प्रो. शिवाजी सरकार, अर्थशास्त्री | नई दिल्ली | 13 मार्च 2026
कहा जाता है कि अगर सही समय पर सही जानकारी न दी जाए तो अपने समर्थक भी धीरे-धीरे आलोचक बन जाते हैं। आज एशिया के सामने कुछ वैसी ही स्थिति दिखाई दे रही है। हाल के खाड़ी क्षेत्र के तनाव और उससे जुड़ी खबरों ने भारत को जिस तरह झकझोरा है, उसने एक बड़ी सच्चाई सामने ला दी है—कभी-कभी संकट असली कमी से नहीं, बल्कि गलत संदेश से पैदा होता है।
भारत में पिछले कुछ दिनों से पेट्रोलियम और एलपीजी को लेकर जो घबराहट देखी गई, वह पूरी तरह वास्तविक कमी की कहानी नहीं थी। कुछ जगहों पर सप्लाई का दबाव जरूर रहा होगा, लेकिन पूरे देश में कोई ऐसा बड़ा संकट नहीं था जैसा माहौल बन गया। असल समस्या थी—गलत समय पर दी गई अधूरी और अस्पष्ट जानकारी। जब औद्योगिक और व्यावसायिक उपभोक्ताओं के लिए एलपीजी आपूर्ति सीमित करने की सलाह सामने आई, तो लोगों ने इसे संभावित संकट का संकेत मान लिया।
फिर क्या था। खबर तेजी से फैल गई। होटल, ढाबे, स्कूलों की कैंटीन, छोटे खाने-पीने के ठेले, यहां तक कि अयोध्या मंदिर में प्रसाद बनाने वाली रसोइयों तक को चिंता होने लगी कि कहीं गैस बंद न हो जाए। चेतावनी पहले फैल गई और स्पष्टीकरण बाद में आया। परिणाम यह हुआ कि लोगों ने सिलेंडर जमा करना शुरू कर दिया, काले बाजार में कीमतें बढ़ने लगीं और होटल-रेस्टोरेंट कारोबार पर सीधा असर पड़ा। अनुमान है कि केवल रेस्टोरेंट उद्योग को ही रोज़ 1200 से 1300 करोड़ रुपये तक का नुकसान होने लगा।
स्थिति तब और जटिल हो गई जब यह खबर फैली कि विदेश मंत्री एस. जयशंकर की ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अरागची से बातचीत के बाद भारत के लिए हॉर्मुज जलडमरूमध्य खोल दिया गया है। लेकिन ईरान ने ऐसी खबरों से साफ इनकार कर दिया। इसी बीच यह भी सामने आया कि लगभग 28 भारतीय जहाज और 778 भारतीय नाविक उसी समुद्री मार्ग में फंसे हुए हैं। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर सच्चाई क्या है और भारत को क्या संदेश दिया जा रहा है।
इतिहास बताता है कि 1914 के बाद एशिया को प्रभावित करने वाले अधिकांश युद्ध यूरोप और अमेरिका की शक्ति राजनीति से जुड़े रहे हैं। आज का संघर्ष भी उसी तरह की छाया लिए हुए है। लेकिन अब एशिया के देश पहले जैसे नहीं हैं। ईरान, अफगानिस्तान और दूसरे देश अपनी भूमिका निभाएंगे। ऐसे समय में भारत को केवल दर्शक नहीं बल्कि नेतृत्व की भूमिका निभानी होगी। और इस नेतृत्व की सबसे बड़ी ताकत होगी—स्पष्ट और भरोसेमंद संवाद।
भारत के लिए यह समय साफ सोच और जिम्मेदार नेतृत्व दिखाने का है। ऊर्जा से जुड़ी परेशानियों का असर अब उद्योगों, होटलों और छोटे कारोबारों तक पहुंच चुका है। पेट्रोलियम पर अत्यधिक निर्भरता पहले ही चिंता का विषय है। ऊपर से गलत संदेशों ने स्थिति को और उलझा दिया। एक ऐसा दबाव जिसे संभाला जा सकता था, वह अब अरबों रुपये की आर्थिक चिंता बन गया है।
असल बात यह है कि सप्लाई चेन केवल ईंधन और सामान से नहीं चलती, बल्कि भरोसे से भी चलती है। अगर कारोबारी को यह डर लग जाए कि कल सिलेंडर नहीं मिलेगा, तो वह आज ही अपना काम सीमित कर देता है। इस तरह एक गलत संदेश खुद वही संकट पैदा कर देता है जिसे रोकने के लिए वह जारी किया गया था। यही कारण है कि युद्ध से पहले एलपीजी की बुकिंग 55.7 लाख थी, जो अब बढ़कर 75.7 लाख तक पहुंच गई।
वित्तीय बाजार भी इसी मनोविज्ञान पर काम करते हैं। बाजार केवल आंकड़ों पर नहीं बल्कि संकेतों और भरोसे पर प्रतिक्रिया देता है। किसी बड़े अधिकारी का एक गलत बयान कुछ ही मिनटों में अरबों रुपये का नुकसान करा सकता है। इसलिए बाजार से जुड़े बयान हमेशा बेहद सावधानी से दिए जाते हैं।
हाल की घटनाओं में भी यही देखने को मिला। कई जगह गैस वितरकों ने अचानक कीमतें बढ़ा दीं। कुछ ने तय दर से कम पर सिलेंडर देने से मना कर दिया। देखते ही देखते काले बाजार का खेल शुरू हो गया। इसके साथ ही प्रशासन ने कई जगह व्यावसायिक प्रतिष्ठानों को चेतावनी दी कि अगर सिलेंडरों का ‘अनधिकृत’ उपयोग हुआ तो कार्रवाई होगी। ऐसे समय में कुछ अधिकारियों के लिए यह स्थिति “आपदा में अवसर” बन गई, जहां परेशान कारोबारियों से दबाव और वसूली की शिकायतें भी सामने आईं।
धीरे-धीरे यह घबराहट सड़कों तक पहुंच गई। विरोध प्रदर्शन होने लगे और कानून-व्यवस्था पर भी असर पड़ने लगा। निवेशकों को भी नीति में भ्रम दिखाई देने लगा। यही कारण है कि इस साल की शुरुआत से शेयर बाजार स्थिर गति नहीं पकड़ पा रहा है। इसके पीछे ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक अनिश्चितता की चिंता भी एक कारण है।
स्थिति तब और खराब हो जाती है जब अधिकारी समस्या बताने वालों को ही दोष देने लगते हैं। एक वरिष्ठ अधिकारी ने मीडिया से कहा—“घबराहट मत फैलाइए।” लेकिन पत्रकारिता का काम ही है जमीन की हकीकत बताना। अगर लोग कतारों में खड़े हैं या व्यापारी कमी की बात कर रहे हैं, तो मीडिया उसे दिखाएगा ही। मीडिया को चुप रहने को कहना भरोसा नहीं बढ़ाता, बल्कि शक को और बढ़ाता है।
विश्वसनीयता शासन की सबसे बड़ी पूंजी होती है। लेकिन जब अधिकारी सवालों से बचते दिखते हैं तो भरोसे का संकट और गहरा हो जाता है। 11 मार्च को एलपीजी आपूर्ति पर एक अधिकारी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की शुरुआत ही इस वाक्य से की—“कृपया कोई सवाल न पूछें।” संवाद की दुनिया में इससे बड़ी विडंबना क्या हो सकती है? नतीजा साफ था—अफवाहें और तेज हो गईं।
दूसरी तरफ दुनिया के कुछ नेता संवाद की ताकत को समझते हैं। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अक्सर मीडिया के तीखे सवालों का सामना करते हैं। उनके जवाब कभी सख्त होते हैं, कभी अलग तरह के, लेकिन संवाद जारी रहता है। इससे जनता और बाजार दोनों को सरकार की बात सीधे सुनने का मौका मिलता है।
पश्चिम एशिया में तनाव के दौरान जब कच्चे तेल की कीमतें 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गईं, तब ट्रंप के बयान—जिसमें उन्होंने तनाव कम होने की संभावना जताई—से बाजार शांत हो गया और कीमतें करीब 90 डॉलर तक लौट आईं। इससे साफ होता है कि संवाद भी बाजार की दिशा बदल सकता है।
भारत में “नो क्वेश्चन” वाला क्षण इसका उल्टा उदाहरण बन गया। पेट्रोलियम मंत्रालय शायद उत्पादन बढ़ाने का संदेश देना चाहता था, लेकिन लोगों तक संकेत पहुंचा कि गैस की कमी है और नियंत्रण लगाए जा रहे हैं। असल समस्या नीति से ज्यादा संदेश देने के तरीके में है।
इस बीच खबरें आईं कि कतर जैसे बड़े सप्लायर ने एलपीजी की आपूर्ति धीमी कर दी है। लेकिन स्पष्ट जानकारी न मिलने से अफवाहें फैलने लगीं—यहां तक कि पेट्रोल और डीजल की कमी की भी बातें होने लगीं।
संकट के समय संवाद सबसे बड़ा सहारा होता है। संदेश साफ, पारदर्शी और समय पर होना चाहिए। लेकिन अक्सर जानकारी देर से आती है, सवालों से बचा जाता है और खाली जगह अफवाहों से भर जाती है।
भारत ने पहले भी ऐसी स्थितियां देखी हैं—कारगिल युद्ध से लेकर पुलवामा हमले, गलवान घाटी की झड़प और कोविड संकट तक। कई बार संदेश की कमी ने भ्रम को जन्म दिया। जबकि सही समय पर स्पष्ट संवाद बहुत सी परेशानियों को रोक सकता था।
साफ और भरोसेमंद संवाद यह भी समझा सकता था कि एलपीजी पर दबाव कम करने के लिए कम सल्फर वाले डीजल जैसे विकल्प अपनाए जा सकते हैं। अच्छी नीति जरूरी है, लेकिन उसके साथ सही और समय पर जानकारी देना भी उतना ही जरूरी है।
सरकार चलाने के लिए केवल सही फैसले लेना काफी नहीं होता। उन फैसलों को साफ और ईमानदारी से समझाना भी जरूरी होता है। बाजार, उद्योग और आम लोग कठिन परिस्थितियों को भी स्वीकार कर लेते हैं—अगर उन्हें सच्चाई साफ-साफ बता दी जाए। लेकिन वे उस अनिश्चितता को स्वीकार नहीं कर पाते जो चुप्पी, अधूरी जानकारी और उलझे संदेशों से पैदा होती है।
एशिया के लिए यह एक चेतावनी का समय है। आने वाले दौर में वही देश आगे बढ़ेगा जो केवल शक्ति से नहीं, बल्कि सही संवाद और भरोसे से नेतृत्व करेगा।




