सरोज सिंह । नई दिल्ली 7 दिसंबर 2025
जब लोकतंत्र पर कॉरपोरेट कब्ज़ा हो जाए, तो जनता सिर्फ़ दर्शक बनकर रह जाती है
मोदी सरकार के दस सालों के राजनीतिक और आर्थिक ढांचे को देखें, तो सबसे बड़ा आरोप यही उभरकर सामने आता है—भारत एक ऐसे मॉडल की ओर धकेला जा रहा है जहाँ राजनीतिक सत्ता केंद्रित है, और आर्थिक शक्ति मुट्ठीभर कॉरपोरेट के हाथों में समेट दी गई है। लोकतंत्र का आधार—बहुलता, विकल्प, संतुलन—धीरे-धीरे खत्म होता दिख रहा है। यह शासन व्यवस्था न सिर्फ़ कठोर, केंद्रीकृत और असहमति-विरोधी दिखाई देती है, बल्कि आर्थिक रूप से भी दो–तीन बड़े उद्योगपतियों पर आधारित एक ऐसे ढांचे में बदलती जा रही है जिसे अर्थशास्त्र की भाषा में “ओलिगार्की” और राजनीतिक भाषा में “तानाशाही प्रवृत्ति” कहा जाता है।
भारत वह देश था जहाँ हर क्षेत्र में दर्जनों प्रतिस्पर्धी कंपनियाँ थीं—लेकिन आज स्थिति यह है कि बंदरगाह में अडानी, एयरपोर्ट में अडानी, ऊर्जा में अडानी, मीडिया में अडानी-अंबानी, टेलीकॉम में जियो–एयरटेल, ई-कॉमर्स में अमेज़न–फ्लिपकार्ट, डिजिटल पेमेंट में गूगल–फोनपे, राइड–हेलिंग में उबर–ओला, सिनेमा में PVR–INOX, और क्विक कॉमर्स में ब्लिंकिट–ज़ेप्टो हावी हैं। यह वह तस्वीर है जहाँ हर सेक्टर को एक–दो खिलाड़ियों के हवाले कर दिया गया है, और बाज़ार की प्रतिस्पर्धा—जो किसी भी स्वस्थ अर्थव्यवस्था की रीढ़ होती है—लगभग खत्म हो चुकी है।
जब सरकार के नीतिगत फैसले उन्हीं गिने-चुने घरानों के पक्ष में दिखने लगें, तो जनता यह सवाल पूछने लगती है कि क्या सरकार का लक्ष्य आर्थिक विविधता है, या आर्थिक केंद्रीकरण?
राजनीतिक स्थिति भी कम चिंताजनक नहीं है। लोकतंत्र की संस्थाओं—चुनाव आयोग, CBI, ED, IT, मीडिया—पर विपक्ष के आरोप लगातार बढ़े हैं कि ये संस्थाएँ सत्ता के नियंत्रण में चल रही हैं। आलोचना करने वाले नेताओं पर कार्रवाई होती है, सरकार को चुनौती देने वाली आवाज़ें या तो चुप करा दी जाती हैं या कानूनी जाल में उलझा दी जाती हैं। संसद में विपक्ष की आवाज़ लगातार दबाई जाती है, बिल बिना बहस पास किए जाते हैं, और असहमति को राष्ट्र-विरोधी या षड्यंत्र कहकर खारिज किया जाता है। यह लोकतंत्र की वह अवस्था है जहाँ सरकार बहुमत में नहीं, बल्कि अपरिमित सत्ता में दिखाई देती है।
आम जनता की हालत सबसे खराब है। महंगाई ने घरों का बजट खत्म कर दिया है, बेरोज़गारी ने युवाओं का भविष्य निगल लिया है, और आधा देश 5 किलो मुफ्त राशन के सहारे जीवित है। जब रोज़गार नहीं, आय नहीं, स्वास्थ्य–शिक्षा महंगी, और छोटे व्यवसाय टूट रहे हों—तब जनता स्वाभाविक रूप से पूछती है कि यह ‘विकास’ आखिर किसके लिए है? जिन लोगों के लिए नीतियाँ बननी चाहिए, वे संघर्ष कर रहे हैं; जिनके लिए नीतियाँ बन रही हैं, वे विस्तार और मुनाफ़े की ऊंचाइयों पर पहुँच रहे हैं। यह असमानता किसी सामान्य देश की तस्वीर नहीं, बल्कि एक केंद्रित, कॉरपोरेट-संचालित शासन का संकेत है।
विपक्ष, अर्थशास्त्री और समाज के स्वतंत्र वर्ग लगातार यह कहते आ रहे हैं कि मोदी मॉडल चुनाव जीतने, नरेटिव बदलने, राष्ट्रवाद का भावनात्मक ढांचा खड़ा करने में बेहद सफल है—लेकिन बेरोज़गारी, महंगाई, औद्योगिक विविधता, कृषि संकट और लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वतंत्रता जैसे मामलों में बेहद कमजोर।
और जब सरकार जनता के मुद्दों से ध्यान हटाकर भावनात्मक, प्रतीकात्मक और विवाद आधारित मुद्दों पर फोकस करती है, तो इसका सीधा असर देश की प्राथमिकताओं पर पड़ता है। जो सरकार जनता की नहीं, बल्कि दो–तीन कॉरपोरेट घरानों की प्राथमिकताओं को प्राथमिकता दे—वह लोकतंत्र नहीं, मोनोपॉली-ड्रिवन तंत्र बन जाती है।
अंत में सवाल यही है— क्या भारत लोकतांत्रिक अर्थव्यवस्था से हटकर कॉरपोरेट तानाशाही की दिशा में बढ़ रहा है? यदि राजनीति एक व्यक्ति पर केंद्रित हो जाए, और अर्थव्यवस्था दो–तीन कंपनियों पर—तो लोकतंत्र सिर्फ़ नाम का रह जाता है। और आज भारत एक बेहद खतरनाक सीमारेखा पर खड़ा है—जहाँ जनता तय करेगी कि वह विविधता वाला लोकतंत्र चाहती है, या केंद्रीकृत मोनोपॉली-तंत्र। क्योंकि “मोदी मतलब तानाशाही और मोनोपॉली सरकार” सिर्फ़ एक वाक्य नहीं—एक चेतावनी है।




