दीपावली के पावन पर्व की रौशनी के बीच, मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के अस्पतालों में एक भयावह और दुखद अंधेरा छा गया है। कारण है एक सस्ती, ₹200 की चीनी ‘कार्बाइड गन’ जिसे दुकानों पर खुलेआम और अवैध रूप से बेचा जा रहा था, और जो अब सौ से ज्यादा परिवारों के लिए जीवनभर का अंधकार बन गई है। चिकित्सकों और विशेषज्ञों के अनुसार, इन सस्ती चीनी कार्बाइड गनों में प्लास्टिक पाइप और अत्यंत घातक रासायनिक कार्बाइड का मिश्रण होता है। यह सिर्फ एक खिलौना या पटाखा नहीं, बल्कि एक केमिकल बम है, जो कुछ ही सेकंड में आंखों की रेटिना, कॉर्निया और आस-पास की स्किन तक झुलसा देता है। भोपाल के विभिन्न अस्पतालों में अकेले 125 से अधिक लोग इस ‘गन’ से लगी आंखों की गंभीर चोटों के साथ भर्ती हैं, जिनमें से कई की आंखें पूरी तरह से खराब हो चुकी हैं, और कुछ को अपनी दृष्टि बचाने के लिए कॉर्निया ट्रांसप्लांट जैसे जटिल और महंगे ऑपरेशन की तत्काल आवश्यकता पड़ रही है। यह भयावह घटना देश की सर्वोच्च अदालत के आदेश और ज़मीनी हकीकत के बीच के बड़े अंतर को उजागर करती है, जिसने ‘ग्रीन पटाखों’ की अनुमति दी थी, लेकिन जिसकी आड़ में यह जानलेवा ‘ग्रीन गन’ बेची जा रही थी, जिसने लोगों की आंखें फोड़ दीं।
प्रशासन की विफलता और ठेकेदारों की चुप्पी: ज़हरीले खिलौनों को किसने दी मंज़ूरी?
इस सामूहिक त्रासदी के बाद, प्रशासन, नियामक संस्थाओं और पर्यावरण ठेकेदारों की भूमिका पर गंभीर और तीखे सवाल खड़े हो गए हैं। सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित मानकों के बावजूद, यह अत्यंत घातक और ज़हरीली ‘ग्रीन गन’ बाज़ार में खुलेआम कैसे बेची जा रही थी? किसने इन ज़हरीले खिलौनों को बाज़ार में उतारने की मंज़ूरी दी, और क्यों प्रशासन ने इन जानलेवा उत्पादों की बिक्री पर आँख मूंद ली?
यह घटना स्पष्ट रूप से कानून के पालन में व्यापक भ्रष्टाचार और लापरवाही की ओर इशारा करती है। कहाँ हैं अब वे पर्यावरण और बाल सुरक्षा के ठेकेदार, जो हर साल दीपावली पर हिन्दुओं को ‘प्रदूषण’ का पाठ पढ़ाते हैं? उनकी चुप्पी इस समय एक राजनीतिक और नैतिक विरोधाभास पैदा करती है। यह सवाल अब सिर्फ सुरक्षित पटाखों का नहीं, बल्कि नागरिकों की सुरक्षा के प्रति सरकारी दायित्व का है। डॉक्टरों की चेतावनी साफ है कि “यह गन बच्चों के हाथ में नहीं, मौत के हाथ में है,” फिर भी, भोपाल से लेकर देश के बाकी शहरों तक, प्रशासन को अब जवाब देना होगा कि क्यों हर दीपावली पर ‘सेफ सेलिब्रेशन’ के नाम पर जनता को ज़हर बेचा जाता है?
निष्कर्ष: ‘ग्रीन’ आदेश बना ‘लाल खतरा’ और जनता की आँखों में धूल झोंकने की राजनीति
यह दुखद दीपावली कई परिवारों के लिए आँखों में अंधेरा छोड़ गई है, और सुप्रीम कोर्ट का ‘ग्रीन पटाखे’ का आदेश अब लोगों के लिए एक लाल खतरा बन गया है। इस घटना ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि भारत में सुरक्षा मानकों और उनके कार्यान्वयन के बीच एक विशाल खाई है, जिसका खामियाजा हमेशा आम और गरीब जनता को भुगतना पड़ता है। यह त्रासदी केवल एक दुर्घटना नहीं है, बल्कि सरकारी उदासीनता, प्रशासनिक भ्रष्टाचार और मुनाफाखोरों के गठजोड़ का परिणाम है।
यह गंभीर सवाल पूछना आवश्यक है कि कब तक ‘ग्रीन पटाखे’ के नाम पर जनता की आँखों में धूल झोंकी जाएगी और उनकी जान-माल को खतरे में डाला जाएगा? जब देश की सर्वोच्च अदालत कोई आदेश देती है, तो उसे अक्षरशः और ईमानदारी से लागू करना प्रशासन का पहला और सबसे महत्वपूर्ण कर्तव्य है।
इस कर्तव्य की विफलता के कारण 125 से अधिक लोगों की आँखों की रोशनी खतरे में पड़ गई है। प्रशासन को तत्काल इस जानलेवा ‘कार्बाइड गन’ की बिक्री और निर्माण से जुड़े सभी लोगों के खिलाफ सख्त आपराधिक कार्रवाई करनी चाहिए और प्रभावित परिवारों को पर्याप्त मुआवजा देना चाहिए।




