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मायावती: ‘दलित राजनीति’ की मसीहा से बीजेपी की ‘B टीम’ तक का सफर

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नई दिल्ली 11 अक्टूबर 2025

मायावती की रणनीति – सत्ताधारी से टकराना नहीं, साध लेना

उत्तर प्रदेश की राजनीति में मायावती कभी दलित सशक्तिकरण की प्रतीक मानी जाती थीं, लेकिन पिछले एक दशक में उनका राजनीतिक व्यवहार यह साफ कर चुका है कि अब उनका मकसद सत्ता में भागीदारी नहीं बल्कि सत्ता पक्ष की नाराजगी से बचाव बन गया है। मायावती का हर चुनावी कदम — हर बयान, हर रुख — इस बात की ओर संकेत करता है कि वह बीजेपी के प्रति टकराव की राजनीति नहीं अपनाना चाहतीं, बल्कि उसे साध कर अपने अस्तित्व को सुरक्षित रखना चाहती हैं।

वजह साफ है — मायावती को केसों और मुकदमों का डर सताता है। उनके खिलाफ आय से अधिक संपत्ति, नोएडा प्लॉट आवंटन और स्मारक निर्माण से जुड़ी कई जांचें वर्षों तक चलीं। उन्हें मालूम है कि अगर उन्होंने सत्ता पक्ष को चुनौती दी, तो वे फाइलें फिर से खुल सकती हैं। यही डर उन्हें सत्ता के खिलाफ नहीं, बल्कि सत्ता के प्रति नरम बनाता है।

कांग्रेस के दौर में बंद हुए केस — मायावती के लिए सीख और सुरक्षा कवच

कांग्रेस शासनकाल में मायावती को यह अनुभव हो चुका था कि कांग्रेस प्रतिशोध की राजनीति नहीं करती। मनमोहन सिंह सरकार के समय उनके खिलाफ चल रहे कई मामलों को या तो ठंडे बस्ते में डाल दिया गया या राजनीतिक “समझदारी” से निपटा दिया गया। उस दौर में कांग्रेस को मायावती के समर्थन की ज़रूरत थी — चाहे राष्ट्रपति चुनाव में हो, या यूपीए सरकार के नाजुक गठबंधन समीकरणों में। मायावती ने भी इसे भुनाया और अपने लिए “सुरक्षा कवच” तैयार कर लिया। यह वही दौर था जब मायावती ने यह सीख ली कि दिल्ली की सत्ता को खुश रखो, केसों की फाइलें खुद बंद हो जाएंगी। और यही राजनीतिक बीमा पॉलिसी उन्होंने अब बीजेपी शासनकाल में भी अपना रखी है।

बीजेपी की B टीम — रणनीतिक या स्वार्थपूर्ण समीकरण?

बीजेपी और बसपा का रिश्ता सीधा नहीं, मगर संकेतों से भरा है। मायावती ने हर उस चुनाव में अपना उम्मीदवार उतारा है जहाँ विपक्षी एकता की ज़रूरत थी।

इंडिया गठबंधन (INDIA Bloc) के खिलाफ जाकर अकेले लड़ने का उनका फैसला कोई “स्वतंत्रता” नहीं, बल्कि बीजेपी की अप्रत्यक्ष मदद है। जब-जब मायावती मैदान में उतरती हैं, विपक्षी वोटों का बंटवारा होता है और फायदा सीधे बीजेपी को मिलता है। 2022 के यूपी विधानसभा चुनावों में यही हुआ — बसपा का वोट शेयर घटा, लेकिन उसने सपा को नुकसान पहुंचाया और बीजेपी को क्लीन स्वीप का रास्ता साफ किया।

राजनीतिक रूप से इसे “वोट डिवाइडर” की भूमिका कहा जाता है, लेकिन हकीकत में यह एक “सहमति आधारित भूमिका” लगती है — ऐसी भूमिका जिसमें बसपा विपक्ष का हिस्सा दिखती है, मगर उसके हर कदम का लाभ सत्ताधारी पार्टी को होता है।

इंडिया गठबंधन से दूरी — सैद्धांतिक या सुविधाजनक?

मायावती हर बार कहती हैं कि बसपा किसी गठबंधन में शामिल नहीं होगी, लेकिन असली कारण सुविधाजनक दूरी है। उन्हें मालूम है कि अगर वे INDIA गठबंधन का हिस्सा बनती हैं, तो बीजेपी उन्हें सीधा निशाना बनाएगी। और इसका मतलब होगा — फिर से केस खुलना, सीबीआई या ईडी का सक्रिय होना, और मीडिया में उनकी छवि पर हमला। इसलिए उन्होंने विपक्षी खेमे से दूरी बनाए रखी है, ताकि बीजेपी के रडार से बची रहें। मायावती के इस फैसले ने विपक्षी एकता को कमजोर किया है, लेकिन उनके व्यक्तिगत हित सुरक्षित रखे हैं।

 मायावती की राजनीति — ‘संघर्ष की नहीं, समर्पण की कहानी’

कभी अंबेडकर और कांशीराम के सपनों की वाहक कही जाने वाली मायावती अब उस राह से दूर जा चुकी हैं।

उनकी राजनीति अब सामाजिक परिवर्तन की नहीं, बल्कि राजनीतिक सर्वाइवल की है। वह जानती हैं कि बीजेपी के खिलाफ मोर्चा खोलने का मतलब है — जांच एजेंसियों की दस्तक और अदालतों में पेशियां। इसलिए उन्होंने यह राह चुनी है कि न बीजेपी से भिड़ो, न विपक्ष के साथ चलो — बस बीच की राजनीति खेलते रहो।

पर सवाल यह है कि क्या दलित राजनीति इस समझौते की कीमत चुका पाएगी? मायावती का मौन और नरमी, बीजेपी के लिए लाभकारी है लेकिन दलित समाज के लिए आत्मघाती। जब राजनीति का केंद्र डर और लाभ बन जाए, तो सिद्धांत और संघर्ष अपने आप हार जाते हैं — और मायावती की राजनीति आज इसी हार की प्रतीक बन चुकी है।

मायावती अब उस मोड़ पर हैं जहाँ उनकी प्राथमिकता सत्ता नहीं, सुरक्षा है। वह जानती हैं कि कांग्रेस बदले की राजनीति नहीं करती, लेकिन बीजेपी की नाराजगी का मतलब है जेल, ईडी, और अदालत। इसलिए उनकी चुप्पी, उनकी मुस्कान और उनकी राजनीतिक दूरी — सबकुछ डर से उपजा हुआ राजनीतिक संतुलन है।वह अब दलितों की नेता नहीं, बीजेपी की ‘B टीम’ हैं — एक ऐसी टीम जो विपक्ष के वोट काटकर सत्ता को स्थिर रखती है।

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