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डर की राजनीति ज्यादा, कूटनीति कम!

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एबीसी नेशनल न्यूज | नई दिल्ली | 2 मार्च 2026

ईरान पर हमले पर चुप्पी, जवाबी कार्रवाई पर बयान — क्या भारत की कूटनीति संतुलित है?

मध्य पूर्व में भड़के सैन्य संघर्ष ने केवल क्षेत्रीय स्थिरता को नहीं, बल्कि वैश्विक कूटनीति की विश्वसनीयता को भी कठघरे में खड़ा कर दिया है। ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई की लक्षित हत्या के बाद दुनिया भर की राजधानियों से प्रतिक्रियाएँ आईं। लेकिन भारत की प्रारंभिक चुप्पी और बाद में ईरान की जवाबी कार्रवाई पर व्यक्त की गई चिंता ने एक असहज प्रश्न खड़ा कर दिया है — क्या हमारी विदेश नीति सिद्धांत-आधारित है या परिस्थिति-आधारित? विपक्ष भी सवाल पूछ रहा है। सांसद संजय सिंह ने ट्विटर पर लिखा है कि मोदी जी आज क्या हुआ? आपने तो ईरान के राष्ट्रपति की मौत पर राष्ट्रीय शोक घोषित किया था। ईरान के सुप्रीम लीडर खामेनेई की मौत पर शोक का एक ट्वीट करने की आपकी हिम्मत नही हो रही, इसलिये की जिम्मेदार अमेरिका है। देश को ऐसा डरपोक प्रधानमंत्री नही चाहिए जो ट्रम्प की कठपुतली हो।

जब पहला हमला हुआ, तब भारत की ओर से कोई स्पष्ट निंदा या शोक संदेश सामने नहीं आया। परंतु जब ईरान ने जवाबी मिसाइलें दागीं, तब चिंता और संयम की अपील की गई। यह क्रम स्वाभाविक रूप से सवाल खड़ा करता है: क्या प्रतिक्रिया का पैमाना दोनों पक्षों के लिए समान है? यदि अंतरराष्ट्रीय कानून और संप्रभुता हमारे घोषित सिद्धांत हैं, तो क्या वे सार्वभौमिक रूप से लागू होते हैं — या रणनीतिक सुविधा के अनुसार?

कूटनीति में मौन भी एक संदेश होता है। कभी-कभी वह शब्दों से अधिक प्रभावशाली होता है। जब एक देश किसी घटना पर प्रतिक्रिया नहीं देता, तो वैश्विक समुदाय उसे भी एक संकेत के रूप में पढ़ता है। भारत लंबे समय से “रणनीतिक स्वायत्तता” की बात करता आया है। लेकिन रणनीतिक स्वायत्तता और रणनीतिक संकोच में अंतर है। क्या इस बार वह रेखा धुंधली हुई है?

भारत के सामने चुनौतियाँ वास्तविक हैं। अमेरिका और इज़राइल उसके महत्वपूर्ण साझेदार हैं। रक्षा, तकनीक और व्यापार में सहयोग गहरा है। वहीं ईरान ऊर्जा आपूर्ति और क्षेत्रीय संपर्क परियोजनाओं में अहम रहा है। ऐसे जटिल समीकरणों के बीच शब्दों का संतुलन आसान नहीं होता। लेकिन सवाल यह है कि क्या संतुलन का अर्थ चयनात्मक प्रतिक्रिया हो सकता है?

यह केवल विदेश नीति का सवाल नहीं, विश्वसनीयता का सवाल भी है। जब भारत वैश्विक मंचों पर अंतरराष्ट्रीय कानून, संप्रभुता और संवाद की वकालत करता है, तो उससे अपेक्षा की जाती है कि वही सिद्धांत हर परिस्थिति में लागू हों। अन्यथा धारणा बनती है कि ताकतवर देशों के मामले में भाषा बदल जाती है।

आर्थिक आयाम भी कम महत्वपूर्ण नहीं हैं। कच्चे तेल की कीमतें बढ़ रही हैं। खाड़ी में लाखों भारतीय काम कर रहे हैं। क्षेत्रीय अस्थिरता सीधे भारत के हितों को प्रभावित करती है। इसलिए सरकार का प्राथमिक फोकस स्थिरता और नागरिकों की सुरक्षा होना स्वाभाविक है। लेकिन राष्ट्रीय हित और नैतिक स्पष्टता परस्पर विरोधी नहीं होने चाहिए — परिपक्व कूटनीति दोनों के बीच सामंजस्य स्थापित करती है। आज बहस का केंद्र यही है: क्या भारत ने संतुलन साधा है, या उसने जोखिम से बचने की रणनीति अपनाई है? क्या यह विवेकपूर्ण संयम है या अत्यधिक सतर्कता?

विदेश नीति में हर शब्द तौला जाता है, लेकिन कभी-कभी अत्यधिक मौन भी बहस को जन्म देता है। और यही बहस आज देश में तेज हो रही है। प्रश्न किसी व्यक्ति का नहीं, नीति का है। क्या भारत अपने घोषित सिद्धांतों के साथ खड़ा दिख रहा है? यदि उत्तर स्पष्ट नहीं है, तो यह विमर्श आगे भी जारी रहेगा — और होना भी चाहिए।

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