 100 लड़कियां लापता हैं। अब सेंट मैरी स्कूल अपहरण ने पुराने जख्म फिर से हरे कर दिए हैं और दुनिया को याद दिलाया है कि नाइजीरिया में सुरक्षा संकट न सिर्फ कायम है बल्कि और अधिक भयावह रूप ले रहा है। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि क्या सुरक्षा बल इतने बड़े पैमाने पर हुए अपहरण पीड़ितों को सुरक्षित वापस ला पाएंगे या यह घटना भी लंबे संघर्ष और त्रासदी की नई शुरुआत साबित होगी।




