साजिद अली। कोलकाता 26 नवंबर 2025
चुनाव आयोग की Special Intensive Revision (SIR) प्रक्रिया को लेकर चल रही राष्ट्रीय बहस के बीच पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने एक बड़ा और स्पष्ट बयान देते हुए कहा है कि अगर चुनाव आयोग SIR को वास्तविक समयसीमा—दो से तीन वर्षों—में पूरा करने की दिशा में काम करे, तो बंगाल सरकार उसे हर संभव सहायता प्रदान करेगी। ममता का यह बयान न केवल बंगाल की मौजूदा राजनीतिक स्थिति से जुड़ा है, बल्कि चुनाव आयोग की कार्यकुशलता, पारदर्शिता और लोकतांत्रिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर भी गंभीर प्रश्न उठाता है।
ममता बनर्जी ने कहा कि SIR जैसी व्यापक और जटिल प्रक्रिया को कुछ ही महीनों में पूरा करना न केवल अव्यावहारिक है, बल्कि लाखों मतदाताओं के अधिकारों पर सीधा प्रहार भी है। उन्होंने कहा कि मतदाता सूची में संशोधन, सत्यापन और पुनरीक्षण एक बेहद संवेदनशील कार्य है, जो यदि जल्दबाज़ी में किया जाए तो बड़े पैमाने पर नाम कटने, गलत प्रविष्टियाँ होने और राजनीतिक रूप से प्रेरित हेरफेर जैसी समस्याएँ जन्म ले सकती हैं। उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि “अगर आयोग इसे चुनावों से पहले जल्दबाज़ी में करता है, तो इसका सीधा नुकसान जनता को होगा और लोकतांत्रिक प्रक्रिया की साख को चोट पहुँचेगी।”
मुख्यमंत्री ने आयोग की प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए कहा कि SIR को लेकर अभी तक राज्यों के साथ विस्तृत परामर्श नहीं किया गया है, जबकि यह पूरी प्रक्रिया राज्य मशीनरी, बूथ-लेवल अधिकारियों, पंचायत और नगर निकायों के संयुक्त सहयोग से ही सफल हो सकती है। उन्होंने कहा कि ग्रामीण बंगाल से लेकर शहरी क्षेत्रों में एक-एक घर और परिवार की जानकारी जुटाने के लिए समय, जनशक्ति और तकनीकी क्षमता की आवश्यकता होती है। ऐसे में 2–3 महीने में SIR पूरा करने का दावा “जमीनी हकीकत से पूरी तरह अलग” है।
ममता ने यह भी कहा कि बंगाल सरकार मतदाता सूची को शुद्ध और पारदर्शी रखने के पक्ष में है, लेकिन प्रक्रिया को विश्वसनीय बनाने के लिए पर्याप्त समय देना अनिवार्य है। उन्होंने कहा कि अगर SIR को दो–तीन वर्षों की वास्तविक समय सीमा में किया जाए—जिसमें चरणबद्ध सत्यापन, फील्ड सर्वे, डिजिटल क्रॉस-चेक और शिकायत निवारण शामिल हो—तब बंगाल सरकार न केवल समर्थन देगी बल्कि पूरी मजबूती से सहयोग करेगी। उन्होंने यह भी जोड़ा कि राज्य सरकार की यह प्रतिबद्धता सिर्फ चुनाव आयोग के लिए नहीं, बल्कि बंगाल के हर नागरिक के अधिकार को सुरक्षित रखने के लिए है।
मुख्यमंत्री ने आयोग को संदेश देते हुए कहा कि लोकतंत्र केवल मतदान की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि मतदाता के अधिकारों की सुरक्षा, उनकी पहचान की विश्वसनीयता और हर नागरिक को शामिल करने की संवैधानिक जिम्मेदारी भी इसके केंद्र में है। जल्दबाज़ी में किया गया कोई भी कदम देश की चुनावी संरचना को कमजोर कर सकता है। इसलिए यदि चुनाव आयोग वास्तव में एक पारदर्शी और विश्वसनीय मतदाता सूची बनाना चाहता है, तो उसे समय, संसाधन और प्रक्रिया को गंभीरता से परखना होगा—तभी SIR सार्थक होगी, और जनता का भरोसा भी बरकरार रहेगा।
अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि चुनाव आयोग ममता बनर्जी के इस प्रस्ताव पर कैसी प्रतिक्रिया देता है—क्या आयोग जमीन की हकीकत को देखते हुए समयसीमा की समीक्षा करेगा, या SIR वैसे ही चलेगी जैसे अभी घोषित की गई है? लेकिन इतना तय है कि ममता का यह बयान SIR बहस को एक नई दिशा दे चुका है।




