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मोदी के तानाशाही भरे मोनोपॉली मॉडल से देश बेहाल—राहुल

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महेंद्र सिंह । नई दिल्ली | 5 दिसंबर 2025

देश के एयरपोर्ट्स पर फैली अव्यवस्था, इंडिगो की बड़े पैमाने पर उड़ान रद्दीकरण और हज़ारों यात्रियों की बेबसी ने अब राजनीतिक मोर्चे पर भारी तूफ़ान खड़ा कर दिया है। इस पूरे घटनाक्रम को “सिस्टम की नाकामी” कहकर छोड़ देने को कांग्रेस तैयार नहीं है। विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने इसे सीधे-सीधे मोदी सरकार के “तानाशाही भरे मोनोपॉली मॉडल” की देन बताया है, जिसने देश की अर्थव्यवस्था में प्रतिस्पर्धा की जगह डर, दवाब और कार्पोरेट तानाशाही को बढ़ावा दिया है।

राहुल गांधी ने X पर एक तीखे संदेश के साथ सरकार की आर्थिक दिशा पर सवाल उठाते हुए कहा—
“Choose your India: Play-Fair or Monopoly? Jobs or Oligarchies? Competence or Connections? Innovation or Intimidation? Wealth for many or the few?”
राहुल का यह सवाल सिर्फ़ विमानन संकट तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे आर्थिक मॉडल पर एक गहरी चोट है। उन्होंने कहा कि मोदी सरकार ने एक ऐसा आर्थिक ढांचा खड़ा कर दिया है जहाँ कुछ चुनिंदा कार्पोरेट घरानों के इशारों पर नीतियाँ बनती हैं और पूरा सेक्टर उनके कब्ज़े में चला जाता है।

राहुल ने अपने लेख में इंडिगो की अव्यवस्था को इस “मोनोपॉली मॉडल” का प्रत्यक्ष परिणाम बताते हुए लिखा—
“IndiGo fiasco is the cost of this Govt’s monopoly model. Once again, it’s ordinary Indians who pay the price—in delays, cancellations and helplessness.”
उन्होंने कहा कि यह स्थिति इस बात का प्रमाण है कि जब सरकार बाजार को खुला नहीं रखती, प्रतिस्पर्धा को कुचल देती है और नीति निर्माण को कार्पोरेट दबाव के हवाले कर देती है, तो इसका सबसे बड़ा नुकसान आम नागरिक को झेलना पड़ता है। यह मॉडल विकास नहीं, बल्कि आर्थिक तानाशाही को जन्म देता है।

उधर कांग्रेस के जानी-मानी प्रवक्ता पवन खेड़ा ने भी सरकार की नीतियों पर सीधा हमला बोलते हुए कहा कि आज एयरपोर्ट्स पर दिखाई दे रहा हंगामा—दरअसल, देश में “दो लोगों द्वारा सब कुछ चलाने” का नतीजा है। खेड़ा ने तंज करते हुए कहा—”कहा गया था कि हवाई चप्पल पहनने वाले हवाई जहाज में बैठेंगे, लेकिन आज एयरपोर्ट्स पर यात्रियों और इंडिगो स्टाफ के बीच जूते-चप्पल चल रहे हैं।”
उन्होंने कहा कि देश के तीन बड़े स्तंभ—राजनीति, सरकार और व्यापार—अब बेहद सीमित हाथों में बंधक बन चुके हैं।

खेड़ा ने सख्त शब्दों में चेताया—

“पार्टी दो लोग चलाएँगे, सरकार दो लोग चलाएँगे, व्यापार दो लोग चलाएँगे—तो जो आज हो रहा है, वही होगा।”
उन्होंने यह भी बताया कि भारत के एयरलाइन सेक्टर का 92% हिस्सा सिर्फ़ दो कंपनियों—इंडिगो और टाटा—के हाथ में है, जिससे प्रतिस्पर्धा लगभग खत्म हो चुकी है। उनकी राय में सरकार ने यात्रियों की सुरक्षा बढ़ाने वाली नई गाइडलाइंस इसलिए वापिस ले लीं क्योंकि बड़ी कंपनियों ने दबाव बनाया।

यह पूरा विवाद अब मोदी सरकार के आर्थिक मॉडल पर व्यापक प्रश्न खड़े कर रहा है—क्या भारत की अर्थव्यवस्था प्रतिस्पर्धी है या कुछ हाथों में केंद्रित? क्या नीतियाँ जनता के हित में बन रही हैं या चुनिंदा समूहों की जरूरतों के हिसाब से? राहुल गांधी और पवन खेड़ा दोनों का दावा है कि आज के हालात महज़ इंडिगो की विफलता नहीं दिखाते, बल्कि यह उस खींचतान भरी सांठगांठ का परिणाम है जिसने देश को “मोनोपॉली इंडिया” की ओर धकेल दिया है।

कुल मिलाकर, उड़ानों की देरी, रद्दीकरण और यात्रियों का गुस्सा सिर्फ़ एक परिचालन समस्या नहीं—बल्कि आर्थिक केंद्रीकरण, नीति-निर्माण में कार्पोरेट प्रभाव और लोकतांत्रिक नियंत्रण के कमजोर होने की एक बड़ी चेतावनी है। सवाल अब यह है कि क्या भारत मुक्त, निष्पक्ष और प्रतिस्पर्धी अर्थव्यवस्था की ओर लौटेगा, या फिर यह मोनोपॉली मॉडल हमारा भविष्य तय करेगा?

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