ओपिनियन/ राजनीति | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 2 अप्रैल 2026
आम आदमी पार्टी ने अपने युवा चेहरे और राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा को संसद के उच्च सदन में उपनेता पद से हटा दिया है। उनकी जगह पंजाब के सांसद अशोक मित्तल को यह जिम्मेदारी सौंपी गई है। पार्टी ने राज्यसभा सचिवालय को पत्र लिखकर न सिर्फ यह बदलाव बताया, बल्कि साफ कहा कि अब चड्ढा को पार्टी की ओर से बोलने का समय भी न दिया जाए। यह फैसला इतना अचानक और बिना किसी सार्वजनिक स्पष्टीकरण के आया कि राजनीतिक हलकों में हलचल मच गई है। सवाल उठ रहा है—क्या राघव चड्ढा को संसद में उन जनमुद्दों को जोरदार ढंग से उठाने की सजा मिली है जो सीधे तौर पर सत्ताधारी BJP के करीबी माने जाने वाले कारपोरेट घरानों—अडानी और अंबानी—की जेब पर वार की तरह थे? हकीकत यह है कि चड्ढा ने एयरपोर्ट पर महंगे पानी की बोतल, चाय, कॉफी और समोसे जैसे मुद्दों को उठाकर लाखों यात्रियों की आवाज बुलंद की थी, गिग वर्कर्स की दयनीय स्थिति पर सवाल खड़े किए थे और मोबाइल रिचार्ज के 28 दिनों के चक्र को बेनकाब करते हुए कहा था कि सर्विस प्रोवाइडर्स 12 महीने में 13 महीने का पैसा वसूलते हैं। ये मुद्दे आम आदमी की रोजमर्रा की पीड़ा थे, लेकिन इन्होंने बड़े-बड़े कारोबारी हितों को छू लिया था। ऐसे में क्या ये माना जाए कि प्रधानमंत्री के दोस्तों की जेब पर वार करने की उन्हें सज़ा दी गई है? और ये “मोदी – केजरी भाई भाई” टाइप की प्लानिंग का हिस्सा है? इसे इस प्रकार समझते हैं…
राघव चड्ढा लंबे समय से AAP के प्रमुख युवा नेता रहे हैं और अरविंद केजरीवाल के करीबी माने जाते थे। लेकिन हाल के महीनों में उनकी संसदीय गतिविधियां पार्टी के अंदर एक नई बहस खड़ी कर चुकी थीं। दिसंबर 2024 और जनवरी-मार्च 2026 के बीच चड्ढा ने राज्यसभा में बार-बार उन मुद्दों को उठाया जो सीधे उपभोक्ताओं के हितों से जुड़े थे। एयरपोर्ट पर पानी की बोतल 100 रुपये, चाय 200-250 रुपये और समोसा 350 रुपये तक कीमत पर बिकने का मुद्दा उन्होंने संसद में रखा। उन्होंने कहा कि “इकोनॉमी क्लास अब इकोनॉमिकल नहीं रही”। सरकार को इस पर Udaan Yatri Cafe जैसी योजना शुरू करनी पड़ी, जिसमें 10 रुपये का पानी, 20 रुपये की चाय-कॉफी और समोसे उपलब्ध कराए गए। यह बदलाव चड्ढा की आवाज का सीधा नतीजा था। लेकिन क्या यह संयोग था कि एयरपोर्ट्स का संचालन और पार्किंग कॉन्ट्रैक्ट्स कई जगहों पर उन कारोबारियों के नियंत्रण में हैं जिन्हें सत्ता से करीबी माना जाता है? चड्ढा ने बिना नाम लिए भी सिस्टम की लूट को बेनकाब किया, जो असुविधा झेल रहे आम यात्री की जेब काट रही थी।
इसी तरह गिग वर्कर्स का मुद्दा चड्ढा ने संसद में बेहद मजबूती से उठाया। Zomato, Swiggy और Blinkit जैसे प्लेटफॉर्म्स पर काम करने वाले डिलीवरी पार्टनर्स को “हेलमेट पहने बंधक” कहते हुए उन्होंने 10 मिनट डिलीवरी मॉडल की आलोचना की। कम वेतन, कोई सोशल सिक्योरिटी नहीं, जान जोखिम में डालकर काम—ये सब उन्होंने संसद के रिकॉर्ड पर दर्ज कराए। उन्होंने मांग की कि इन वर्कर्स को सम्मान और उचित नियम मिलने चाहिए। यह मुद्दा सीधे उन टेक और क्विक-कॉमर्स कंपनियों पर चोट करता था जो तेजी से बढ़ रही हैं और जिनके मालिकाना हक बड़े कारपोरेट घरानों से जुड़े माने जाते हैं। चड्ढा ने कहा कि रिकॉर्ड ऑर्डर्स का मतलब वर्कर्स की बर्बादी नहीं होना चाहिए। यह आवाज आम युवा और मध्यम वर्ग की थी, जो आज गिग इकोनॉमी में फंसा हुआ है।
फिर आता है मोबाइल रिचार्ज का 28 दिन वाला साइकिल। चड्ढा ने संसद में कहा कि अगर प्लान “मंथली” कहलाता है तो उसे 30 या 31 दिन का होना चाहिए, न कि 28 दिन का। इससे यूजर्स को साल में 13 बार रिचार्ज करना पड़ता है—यानी 13 महीने का पैसा 12 महीने में। Reliance Jio, Airtel और Vi जैसे बड़े खिलाड़ी इस प्रैक्टिस से फायदा उठा रहे थे। चड्ढा की इस चोट के बाद सरकार ने टेलीकॉम कंपनियों को 30 दिन वाले प्लान प्रमोट करने को कहा। यह मुद्दा सीधे करोड़ों प्रीपेड यूजर्स की जेब से जुड़ा था और उन कंपनियों की कमाई पर सवाल उठाता था जिनमें अंबानी समूह की Jio प्रमुख है। चड्ढा ने इन मुद्दों को “रेडिट सभा” की तरह संसद में लाकर आम आदमी की शिकायतों को मुख्यधारा में ला दिया था।
अब सवाल यह है कि जब राघव चड्ढा इन जनमुद्दों को इतनी ताकत से उठा रहे थे, तभी AAP ने उन्हें उपनेता पद से हटा दिया और बोलने का समय भी रोक दिया। पार्टी ने कोई आधिकारिक वजह नहीं बताई। सूत्र कहते हैं कि आंतरिक मतभेद थे, चड्ढा कुछ पार्टी कार्यक्रमों से दूर रहे थे। लेकिन क्या यह सिर्फ संयोग है कि उनके मुद्दे ठीक उन क्षेत्रों को छू रहे थे जहां सत्ता और बड़े कारपोरेट के हित आपस में गुथे हुए दिखते हैं? अशोक मित्तल—Lovely Professional University के संस्थापक और पंजाब से सांसद—को नई जिम्मेदारी देकर पार्टी नई रणनीति और शक्ति संतुलन की बात कर रही है। लेकिन सच यह है कि चड्ढा की आवाज आम आदमी की थी—एयरपोर्ट, गिग वर्क और मोबाइल बिलिंग जैसे मुद्दे हर घर तक पहुंचते हैं। अगर AAP जैसी पार्टी, जो खुद “आम आदमी” की पार्टी कहलाती है, अपने ऐसे नेता को साइडलाइन कर रही है तो सवाल उठता है—क्या संसद में सच्चे जनमुद्दे उठाना अब सजा का सबब बन गया है? क्या यह फैसला सिर्फ आंतरिक बदलाव है या बड़े हितों के सामने झुकने का संकेत? आने वाले दिनों में यह साफ होगा कि राघव चड्ढा का सियासी सफर कहां जाता है—लेकिन फिलहाल यह स्पष्ट है कि उन्होंने वो मुद्दे उठाए जो सच में आम आदमी को छूते थे, भले ही उनकी कीमत उन्हें चुकानी पड़े।




