अवधेश कुमार । नई दिल्ली 1 दिसंबर 2025
चुनाव आयोग के कामकाज को लेकर देश में एक नई बहस छिड़ गई है। विवाद की शुरुआत तब हुई जब मतदान केन्द्रों के CCTV वीडियो जारी करने के मुद्दे पर खुद मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने सार्वजनिक मंच से यह कहते हुए नैतिकता का हवाला दिया था कि— “चुनाव आयोग को किसी की माँ, बहू या बेटी का CCTV वीडियो साझा करना चाहिए क्या…?” उनका यह बयान साफ संकेत देता था कि आयोग महिलाओं की निजता, सम्मान और सुरक्षा को लेकर बेहद संजीदा है और किसी भी हाल में संवेदनशील वीडियो सार्वजनिक नहीं किए जाएंगे। उस समय आयोग ने नैतिकता और गोपनीयता का जो ऊँचा मानक स्थापित किया था, अब वही मानक आयोग की कार्यशैली पर सवाल बनकर लौट रहा है।
क्योंकि अब ठीक इसके उलट—‘घर की बहू–बेटियों के नाचते हुए वीडियो’ खुद चुनाव आयोग के आधिकारिक चैनलों से जारी किए जा रहे हैं। ये वीडियो केरल में चल रहे SIR प्रोग्राम के दौरान ‘ब्रेक टाइम’ में चुनावी कर्मचारियों के आराम करते क्षणों के रूप में पेश किए गए, लेकिन सामग्री ऐसी कि जिसने पूरे देश में नैतिकता बनाम व्यवहारिकता की बहस को हवा दे दी। आलोचकों का कहना है कि अगर CCTV फुटेज में सिर्फ मौजूदगी को सार्वजनिक करना महिलाओं की निजता पर हमला है, तो ‘नाचते–झूमते वीडियो’ जारी करना किस आधार पर उचित ठहराया जा सकता है? आखिर यह किसकी अनुमति से हुआ—क्या यह मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की जानकारी और अप्रूवल में हुआ, या बिना सोचे–समझे सोशल मीडिया टीम ने इसे जारी कर दिया?
यही वजह है कि अब विपक्ष, बुद्धिजीवी समुदाय और कई सामाजिक संगठनों का सवाल है कि क्या चुनाव आयोग अपनी ही घोषित नैतिक सीमाओं का पालन कर रहा है? आयोग ने खुद जिस ‘सम्मान और गोपनीयता’ का पाठ देश को पढ़ाया, अब उन्हीं मानकों के उलट सामग्री प्रसारित की जा रही है, जिससे न केवल भ्रम पैदा हुआ है बल्कि आयोग की विश्वसनीयता भी चुनौती के घेरे में है। सवाल यह भी उठ रहा है कि जब चुनाव आयोग किसी भी संवेदनशील दृश्य को जारी करने से पहले हजार बार सोचने की बात करता है, तब ऐसी सामग्री कैसे और क्यों पोस्ट की गई?
रही बात हम जैसे लोगों की—तो न हमें CCTV फुटेज से समस्या है, न ही हमारी माताओं, बहनों और बेटियों के किसी भी मंच पर नृत्य से। सम्मानजनक माहौल में नृत्य संस्कृति का हिस्सा है, पर्व–त्योहारों और खुशी के मौकों का संकेत है। लेकिन मुद्दा नृत्य नहीं है, मुद्दा है दोहरे मापदंडों का। अगर कल आयोग यह कहकर नैतिकता का हवाला दे कि किसी महिला का वीडियो सार्वजनिक नहीं होना चाहिए, और आज वही संस्था नृत्य करते वीडियो जारी करने लगे—तो सवाल पूछना स्वाभाविक है, लोकतांत्रिक भी।
इस पूरे प्रकरण ने चुनाव आयोग को नैतिकता, पारदर्शिता और महिला सम्मान के अपने ही मानदंडों को पुनः परखने की चुनौती दी है। देश को भी यह तय करना होगा कि संस्थाओं से सवाल पूछना विरोध नहीं, बल्कि लोकतंत्र की बुनियादी ज़िम्मेदारी है।




