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पहाड़, प्यार और पहेली: रूसी महिला निना कुटिना की ‘गुफा लव स्टोरी’ का रहस्य

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पहाड़ों में एक अनसुनी शुरुआत

भारत के कर्नाटक राज्य के गोकर्ण क्षेत्र में जब एक रूसी महिला अपनी दो बेटियों के साथ पहाड़ की एक गुफा में रहती हुई मिली, तो यह खबर जंगल की आग की तरह फैल गई। महिला की पहचान 40 वर्षीय निना कुटिना के रूप में हुई, जो आठ साल पहले भारत आई थीं और तब से गोवा व कर्नाटक की सीमाओं के बीच प्रकृति की गोद में रह रही थीं। इस दौरान उन्होंने हर सामाजिक ढांचे से दूरी बना ली—ना बिजली, ना इंटरनेट, ना कोई कानूनी पहचान। उनके साथ थीं उनकी दो बेटियां—प्रेमा (6) और अमा (4)—जिनका जन्म भारत की भूमि पर हुआ, जिनमें से एक का जन्म गुफा में ही हुआ।

निना कहती हैं कि उन्होंने ‘शहरी अशांति’ को त्यागकर ‘प्राकृतिक स्वतंत्रता’ को चुना। झरनों के पास, बारिश के नीचे, सांपों और जानवरों के बीच रहना उन्हें ज़्यादा सुरक्षित और शांतिपूर्ण लगा। उन्होंने मिट्टी से बच्चों को खिलौने बनाना सिखाया, उन्हें कला और प्रकृति के पाठ पढ़ाए। गुफा उनकी दुनिया थी, और पहाड़ उनकी सुरक्षा।

प्यार की कहानी, जिसमें इकरार भी था और तकरार भी

इस पूरी कहानी में रोमांचक मोड़ तब आया जब निना ने यह स्वीकार किया कि उनकी बेटियों के पिता एक इज़राइली व्यापारी हैं—ड्रोर गोल्डस्टीन। यह इज़हार न केवल निजी था, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संवेदनशील भी। ड्रोर ने भारतीय मीडिया से बात करते हुए बताया कि निना गोवा में उनके साथ रहती थीं, लेकिन एक दिन अचानक बिना बताए चली गईं। उनके मुताबिक वे न तो अपनी बेटियों को लेकर नाखुश थे, न ही निना से दूरी चाहते थे, लेकिन अब वह उनकी संयुक्त कस्टडी चाहते हैं।

निना के मुताबिक, उन्होंने ड्रोर से प्रेम किया, लेकिन बाद में उनके संबंध खराब हो गए। यही कारण था कि वह बेटियों को लेकर जंगल की ओर निकल गईं। उनका कहना है कि उन्हें समाज की बजाय प्रकृति पर ज़्यादा भरोसा है। “इंसान खतरनाक होते हैं, सांप नहीं,”—यह उनका साफ-साफ कहना है।

कानून और प्रशासन की टकराहट

हालांकि निना ने प्रकृति को अपना घर बना लिया, लेकिन भारतीय क़ानूनों को अनदेखा नहीं किया जा सकता। उनका बिजनेस वीजा 2017 में समाप्त हो चुका था, लेकिन वे तब भी भारत में अवैध रूप से रह रही थीं। 9 जुलाई 2025 की शाम, जब पुलिस की एक टीम पहाड़ों की नियमित गश्त पर थी, तब उन्हें रामतीर्था पहाड़ की एक गुफा में संदिग्ध हलचल का अंदेशा हुआ। जब टीम गुफा के भीतर पहुंची तो उन्हें निना और उनकी दोनों बेटियां मिलीं।

पुलिस ने उन्हें चेतावनी दी कि वे लैंडस्लाइड और जंगली जानवरों के खतरे में हैं, लेकिन निना ने जवाब दिया, “हमें आदत हो चुकी है।” प्रशासनिक दृष्टि से यह स्थिति जटिल हो गई क्योंकि महिला विदेशी है, उसके पास वैध वीजा नहीं है, और दो मासूम बच्चियां ऐसी जगह रह रही हैं जहां कोई स्वास्थ्य सुविधा या शिक्षा की व्यवस्था नहीं है।

आश्रम, आश्रय और निर्वासन की प्रक्रिया

इसके बाद निना को एक स्थानीय आश्रम में लाया गया, और फिर करवार में महिला निगरानी केंद्र में रखा गया। वहां विदेशी नागरिकों के लिए अस्थायी सुविधा दी गई। भारतीय विदेश मंत्रालय और गृह मंत्रालय ने रूस के दूतावास को इसकी सूचना दी और अब उन्हें वापस रूस भेजे जाने की प्रक्रिया चल रही है।

निना हालांकि अब भी भारत में ही रहना चाहती हैं। वह कहती हैं कि उन्होंने यहां आत्मिक शांति पाई है और बच्चों को प्रकृति से जोड़कर बेहतर भविष्य देना चाहती हैं। लेकिन प्रशासनिक व्यवस्था और बच्चों के मूल अधिकारों को ध्यान में रखते हुए सरकार उन्हें वापस भेजने की तैयारी कर रही है।

एक नई बहस: स्वतंत्रता या सुरक्षा?

निना की यह कहानी आज सिर्फ एक प्रेम प्रसंग या अवैध निवास की गाथा नहीं है, यह एक नई बहस को जन्म देती है—क्या कोई इंसान केवल अपनी इच्छानुसार प्रकृति में रह सकता है? क्या बच्चों को समाज से पूरी तरह काट देना सही है? क्या एक महिला, जिसने सब कुछ त्याग दिया, अपनी आस्था और अपने बच्चों के लिए स्वतंत्र जीवन चुन सकती है?

उनकी कहानी में जंगल है, प्रेम है, विरक्ति है, विरोध है और अंत में वो दुविधा भी है जिसे आधुनिक समाज ‘सिस्टम’ कहता है। शायद यही वजह है कि आज निना कुटिना की ‘गुफा लव स्टोरी’ भारत और रूस दोनों के लिए एक चेतावनी भी है और एक करुणा की पुकार भी।

निना कुटिना की यह गाथा आधुनिक युग में प्राचीन साधना की एक जीवंत मिसाल है। जहां कानून, प्रेम और प्रकृति की सीमाएं एक-दूसरे से टकराती हैं, वहीं निना जैसी महिला यह सवाल छोड़ जाती हैं कि क्या शांति की तलाश में समाज से भागना अपराध है या साहस? अब देखना यह है कि भारत सरकार इस विदेशी महिला और उसकी मासूम बेटियों के साथ इंसानियत और कानून के संतुलन को कैसे साधती है।

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