नई दिल्ली 4 सितम्बर 2025
एनडीए के सहयोगी दलों के बीच तालमेल को लेकर उत्तर प्रदेश की सियासत में नई हलचल मच गई है। यूपी सरकार में मंत्री और निषाद पार्टी के मुखिया संजय निषाद ने साफ शब्दों में कहा है कि गठबंधन की संरचना ऐसी होनी चाहिए जिसमें छोटे- छोटे मसलों के लिए हर बार अमित शाह या योगी आदित्यनाथ के दरवाजे खटखटाने की जरूरत न पड़े। उन्होंने यह तीखा बयान देते हुए एनडीए में एक केंद्रीय समन्वयक नियुक्त करने की खुली मांग कर दी। राजनीतिक गलियारों में इसे भाजपा नीत गठबंधन में असंतोष की गूंज के तौर पर देखा जा रहा है।
“हम हर बार योगी और शाह के पास नहीं जा सकते” – सत्ता सहयोगियों की नाराज़गी
संजय निषाद का यह बयान आक्रोश और बेचैनी को साफ झलकाता है। उन्होंने कहा, एनडीए सरकार विशाल है और इसमें दर्जनों दल जुड़े हैं। लेकिन अगर हर छोटी-छोटी समस्या के लिए हमें सीधे अमित शाह या मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ तक पहुंचना पड़े, तो यह व्यावहारिक नहीं है। निषाद ने तल्खी के साथ कहा कि सरकार और गठबंधन को मजबूत बनाए रखने के लिए बीच में एक जिम्मेदार व्यक्ति होना चाहिए जो सभी सहयोगियों की आवाज शीर्ष नेतृत्व तक पहुंचा सके।
भाजपा पर दबाव की रणनीति – छोटे दलों का बढ़ता दबदबा
निषाद पार्टी प्रमुख का यह बयान महज़ शिकायत नहीं है, बल्कि भाजपा पर दबाव बनाने की रणनीति है। छोटे और क्षेत्रीय दल अब भूमिका तलाश रहे हैं जहां वे महज “सहयोगी” नहीं बल्कि “निर्णायक सहयोगी” बनकर खड़े हों। निषाद ने संकेत दिया कि अगर सामंजस्य और संवाद की कमी रही, तो यह एनडीए की जमीनी पकड़ को कमजोर कर सकता है। यह साफ संदेश है कि भाजपा को सिर्फ अपनी संगठनात्मक ताकत पर नहीं, बल्कि सहयोगियों की नब्ज पर भी बराबर ध्यान देना होगा।
विपक्ष को मौका! – गठबंधन की दरारों पर नजर
राजनीतिक पंडित मानते हैं कि संजय निषाद के ये शब्द विपक्ष के लिए किसी राजनीतिक हथियार से कम नहीं। जिस लहजे में निषाद ने एनडीए समन्वयक की मांग रखी है, उससे यह साफ जाहिर होता है कि भीतरखाने सबकुछ उतना सहज नहीं चल रहा। समाजवादी पार्टी और कांग्रेस जैसी विपक्षी ताकतें इन बयानबाज़ियों को गठबंधन की दरारें दिखाने के लिए निश्चित ही इस्तेमाल करेंगी।
गठबंधन की असली परीक्षा – 2027 का नजरिया
आखिरकार सवाल उठता है कि क्या भाजपा नेतृत्व अपने सहयोगियों की इन तल्ख आवाज़ों को नजरअंदाज कर देगा या गंभीरता से लेकर कोई ठोस कदम उठाएगा? संजय निषाद की मांग सिर्फ एक पद या समन्वयक तक सीमित नहीं है, यह एनडीए में संवाद और सत्ता साझेदारी की गहरी खाई को उजागर करती है। उत्तर प्रदेश जैसे विशाल राज्य में, जहां जातीय समीकरण और स्थानीय मुद्दे राजनीति की दिशा तय करते हैं, अगर सहयोगी पार्टियों की अनदेखी हुई तो 2027 की लड़ाई पहले ही मुश्किल हो सकती है।
यह बयान सिर्फ एक शिकायत नहीं, बल्कि चेतावनी है कि अगर भाजपा अपने सहयोगियों को आत्मसम्मान और सुनवाई का हक नहीं देगी, तो एनडीए का जहाज़ भीतर से हिलने लगेगा।




