एबीसी नेशनल न्यूज | नई दिल्ली | 1 मार्च 2026
ईरान के सुप्रीम लीडर Ali Khamenei की मौत के बाद पूरी दुनिया में कूटनीतिक हलचल तेज हो गई है, लेकिन भारत की चुप्पी ने राजनीतिक बहस को और विवादास्पद बना दिया है। प्रधानमंत्री Narendra Modi ने 1 मार्च 2026 की शाम तक न तो कोई आधिकारिक शोक संदेश जारी किया है और न ही अपने सोशल मीडिया मंच पर इस घटना का उल्लेख किया है। ऐसे समय में जब ईरान ने 40 दिनों के राष्ट्रीय शोक की घोषणा की है और कई देशों की ओर से संवेदना संदेश सामने आ चुके हैं, भारत की ओर से व्यक्तिगत स्तर पर प्रतिक्रिया का अभाव कई सवाल खड़े कर रहा है। भारत और ईरान के रिश्ते ऐतिहासिक रूप से मजबूत रहे हैं, वहीं भारत और इज़राइल के बीच भी रणनीतिक साझेदारी लगातार गहरी हुई है। ऐसे संतुलन के बीच यह चुप्पी राजनीतिक अर्थ निकालने वालों को अवसर दे रही है।
ख़ामेनेई की मौत को ईरान के राजनीतिक और धार्मिक इतिहास का निर्णायक मोड़ माना जा रहा है। ईरानी स्टेट मीडिया के अनुसार तेहरान में लक्षित सैन्य हमले में उनकी मौत हुई। यह हमला ऐसे समय हुआ जब अमेरिका और इज़राइल की संयुक्त कार्रवाई को लेकर क्षेत्र पहले ही तनाव में था। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस घटना को पश्चिम एशिया की स्थिरता के लिए बड़ा झटका बताया जा रहा है। ऐसे संवेदनशील क्षण में भारत जैसे बड़े लोकतंत्र की प्रतिक्रिया पर स्वाभाविक रूप से नजरें टिकी हुई थीं, क्योंकि भारत के ऊर्जा, व्यापार और सामरिक हित इस क्षेत्र से गहराई से जुड़े हैं।
राजनीतिक गलियारों में उठ रहा बड़ा सवाल यही है—क्या प्रधानमंत्री मोदी की चुप्पी रणनीतिक है या अंतरराष्ट्रीय दबाव का संकेत? आलोचकों का कहना है कि अमेरिका के राष्ट्रपति Donald Trump और इज़राइल के साथ भारत के मजबूत संबंधों को देखते हुए सरकार कोई ऐसा संदेश देने से बच रही है जिससे वाशिंगटन असहज हो। हालांकि सरकार की ओर से इस तरह के किसी दबाव की पुष्टि नहीं की गई है, लेकिन विपक्षी दलों ने आरोप लगाया है कि भारत की विदेश नीति अब पहले जैसी स्वतंत्र नहीं दिख रही।
यह मुद्दा इसलिए भी तूल पकड़ रहा है क्योंकि 23 मई 2016 को तेहरान यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने ख़ामेनेई से मुलाकात की थी। उस समय दोनों देशों के बीच चाबहार परियोजना समेत कई रणनीतिक समझौतों पर सहमति बनी थी और संबंधों को नई दिशा देने की बात कही गई थी। ऐसे में जिन दो नेताओं के बीच औपचारिक संवाद रहा हो, उनमें से एक के निधन पर सार्वजनिक शोक संदेश न आना असामान्य माना जा रहा है।
तुलनात्मक रूप से देखें तो मई 2024 में जब ईरान के तत्कालीन राष्ट्रपति Ebrahim Raisi की हेलीकॉप्टर दुर्घटना में मौत हुई थी, तब भारत सरकार ने एक दिन का राजकीय शोक घोषित किया था। प्रधानमंत्री मोदी ने व्यक्तिगत संवेदना व्यक्त की थी। इस बार ऐसा कोई कदम सामने नहीं आया है। यही अंतर विपक्ष को सरकार पर सवाल उठाने का आधार दे रहा है।
विदेश मंत्रालय ने जरूर एक सामान्य बयान जारी कर सभी पक्षों से संयम और कूटनीति की अपील की है, लेकिन उसमें न तो ख़ामेनेई का नाम लिया गया और न ही व्यक्तिगत श्रद्धांजलि दी गई। सरकार के समर्थकों का तर्क है कि मौजूदा अंतरराष्ट्रीय परिस्थिति अत्यंत संवेदनशील है और भारत को अमेरिका, इज़राइल तथा ईरान—तीनों के साथ अपने रणनीतिक हितों को संतुलित रखना है। इसलिए कोई भी सीधा बयान भविष्य की कूटनीतिक स्थिति को प्रभावित कर सकता है।
फिर भी शीर्षक में उठाया गया सवाल राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन चुका है—क्या यह रणनीतिक चुप्पी है या वैश्विक समीकरणों के दबाव का परिणाम? विपक्ष इसे “डर” की राजनीति कह रहा है, जबकि सरकार इसे “जिम्मेदार और संतुलित कूटनीति” बता रही है। फिलहाल तथ्य यही है कि 1 मार्च 2026 तक प्रधानमंत्री मोदी की ओर से ख़ामेनेई की मौत पर कोई सार्वजनिक शोक संदेश जारी नहीं हुआ है। आने वाले दिनों में यदि कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया आती है, तो वह इस पूरे विवाद की दिशा तय कर सकती है।




