अखलाक अहमद। नई दिल्ली 30 नवंबर 2025
दिल्ली पुलिस की इकोनॉमिक ऑफेंसेज़ विंग (EOW) ने एक बड़े राजनीतिक भूचाल को जन्म देते हुए कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व—सोनिया गांधी, राहुल गांधी, सुमन दुबे, सैम पित्रोदा और कई अन्य के खिलाफ कथित धोखाधड़ी, फर्जीवाड़े और आपराधिक साज़िश के गंभीर आरोपों में एफआईआर दर्ज कर ली है। यह मामला नेशनल हेराल्ड से जुड़ी संदिग्ध वित्तीय लेन-देन और कथित हेराफेरी को लेकर वर्षों से उठती रही कानूनी और राजनीतिक बहस को एक नए मोड़ पर ले आता है। दर्ज एफआईआर IPC की धाराओं 120B/403/406/420 के तहत की गई है, जो आपराधिक षड्यंत्र, संपत्ति का दुरुपयोग, विश्वास का आपराधिक उल्लंघन और धोखाधड़ी जैसे गंभीर अपराधों से संबंधित है।
इस कार्रवाई की नींव उस शिकायत पर रखी गई है, जिसे प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने 3 अक्टूबर 2025 को दिल्ली पुलिस को सौंपी थी। यह शिकायत इसलिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि वर्षों पहले वरिष्ठ नेता डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी द्वारा दायर निजी शिकायत के आधार पर ही नेशनल हेराल्ड मामले में ईडी की प्रारंभिक जांच शुरू हुई थी, लेकिन वह शिकायत कानूनी रूप से कमजोर मानी गई थी। अब, अपनी जांच को मजबूत आधार देने के लिए ईडी ने औपचारिक रूप से दिल्ली पुलिस को धारा 66(2) PMLA के तहत विस्तृत शिकायत भेजी—और उसी शिकायत को आधार बनाकर दिल्ली पुलिस ने एफआईआर दर्ज की है। कानूनी विशेषज्ञ इसे “रणनीतिक कदम” बताते हैं क्योंकि अब मामले में आपराधिक जांच और मनी लॉन्ड्रिंग की जांच समानांतर रूप से आगे बढ़ सकेगी।
गौरतलब है कि नेशनल हेराल्ड केस को विशेष महत्व तब मिला था जब 2018 में वित्त विधेयक (Finance Act) के जरिए पीएमएलए में संशोधन कर सरकार ने निजी शिकायतों के आधार पर भी मनी लॉन्ड्रिंग जांच को मान्यता दे दी थी—और माना जा रहा है कि यह संशोधन विशेष रूप से इसी मामले को ध्यान में रखते हुए किया गया था। अब, ईडी की ताज़ा शिकायत पर दर्ज एफआईआर से यह स्पष्ट हो गया है कि केंद्र सरकार और जांच एजेंसियाँ नेशनल हेराल्ड विवाद को उसके तार्किक निष्कर्ष तक ले जाने के लिए पूरी तरह आक्रामक मोड में हैं।
एफआईआर में दर्ज नामों की लंबी सूची इस बात का संकेत देती है कि जांच केवल कांग्रेस नेतृत्व तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि उन सभी संस्थाओं, कंपनियों और व्यक्तियों की पड़ताल की जाएगी जिनका नेशनल हेराल्ड फंड्स के कथित गलत उपयोग से कोई प्रत्यक्ष या परोक्ष संबंध हो सकता है। इसमें यंग इंडियन कंपनी, एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड (AJL) और अन्य संबंधित संस्थाएँ शामिल हैं। यह मामला एक बार फिर उस राजनीतिक बहस को जीवित कर देता है कि क्या यह एक न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा है या राजनीतिक प्रतिशोध का उदाहरण—हालाँकि कानून और न्यायालय इस बहस से परे केवल तथ्य और साक्ष्यों के आधार पर आगे बढ़ेंगे।
दिल्ली पुलिस की एफआईआर दर्ज होते ही यह स्पष्ट है कि नेशनल हेराल्ड मामला अब अपने सबसे निर्णायक चरण में प्रवेश कर चुका है। कांग्रेस नेतृत्व पर कानूनी दबाव पहले से कहीं अधिक बढ़ने वाला है, वहीं केंद्र सरकार और ईडी इसे भ्रष्टाचार विरोधी लड़ाई के रूप में प्रस्तुत कर सकती हैं। अगले कुछ सप्ताह और महीने भारतीय राजनीति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होंगे क्योंकि यह मामला सिर्फ एक अख़बार या एक कंपनी का नहीं, बल्कि सत्ता, कानून और जवाबदेही के जटिल समीकरणों का बन चुका है।




