अमनप्रीत । चंडीगढ़ 21 नवंबर 2025
दिल्ली की हर सर्दियों में बिगड़ती हवा अब सिर्फ राजधानी की समस्या नहीं रही, बल्कि पूरे उत्तर भारत के पर्यावरण के लिए एक गंभीर चुनौती बन गई है। लेकिन इस बार पंजाब के कई गांवों ने मिलकर एक बड़ी और सकारात्मक पहल शुरू की है। पराली जलाने की पुरानी परंपरा, जो दिल्ली तक जहरीला धुआँ भेजती थी, अब तेज़ी से कम होती दिख रही है। संगरूर जिले के बलवार कलां जैसे गांव इस बदलाव के प्रतीक बन गए हैं, जहां किसान अपनी फसलों का अवशेष जलाने के बजाय उसे इकट्ठा करके फैक्ट्रियों को भेज रहे हैं।
25 वर्षीय किसान दलबीर सिंह बताते हैं कि पराली जलाने से सबसे पहले उन्हें खुद धुएँ का सामना करना पड़ता था, जो स्वास्थ्य के लिए हानिकारक और खेतों के लिए भी नुकसानदायक था। अब वे पराली को इकट्ठा कर बॉयलरों और उद्योगों को बेचते हैं, जहां इसे ऊर्जा उत्पादन के लिए इस्तेमाल किया जाता है। इससे न सिर्फ प्रदूषण कम हो रहा है, बल्कि किसानों को अतिरिक्त आय भी मिल रही है। फगुवाला गांव के 53 वर्षीय किसान गुरनैब सिंह इससे भी आगे बढ़ गए हैं—उन्होंने पराली से कार्डबोर्ड बनाने की फैक्ट्री शुरू कर दी है। यह न सिर्फ पर्यावरण-सुरक्षा का काम कर रही है, बल्कि स्थानीय लोगों के लिए रोजगार का स्रोत भी बन चुकी है।
पंजाब के 800 से अधिक गांवों में किसान अब बॉयलर मशीनों, बेलर टेक्नोलॉजी और रीसाइक्लिंग यूनिट्स का उपयोग कर रहे हैं। पराली को फैक्ट्रियों में भेजकर बायोगैस, बायो-फर्टिलाइज़र, कार्डबोर्ड और अन्य उपयोगी उत्पाद बनाए जा रहे हैं। यह परिवर्तन अकेले किसानों के प्रयासों से नहीं, बल्कि उद्योग संगठन CII की सहयोगी भूमिका से भी संभव हो रहा है, जो मशीनें और संसाधन उपलब्ध करा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह मॉडल पराली प्रबंधन का एक स्थायी समाधान बन सकता है, बशर्ते यह पहल और बड़े पैमाने पर फैलाई जाए और किसानों को निरंतर प्रोत्साहन दिया जाए।
परंतु यह लड़ाई आसान नहीं है। पंजाब में करीब 12,000 गांव हैं और पराली जलाने की प्रथा पंजाब तक सीमित नहीं—हरियाणा, उत्तर प्रदेश और राजस्थान में भी यह समस्या बड़े पैमाने पर देखी जाती है। नवंबर माह में धान कटाई और गेहूं बुवाई के बीच का छोटा सा अंतराल किसानों को तेजी से खेत खाली करने पर मजबूर करता है, और कटे हुए खेतों को आग लगा देना कई दशकों से आसान उपाय रहा है। इसी वजह से हर साल दिल्ली का AQI खतरनाक स्तर 400 तक पहुंचता है, जिससे स्कूल बंद होते हैं, निर्माण कार्य रुकता है और लोगों को मास्क पहनकर घरों से निकलना पड़ता है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार दुनिया की 99% आबादी ऐसी हवा में सांस ले रही है, जो उनके स्वास्थ्य मानकों पर खरी नहीं उतरती। भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश और थाईलैंड जैसे देशों में वायु प्रदूषण अब एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट बन चुका है। दिल्ली, ढाका और जकार्ता जैसे महानगर हर वर्ष धुंध में घिर जाते हैं, और लाखों लोग सांस संबंधी बीमारियों से पीड़ित होते हैं।
ऐसे में पंजाब के गांवों में दिख रहा यह परिवर्तन उम्मीद जगाता है। पराली अब खेतों में आग लगाने का कारण नहीं, बल्कि उपयोगी संसाधन बन रही है। रोजगार बढ़ रहा है, उद्योग विकसित हो रहे हैं, और हवा साफ करने में एक वास्तविक प्रयास दिख रहा है। पर्यावरण विश्लेषकों का मानना है कि अगर सरकार, उद्योग और किसान मिलकर इस मॉडल को बड़े पैमाने पर लागू करें, तो उत्तर भारत की हवा में हर साल फैलने वाला ज़हर काफी हद तक कम किया जा सकता है। दिल्ली की हवा बचाने की लड़ाई अब केवल कागज़ी योजना नहीं रह गई—पंजाब के खेतों में यह बदलाव जमीन पर उतर रहा है।




